Pushpalata Vlogs

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"जिस बुज़ुर्ग चौकीदार को पूरे मोहल्ले ने 25 साल तक एक टूटी हुई कुर्सी पर बैठे देखा, उसकी मौत के बाद जब उसके कमरे की दीवा...
24/06/2026

"जिस बुज़ुर्ग चौकीदार को पूरे मोहल्ले ने 25 साल तक एक टूटी हुई कुर्सी पर बैठे देखा, उसकी मौत के बाद जब उसके कमरे की दीवार तोड़ी गई तो अंदर करोड़ों रुपये नहीं, बल्कि ऐसा सच मिला जिसने पूरे शहर को रुला दिया..."

साल 2025 की बात है। शहर के सबसे पुराने सरकारी स्कूल के मुख्य गेट पर एक बूढ़ा चौकीदार बैठा करता था। उसका नाम था रामदास। उम्र लगभग सत्तर साल, झुकी हुई कमर, सफेद बिखरे बाल और आंखों पर मोटा चश्मा। पिछले पच्चीस वर्षों से वह उसी स्कूल की चौकीदारी कर रहा था। बच्चे उसे प्यार से "दादाजी" कहते थे, लेकिन बड़े लोग अक्सर उसका मज़ाक उड़ाते थे। कोई कहता, "बेचारा पूरी जिंदगी चौकीदारी करता रह गया", तो कोई कहता, "इसकी किस्मत में बस यही लिखा था।" रामदास कभी किसी को जवाब नहीं देता था। सुबह सबसे पहले स्कूल आता, गेट खोलता, बच्चों को मुस्कुराकर अंदर भेजता और शाम को सबसे आखिर में ताला लगाकर घर जाता। उसका घर भी क्या था, स्कूल के पीछे बना एक छोटा-सा कमरा, जिसकी छत जगह-जगह से टूटी हुई थी। बरसात में पानी टपकता था, गर्मियों में कमरा भट्टी बन जाता था। लेकिन उसने कभी शिकायत नहीं की। एक बात जरूर थी जो लोगों को अजीब लगती थी। हर साल स्कूल के कुछ गरीब बच्चों की फीस अचानक जमा हो जाती थी। किसी बच्चे की किताबें आ जातीं, किसी की यूनिफॉर्म बन जाती, किसी की कॉलेज की फीस भर दी जाती। जब भी स्कूल प्रशासन पता लगाने की कोशिश करता कि मदद कौन कर रहा है, कोई नाम सामने नहीं आता। धीरे-धीरे लोगों ने मान लिया कि कोई दानदाता होगा जो अपना नाम छिपाना चाहता है। समय बीतता गया। हजारों बच्चे उस स्कूल से पढ़कर निकल गए। कई बड़े अधिकारी बने, कई डॉक्टर बने, कई इंजीनियर बने। लेकिन रामदास वहीं का वहीं रहा, उसी कुर्सी पर बैठा हुआ। फिर एक सुबह स्कूल खुलने का समय हो गया, लेकिन गेट नहीं खुला। शिक्षक पहुंचे तो देखा कि रामदास अपनी कुर्सी पर चुपचाप बैठा है। पहले सबको लगा कि वह सो रहा है, लेकिन जब पास जाकर देखा गया तो पता चला कि वह हमेशा के लिए आंखें बंद कर चुका था। पूरे स्कूल में शोक की लहर दौड़ गई। नगर निगम वाले उसके कमरे का सामान हटाने पहुंचे। कमरे में एक पुराना बिस्तर, कुछ कपड़े और एक लकड़ी की अलमारी थी। सबको लगा कि कहानी यहीं खत्म हो जाएगी। लेकिन तभी मजदूरों ने देखा कि कमरे की एक दीवार बाकी दीवारों से अलग लग रही है। जब उसे तोड़ा गया तो अंदर एक छोटा-सा गुप्त कमरा निकला। यह देखकर सभी हैरान रह गए। कमरे के बीचोंबीच एक लोहे का संदूक रखा था। खबर पूरे शहर में फैल गई। लोग जमा हो गए। सभी को लगा कि शायद बूढ़े चौकीदार ने करोड़ों रुपये छिपा रखे होंगे। लेकिन जब संदूक खोला गया तो अंदर सिर्फ सैकड़ों फाइलें, तस्वीरें और एक मोटी डायरी मिली। पहली फाइल खोली गई तो उसमें एक डॉक्टर की तस्वीर थी। दूसरी में एक आईएएस अधिकारी की। तीसरी में एक वैज्ञानिक की। चौथी में एक सेना के अधिकारी की। कुल मिलाकर 163 तस्वीरें थीं। हर तस्वीर के पीछे एक ही वाक्य लिखा था— "मेरा बच्चा।" पुलिस समझ नहीं पा रही थी कि यह सब क्या है। रामदास की कभी शादी नहीं हुई थी, फिर ये 163 बच्चे कौन थे? तभी डायरी का पहला पन्ना खोला गया। उस पर लिखा था— "अगर मैं यह दुनिया छोड़ चुका हूँ, तो अब समय आ गया है कि मेरे बच्चों को सच्चाई पता चले..." और अगले ही शब्द पढ़ते ही वहां मौजूद हर इंसान के पैरों तले जमीन खिसक गई...
