Pushpalata Vlogs

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एक प्रसंग हनुमान जी कौन हैं,,,, जव रावण को पता चला हनुमान भगवान शिव का ही रुद्रावतार हें,,,, पुरा जरुर पढ़नापार्वती जी न...
26/04/2026

एक प्रसंग हनुमान जी कौन हैं,,,, जव रावण को पता चला हनुमान भगवान शिव का ही रुद्रावतार हें,,,, पुरा जरुर पढ़ना
पार्वती जी ने शंकर जी से कहा - भगवन अपने इस भक्त को कैलाश आने से रोक दीजिए, वरना किसी दिन मैं इसे अग्नि में भस्म कर दूंगी।
यह जब भी आता है, मैं बहुत असहज हो जाती हूँ। यह बात मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है। आप इसे समझा दीजिए, यह कैलाश में प्रवेश न करें।
शिव जी जानते थे कि पार्वती सिर्फ उनके वरदान की मर्यादा रखने के लिए रावण को कुछ नहीं कहती हैं।
वह चुपचाप उठकर बाहर आकर देखते हैं। रावण नंदी को परेशान कर रहा है।
शिव जी को देखते ही वह हाथ जोड़कर प्रणाम करता है। प्रणाम महादेव।
आओ दशानन कैसे आना हुआ ?

मैं तो बस आप के दर्शन करने के लिए आ गया था महादेव।

अखिर महादेव ने उसे समझाना शुरू किया। देखो रावण तुम्हारा यहां आना पार्वती को बिल्कुल भी पसंद नहीं है। इसलिए तुम यहां मत आया करो।

महादेव यह आप कह रहे हैं। आप ही ने तो मुझे किसी भी समय आप के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर आने का वरदान दिया है।

और अब आप ही अपने वरदान को वापस ले रहे हैं। ऐसी बात नहीं है रावण।

लेकिन तुम्हारे क्रिया कलापों से पार्वती परेशान रहती है और किसी दिन उसने तुम्हें श्राप दे दिया तो मैं भी कुछ नहीं कर पाऊंगा। इसलिए बेहतर यही है कि तुम यहां पर न आओ।

फिर आप का वरदान तो मिथ्या हो गया महादेव।
मैं तुम्हें आज एक और वरदान देता हूं। तुम जब भी मुझे याद करोगे। मैं स्वयं ही तुम्हारे पास आ जाऊंगा। लेकिन तुम अब किसी भी परिस्थिति में कैलाश पर्वत पर मत आना।
अब तुम यहां से जाओ, पार्वती तुमसे बहुत रुष्ट है। रावण चला जाता है।
समय बदलता है हनुमानजी रावण की स्वर्ण नगरी लंका को जला कर राख करके चले जाते हैं। और रावण उनका कुछ नहीं कर सकता है।
वह सोचते-सोचते परेशान हो जाता है कि आखिर उस हनुमान में इतनी शक्ति आई कहां से।
परेशान हो कर वह महल में ही स्थित शिव मंदिर में जाकर शिवजी की प्रार्थना आरम्भ करता है।

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले।*

*गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।।*

उसकी प्रार्थना से शिव प्रसन्न होकर प्रकट होते हैं। रावण अभिभूत हो कर उनके चरणों में गिर पड़ता है।

कहो दशानन कैसे हो ? शिवजी पूछते हैं।

आप अंतर्यामी हैं महादेव। सब कुछ जानते हैं प्रभु।

*एक अकेले बंदर ने मेरी लंका को और मेरे दर्प को भी जला कर राख कर दिया।*

मैं जानना चाहता हूं कि यह बंदर *जिसका नाम हनुमान है आखिर कौन है ?*

और प्रभु उसकी पूंछ तो और भी ज्यादा शक्तिशाली थी। किस तरह सहजता से मेरी लंका को जला दिया। मुझे बताइए कि यह हनुमान कौन है ?

शिव जी मुस्कुराते हुए रावण की बात सुनते रहते हैं। और फिर बताते हैं कि रावण *यह हनुमान और कोई नहीं मेरा ही रूद्र अवतार है।*

विष्णु ने जब यह निश्चय किया कि वे पृथ्वी पर अवतार लेंगे और माता लक्ष्मी भी साथ ही अवतरित होंगी। तो मेरी इच्छा