डायरी का पहला पन्ना पढ़ते ही पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। सभी की निगाहें उस पीले पड़ चुके कागज़ पर टिक गईं। रामदास ने लिखा था— "इन 163 बच्चों में से एक भी मेरा खून नहीं है, लेकिन इन सबने मुझे जीने की वजह दी। आज जो लोग डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस अधिकारी, प्रोफेसर और सैनिक बने बैठे हैं, उनमें से अधिकांश को यह भी नहीं पता कि उनकी जिंदगी में एक ऐसा आदमी था जो हर रात उनके लिए भगवान से ज्यादा दुआ करता था।" यह पढ़ते ही लोगों की उत्सुकता और बढ़ गई। आखिर एक साधारण चौकीदार का इन सफल लोगों से क्या रिश्ता हो सकता था? डायरी के अगले पन्ने पर जवाब लिखा था। "साल 1998 में मैं एक कपड़ा मिल में काम करता था। मेरी पत्नी सरोज और मेरा दस साल का बेटा मोहित मेरी पूरी दुनिया थे। जिंदगी छोटी थी, लेकिन खुश थी। फिर एक रात मिल में भयानक आग लग गई। उस आग ने सैकड़ों लोगों की जिंदगी बदल दी। मैं तो बच गया, लेकिन मेरी पत्नी और बेटा उसी आग में हमेशा के लिए मुझसे दूर हो गए। उस दिन के बाद मेरे पास जीने की कोई वजह नहीं बची थी। मैं कई दिनों तक अस्पताल में रहा। जब बाहर निकला तो मुझे लग रहा था कि मेरी दुनिया खत्म हो चुकी है। लेकिन एक दिन अस्पताल से लौटते समय मैंने सड़क किनारे एक छोटे बच्चे को कूड़े में खाना ढूंढते देखा। उसकी उम्र मेरे बेटे जितनी ही थी। मैं उसके पास गया। पता चला कि उसके माता-पिता एक दुर्घटना में मर चुके थे और अब वह अकेला था। उस दिन पहली बार मुझे लगा कि शायद भगवान ने मुझे किसी वजह से जिंदा छोड़ा है।" डायरी पढ़ते-पढ़ते कई लोगों की आंखें नम हो चुकी थीं। आगे लिखा था— "उस बच्चे की फीस मैंने भरी। फिर एक और बच्चा मिला। फिर तीसरा। धीरे-धीरे यह मेरा मिशन बन गया। मैं दिन में मजदूरी करता, रात में चौकीदारी करता और अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा उन बच्चों पर खर्च कर देता जिनका इस दुनिया में कोई नहीं था।" जैसे-जैसे पन्ने पलटे जा रहे थे, लोगों के दिल भारी होते जा रहे थे। रामदास ने लिखा था कि उसने कभी किसी बच्चे को यह नहीं बताया कि उनकी मदद कौन कर रहा है, क्योंकि वह नहीं चाहता था कि कोई उस पर एहसान समझे। उसने हर बच्चे की पूरी जानकारी फाइल में रखी थी। किसे कब किताबों की जरूरत पड़ी, किसकी फीस जमा करनी थी, किसकी मां बीमार थी, किसे हॉस्टल भेजना था— हर छोटी-बड़ी बात दर्ज थी। तभी एक अधिकारी ने एक फाइल खोली। उसमें शहर के मशहूर हृदय रोग विशेषज्ञ की तस्वीर थी। तस्वीर के पीछे लिखा था— "जब यह आठवीं कक्षा में था तब फीस न भर पाने के कारण स्कूल छोड़ने वाला था।" दूसरी फाइल में एक महिला आईएएस अधिकारी की तस्वीर थी। पीछे लिखा था— "पिता की मृत्यु के बाद पढ़ाई छूटने वाली थी।" एक-एक करके फाइलें खुलती गईं और हर फाइल के साथ लोगों की आंखों से आंसू बहते गए। लेकिन सबसे बड़ा रहस्य अभी बाकी था। संदूक के सबसे नीचे एक और लिफाफा रखा था जिस पर लिखा था— "इसे मेरे अंतिम संस्कार के बाद खोलना।" अगले दिन पूरे शहर ने रामदास को अंतिम विदाई दी। हजारों लोग आए। स्कूल के बच्चे रो रहे थे। शिक्षक रो रहे थे। यहां तक कि वे लोग भी रो रहे थे जिन्होंने कभी उसे महत्व नहीं दिया था। अंतिम संस्कार के बाद वह लिफाफा खोला गया। उसके अंदर एक वसीयत थी। वसीयत पढ़ते ही सब स्तब्ध रह गए। उसमें लिखा था— "मेरे नाम पर जो जमीन शहर के बाहरी इलाके में है, उसे बेच दिया जाए। उस पैसे से एक ऐसा छात्रावास बनाया जाए जहां कोई भी अनाथ बच्चा मुफ्त में रहकर पढ़ सके।" यह सुनकर सभी हैरान रह गए क्योंकि किसी को नहीं पता था कि रामदास के पास कोई जमीन भी है। जब जांच की गई तो पता चला कि वह जमीन आज की तारीख में लगभग 38 करोड़ रुपये की थी। लेकिन असली झटका तब लगा जब रजिस्ट्री के कागजात निकाले गए। वह जमीन रामदास ने नहीं खरीदी थी। वह जमीन उस कपड़ा मिल के मालिक ने उसके नाम कर दी थी, जिसने आग के बाद उसे मुआवजा देना चाहा था। रामदास चाहता तो आराम से करोड़पति बनकर जिंदगी गुजार सकता था, लेकिन उसने कभी उस जमीन को बेचा नहीं। वह इंतजार करता रहा कि उसकी मौत के बाद उससे किसी बड़े काम को पूरा किया जाए। कुछ महीनों बाद शहर में "सरोज-मोहित छात्रावास" का निर्माण शुरू हुआ। यह नाम पढ़कर लोगों को पहली बार पता चला कि उसने अपनी पत्नी और बेटे का नाम कभी भुलाया ही नहीं था। उद्घाटन के दिन देश-विदेश से वे सभी 163 बच्चे पहुंचे जिनकी जिंदगी उसने बदली थी। मंच पर कोई नेता नहीं था, कोई बड़ा उद्योगपति नहीं था। मंच पर सिर्फ रामदास की एक साधारण तस्वीर रखी थी। तब एक युवा डॉक्टर मंच पर आया और रोते हुए बोला, "मैं उन 163 बच्चों में से एक हूँ। अगर रामदास दादाजी नहीं होते तो शायद मैं आज भी किसी ढाबे पर बर्तन धो रहा होता।" उसके बाद एक आईएएस अधिकारी खड़ी हुई और बोली, "मेरे पिता की मौत के बाद मैंने पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया था, लेकिन हर साल मेरी फीस किसी अनजान व्यक्ति द्वारा जमा हो जाती थी। आज पता चला कि वह कौन था।" पूरा सभागार तालियों और आंसुओं से भर गया। लेकिन तभी जिलाधिकारी ने एक आखिरी दस्तावेज दिखाया। वह रामदास की डायरी का अंतिम पन्ना था जो अब तक किसी ने नहीं पढ़ा था। उस पर लिखा था— "अगर लोग मेरी कहानी जानें तो उन्हें यह मत बताना कि मैंने 163 बच्चों की मदद की। उन्हें सिर्फ इतना बताना कि जब भगवान किसी का सहारा बनना चाहता है तो किसी साधारण इंसान को चुन लेता है। क्योंकि असली महानता पहचान मिलने में नहीं, किसी की जिंदगी बदल देने में होती है।" यह पढ़ते ही पूरा हॉल खड़ा हो गया। किसी की आंखें सूखी नहीं थीं। उस दिन लोगों ने महसूस किया कि दुनिया में सबसे अमीर इंसान वह नहीं होता जिसके बैंक खाते में सबसे ज्यादा पैसा हो, बल्कि वह होता है जिसने सबसे ज्यादा दिलों में अपनी जगह बनाई हो। और रामदास, जो जिंदगी भर एक टूटी हुई कुर्सी पर बैठा चौकीदार कहलाता रहा, मरने के बाद सैकड़ों लोगों के लिए पिता, मार्गदर्शक और भगवान का दूसरा रूप बन गया। ❤️🙏🏻दोस्तों, अगर आपको यह कहानी पसंद आई हो तो कमेंट में "राधे राधे" जरूर लिखें, और लाइक, शेयर, फॉलो करना मत भूलिए।
Writer ✍️
Shanvi Sharma

24/06/2026

"बहाने आसान हैं, लेकिन मंज़िल उन्हीं को मिलती है जो मुश्किल रास्ता चुनते हैं।"

औरत चार रोटी बनाकर खुद को नौकरानी बताती है और मर्द धूप में कमाकर भी अपनी पत्नी को खुश रखने की कोशिश करता है..
24/06/2026

औरत चार रोटी बनाकर खुद को नौकरानी बताती है और मर्द धूप में कमाकर भी अपनी पत्नी को खुश रखने की कोशिश करता है..

सास के जाने के बाद थोड़ा आराम करने के लिए लेट गई, लेकिन उसे एक घंटा भी ना हुआ था कि दरवाजे की घंटी बजीएक सास की तकलीफ बह...
24/06/2026

सास के जाने के बाद थोड़ा आराम करने के लिए लेट गई, लेकिन उसे एक घंटा भी ना हुआ था कि दरवाजे की घंटी बजी

एक सास की तकलीफ बहु ने समझी 🥀
मम्मी, 4:00 बज गए। आपको कीर्तन में नहीं जाना। " "जाना तो है बहू लेकिन 5:00 बजे तेरे पापा जी चाय पीते हैं। चाय पिलाकर ही चली जाऊंगी।" "मम्मी जी, क्या मुझे चाय बनानी नहीं आती!!"

"अरे वह बात नहीं बहू! अभी तो किचन से निकली है तू! आराम कर। कहां बीच में उठेगी।"प्रमिला जी अपनी सफाई देते हुए बोली।"मम्मी, रोटियां बनाई है मैंने सिर्फ! बाकी सारा काम आपने किया। उसमें
बाकी सारा काम आपने किया । उसमें मुझे क्या थकावट होनी है। आप निश्चित होकर जाइए। मैं पापा जी को समय पर चाय दे दूंगी। "साधना मुस्कुराते हुए बोली। "मैं भी कुछ थकी सी हूं। सोच रही हूं ना ही जाऊं !!" मालती जी अनमने मन से बोली । अपनी सास के उतरे चेहरे को देख साधना समझ गई की बात कुछ और है। अपनी सास के पास बैठकर वह बोली " मम्मी जी वैसे तो आप कहते हो कि मैं आपकी बेटी हूं लेकिन

कहते हो कि मैं आपकी बेटी हूं लेकिन देख रही हूं बस कहने भर को।" "नहीं बहू, तू सचमुच मेरी बेटी ही है।" मालती जी उसके सिर पर हाथ रखते हुए बोली। "अच्छा तो सच सच बताओ कि क्यों नहीं जा रही आप कीर्तन में! कल से तो आप

वहां गाने के लिए कितने भजन याद करने में लगी थी और आज ..!!" अपनी बहू की बात सुन मालती जी थोड़ी दुखी होते हुए बोली.... "बहू, 6 महीने में तू बहुत कुछ देख समझ गई होगी लेकिन फिर भी बताती हूं। तेरे ससुर और मेरा स्वभाव बिल्कुल अलग। जहां मुझे सभी के साथ मिलकर चलना, उठना बैठना, हंसना बोलना पसंद। वही
..तेरे ससुर बिल्कुल ही अंतर्मुखी स्वभाव के हैं। उन्हें मेरी ये आदतें बिल्कुल पसंद नहीं।मैंने इन्हें कई बार समझाना भी चाहा लेकिन हमारे पुरुष प्रधान समाज में कहां पत्नी की इच्छाओं की कद्र। मां ने हमेशा..."यही सीख दी कि जिसमें पति खुश रहे वही करो और सासू मां उसके लिए बहू की खुशी से ज्यादा बेटे की खुशी थी इसलिए धीरे-धीरे मैंने अपने सारे शौक पति की खुशियों के आगे कुर्बान कर..."

पति की खुशियों के आगे कुर्बान कर दिए। हां, बस एक शांति थी कि तेरे ससुर मेरे खाने पीने और ओढ़ने पहनने का बहुत ध्यान रखते थे। मुझे कुछ भी चाहिए होता मुंह से निकलने से पहले तुरंत लाकर हाजिर कर देते। उम्र के साथ,,,,,!!!!!

तुरंत लाकर हाजिर कर देते। उम्र के साथ घुटने जवाब देने लगे थे लेकिन यह तेरे ससुर की सेवा पानी का ही असर है कि मैं फिर से पैरों पर चल फिर पा रही हूं। बस बहू, मैंने इसी में संतोष कर लिया कि दुनिया में सभी को मनचाहा तो नहीं",,,,!!!!!!

मिलता। मुझे तो फिर भी ईश्वर ने बहुत कुछ दिया।" साधना की सास घड़ी की तरफ देख ठंडी आह भरते हुए बोली। "यह तो आपने सही कहा मम्मी कि ईश्वर ने हमें जो दिया उसका शुकराना तो हमें

"हर समय अदा करना चाहिए। फिर आज आपको तो इतना अच्छा अवसर मिला है। वैसे भी पापा जी आज अपने दोस्त के घर गए हैं। कह रहे थे 6-7 बजे तक आएंगे। तब तक तो आप आ जाओगी ना"
मम्मी !! वैसे कौन सा आप मोहल्ले में बैठ गप्पे मार रही हो भगवान का नाम लेने ही तो जा रही हो। चले जाओ। मन की मन में मत रखो।"साधना उन्हें उत्साहित करते हुए बोली,,,,!!!!

मालती जी का मन तो था ही। बहू के समझाने पर उसमें थोड़ी हिम्मत आई और वह यह सोचकर निकल गई कि पूरा समय नहीं बैठूंगी जल्दी ही माथा टेक कर वापस आ जाऊंगी। साधना भी अपनी

सास के जाने के बाद थोड़ा आराम करने के लिए लेट गई, लेकिन उसे एक घंटा भी ना हुआ था कि दरवाजे की घंटी बजी। उसने दरवाजा खोला तो सामने उसके ससुर जी खड़े थे। देख कर एक बार तो वह भी घबरा गई लेकिन फिर

उसने खुद को थोड़ा सामान्य किया। घड़ी में देखा 5:30 बजने को आए थे। "पापा जी आप जब तक फ्रेश हो कर आइए, मैं आपके लिए चाय बना देती हूं। " बहू तुम आराम करो। चाय तुम्हारी सास बना देगी।" "पापा जी मैं तो आराम
..ही कर रही थी और वैसे भी दोपहर से मम्मीजी की तबीयत सही नहीं। दवाई लेकर थोड़ी देर पहले ही लेटी है। उन्हें जगाना सही नहीं।""क्या हो गया था। मुझे फोन क्यों नहीं किया।" उसके ससुर थोड़ा चिंतित होते
.हुए बोले। "पापा जी, फिक्र करने की कोई बात नहीं। बस थोड़ी थकावट थी और बीपी लो।" सुनकर मालती जी के पति ने थोड़ी राहत की सांस ली। जब तक वह फ्रेश होकर आए। साधना चाय बना कर ले आई थी। अपने ससुर को

चाय दे वह भी वही बैठ गई । "पापा जी, आज आप अपने दोस्त के पास गए थे । कैसी रही आपकी मुलाकात । " "बस बेटा, दोस्तों के साथ मुलाकात मतलब खुशियों की सौगात । आज मैं अपने बचपन के दोस्त के पास गया था और ,,,,,,!!!!

"वहां जाकर सरप्राइज हो गया। वहां तो मेरे स्कूल कॉलेज की पूरी मंडली जमा थी। फिर तो बचपन स्कूल कॉलेज के जो किस्सों की शुरुआत हुई। उसमें समय का पता ही नहीं चला। सच में अपने यार दोस्तों से मिलकर"

जीवन में फिर से जोश भर जाता है। सबके साथ मिलकर आज अतीत की गलियों में पहुंच कर जो खुशी मिली तुम्हें बता नहीं सकता। ऐसी ही मुलाकातें महीने में एक आध बार हो जाए तो हम बूढ़ों को दवाइयों की जरूरत ही ना पड़े।"

कहते हुए प्रमिला जी के पति की आंखो में चमक थी।"पापा जी, आप बिल्कुल सही कह रहे हो। मेरे पापा व दादा तो शाम होते ही एक घंटा अपने दोस्तों के साथ जरूर बैठते हैं और मम्मी, दादी दोपहर के समय
..आराम करने की बजाय अपनी सहेलियों के साथ बैठ गप्पें मार अपनी थकावट दूर कर तरोताजा हो जाती हैं।देखो ना पापा जी, मेरे दादा व दादी अस्सी के आसपास होने को आए लेकिन आज भी चुस्त-दुरुस्त हैं कोई बीमारी उन्हें..."

छू कर नहीं गई। ईश्वर की कृपा से मम्मी पापा भी । मुझे लगता है इसका कारण सामाजिकता भी है। जब हम अपने दोस्तों, रिश्तेदारों से मिलते हैं। अपने सुख दुख बतलाते हैं, उनसे सलाह
करते हैं तो आधी बीमारियां तो अपने आप ही दूर हो जाती। जैसा आपने कहा कि अपने दोस्तों से मिलने पर लगता ही,,,,!!!!

नहीं कि हमारी उम्र बढ़ रही है। वैसे एक बात कहूं पापा जी, मैंने देखा है कि आप मम्मी की कितनी फिक्र करते हैं। एक पति शायद ही अपनी पत्नी की बीमारी के लिए ऐसे रात भर जागता हो।
लेकिन पापा जी मुझे लगता है कि मम्मी को दवाइयों के साथ-साथ कुछ और भी दिया जाए तो वह जल्दी सही हो सकती हैं!!" "हां हां बहू, बताओ ना! मैं तो चाहता हूं मालती के पैरों का दर्द व बी पी जल्द से जल्द सही हो। उसे दर्द से,,,,!!!!

"तड़पता देख मुझे क्या कम तकलीफ होती है। पापा जी मुझे पता था आप मम्मी के इलाज के लिए कुछ भी करने के लिए मना नहीं करोगे इसलिए मैंने मम्मी को आज कीर्तन में भेज दिया।" "कीर्तन में !! कीर्तन में जाकर मम्मी के पैरों का

"दर्द सही हो जाएगा !! यह कैसे बेवकूफ वाली बातें कर रही हो बहू !!" मालती जी के पति थोड़ा नाराज होते हुए बोले । " पापा जी, दर्द तो मम्मी का महंगी दवाइयों से भी कम नहीं हो रहा। होगा भी कैसे !!" जब तक मम्मी मन से खुश नहीं होंगी,कोई भी दवाई अपना असर नहीं दिखा सकती,और मम्मीजी की खुशियों का गला तो आपने उनके इस घर में आते ही घोंट दिया था और उन्होंने भी आपकी खुशी के,,
लिए अपने सारे शौकों को तिलांजलि दे दी। पापा जी, क्या आपने मम्मी के लिए अपने किसी शौक को मारा ! फिर मम्मी से इतनी बड़ी कुर्बानी क्यों !! पापा जी मेरा मन आपका दिल दुखाने का नहीं लेकिन सासू मां की घुटन मुझसे देखी,,,,,!!!!

नहीं जाती। "मालती जी के पति इतनी देर से अपनी बहू की बातें सुन रहे थे। चुप्पी तोड़ते हुए बोले " बहू, तेरी सास सही कहती है कि तू बहू नहीं बेटी है हमारी। मैं तो पति के झूठे अहम में ही रह गया। अपनी पत्नी की घुटन मुझे दिखाई''''
..नहीं दी लेकिन तुमने ना केवल अपनी सासू मां के दुख दर्द को समझा बल्कि उसे दूर करने की पहल भी की। वह भी आज से अपनी जिंदगी जिएगी। मैं उस पर अपने कोई नियम नहीं थोपूंगा। मुझे तो सोचकर भी शर्म आ रही है कि मैं.,,,!!!!

इतना खुदगर्ज निकला।सारी उम्र उसने मेरी खुशियों के लिए निकाल दी और मैं उसकी तकलीफ ना देख पाया। आज सच्चाई जानने के बाद कैसे आंखें मिलाऊंगा उससे।" मालती के पति उदास होते हुए बोले।" इसमें

उदास होने की कौन सी बात है!! चश्मा हटाकर आंखें चार करिए ना मुझसे !! " मालती जी, दरवाजे पर खड़ी शरारत से मुस्कुराते हुए बोली। मालती जी की बात सुनकर उनकी बहू के साथ साथ उनके पति भी ठहाका मारकर हंस पड़े।,,,,!!!!

सच्चा रिश्ता वह नहीं जो सिर्फ खुशियों में साथ दे, बल्कि वह है जो दूसरों की तकलीफ को समझे और उन्हें खुलकर जीने की आज़ादी दे।""गलती का एहसास और खुदगर्ज़ी को छोड़ना ही एक नए और खूबसूरत रिश्ते की शुरुआत करता है।"आप को।मेरी कहानी कैसी लगी जरूर बताइएगा🙏🙏

पूजा मिश्रा

मायके में अभी मेरी माँ हैं! मायके में अभी मेरी माँ हैं इसलिए पहुँचने से पहले बगल वाली काकी, भौजी सबको पता चल जाता है कि ...
24/06/2026

मायके में अभी मेरी माँ हैं!
मायके में अभी मेरी माँ हैं इसलिए पहुँचने से पहले बगल वाली काकी, भौजी सबको पता चल जाता है कि बच्ची आ रही हैं!
घर पंहुचने से पहले ही माँ मेरी मन पसंद की रसेदारआलू तरकारी और भात बनवा कर रखती हैं।
मेरे पहुँचते ही वो जल्दी से रसोई में जाकर मुट्ठी में पिसान ले आती हैं। माँ की अंकवार को तड़प रही बिटिया की तड़प को थोड़ी देर थाम लेती हैं और पहले अलाय बलाय (नकारात्मक शक्ति) को बिटिया से दूर रखने के लिए पिसान से पीठा चढ़ाती हैं और पीठा चढ़ाते समय न जाने कौन कौन से देवी, देवता को मानती जाती हैं इस बीच उस पिसान को पेड़ के जड़ में रहने वाली चिटियों को डालने से नही भूलती हैं।
इतना सब करने के बाद ही माँ अंकवार भरने को आतुर बिटिया को गले लगाती हैं।
बच्ची आई हैं तो उनकी पसंद का नाश्ता, भोजन, शाम का नाश्ता सब कुछ बनाने की तैयारी में लग जाती हैं।
बहन या भाभी जरा सा भी आलस करती हैं तो रसोई में माँ खुद लग जाती हैं।
बिटिया सुख से देर तक सोये इस वजह से किसी को कमरे के आस पास शोर नहीं मचाने देती हैं।
बिटिया उठकर ब्रश नही करती हैं बल्कि गाँव आती हैं तो दातून करती हैं इसलिए माँ दूर बगिया में जाकर आम के पेड़ के नीचे उगे भटवास की डण्डियाँ तोड़ लाती हैं।
दातून करते ही लोटा भर पानी गुड़ की डली संग लाकर रख देती हैं।
बच्ची खा लो, बच्ची देर हो गया है सब खा चुके हैं बोल बोल कर आगे पीछे घूमती रहती हैं।
माँ मेरी अपने ढेरों कामों के बीच भी मेरा ध्यान रखना एक पल के लिए नहीं भूलती हैं।
मेरी पसंद का भोजन, सबसे अच्छा बिस्तर,पानी, दूध सब का ध्यान रखती हैं।
बच्ची आ रही हैं ये जान कर गृह वाटिका में मेरे पसंद की सब्जियां तोड़ना छोड़ देती हैं कि बच्ची आयेगी तब तोड़ कर बनायेगे।
आते समय क्या क्या छोटी छोटी पोटालियो में बांध देती हैं मैं समझ ही नहीं पाती हूँ।
एक चीज रख रही हूँ कहकर चार चीजें रख देती हैं।
बार बार मना न करूँ तो सारा घर अपने प्यार स्वरूप पोटालियों में बांध कर अपनी बच्ची को दे डालें।
मायके में अभी मेरी माँ हैं।
कब सो रही कब उठ रही? क्या खा रही, कब खा रही? इस बात की परवाह नहीं होती है।
माँ का हाथ बटानें के लिए कोई काम करने चलो तो हाथ पकड़ लेती हैं कहती हैं.. बच्ची! तुमको अब काम की आदत नहीं है छाला पड़ जायेगा रहने दो मत करो।
छाले का तो पता नहीं लेकिन हाथ के छाले की तरह ही सम्भाल कर रखती हैं जब तक मायके में माएं होती हैं।
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अरूणिमा सिंह

कड़वा है मगर सत्य हैघर में लोग सास ससुर को पानी भी नहीं पूछतेऔर सपने इनके ........ खाटू श्याम, केदारनाथ, अमरनाथ बद्रीनाथ...
24/06/2026

कड़वा है मगर सत्य है

घर में लोग सास ससुर को पानी भी नहीं पूछते
और सपने इनके ........ खाटू श्याम, केदारनाथ, अमरनाथ बद्रीनाथ, द्वारकापुरी जाने के है...!!

लेवा!  गाँव में सुबह होने का मतलब जब चिरई चीं चीं, भुजैठा ठाकुर जी ठाकुर जी बोलने लगे तब समझ जाइये कि भोर होने को है। गा...
24/06/2026

लेवा!
गाँव में सुबह होने का मतलब जब चिरई चीं चीं, भुजैठा ठाकुर जी ठाकुर जी बोलने लगे तब समझ जाइये कि भोर होने को है।
गाँव में भोर होना अलग बात होती है दिन निकलना अलग बात होती है।
जब तक दिन निकलता है तब तक घर के सुबह के काम निपट चुके होते हैं।
भोर हुए लगभग तीन चार घण्टे हो चुके होते हैं।
आकाश में तरई, अंजोरिया चमक ही रही होती है और गाँव में भोर हो चुकी होती है।
कहीं चिरैया की चहचाहट कहीं दूर मन्दिर पर बजता हनुमान चालीसा, गोरूओ का कोडिलाचना, माछियों की भिनभिन आपको चाह कर भी सोने नही देंगे, उठना ही पड़ेगा।
अगर उठ गए हैं तो प्रकृति के नजारे निहार लीजिये।
पूरब दिशा में आकाश में लालिमा छा गयी है, मध्यम मध्यम ठण्डी बयार बह रही है, चिड़िया जोर शोर से चहचहा रही हैं, पशु रम्भाने लगे हैं, खूंटा पर कोड़ीलाच रहे हैं।
ननद भौजाई मिलकर रसोई सम्भाल रही हैं तो बाबू जी और भाई मिलकर गोरू के काम कर रहे हैं।
माँ के अपने अलग सौ काम होते हैं।
ननद बर्तन माँज कर, एक बाल्टी पानी भरकर लाती हैं तो भौजी चूल्हे से राख उठा कर सैंत कर साफ कर दी है।
चाय बनाने के लिए भगोना, दाल भात बनाने के लिए बटुली, बटुला, तरकारी बनाने के लिए कड़ाही लेवार ली है।
लेवारना मतलब बरतन को जलने से बचाने के लिए उन पर राख या मिट्टी की परत चढाना होता है।
थोड़ी सी राख लेकर उस पर पानी डालकर गीला करके उससे बरतन पर एक परत लगाते हैं और फिर उस गीली परत के उपर सूखी राख डालते जाते हैं और वो चिपक कर एक मोटी परत बना देती है जिससे बर्तन चूल्हे पर नही जलता है और उसे माजने में आसानी रहती है।
हम सब के यहाँ चूल्हे पर चढ़ने वाले भी सारे बरतन अंदर व बाहर दोनों तरफ से एकदम साफ होते हैं। फोटो में जो कड़ाही है उस पर राख की नही मिट्टी की लेप लगी है इससे भी बरतन नही जलता है लेकिन मिट्टी सूख कर चिपक जाती है जिससे माजने पर थोड़ी मेहनत तो लगती है लेकिन राख का लेप ज्यादा बढ़िया होता है उसे माजने पर बरतन आसानी से साफ होते हैं।
गाँव में जो अब भी बड़े संयुक्त परिवार है उन घरों में चूल्हा अब भी रसोई में होता है और प्रयोग भी होता है बाकी काम गैस पर होता है।
छोटे परिवार में भोजन भले गैस पर बनता है लेकिन कभी कभार बनाने के लिए चूल्हा जरूर रहता है।
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अरूणिमा सिंह

जो माँ अपनी बेटी को ससुराल के बुजुर्गों का सम्मान करना सिखाती है, वह वास्तव में अपमी बेटी के लिए ताउम्र का सुख और सम्मान...
24/06/2026

जो माँ अपनी बेटी को ससुराल के बुजुर्गों का सम्मान करना सिखाती है, वह वास्तव में अपमी बेटी के लिए ताउम्र का सुख और सम्मान सुरक्षित कर रही होती है

बेटी के घर में हर पल 'दूरबीन' लगाकर ताक-झांक करने वाले माता-पिता अक्सर अपनी ही बेटी के सुहाग और सुकून के दुश्मन बन जाते ...
24/06/2026

बेटी के घर में हर पल 'दूरबीन' लगाकर ताक-झांक करने वाले माता-पिता अक्सर अपनी ही बेटी के सुहाग और सुकून के दुश्मन बन जाते हैं।

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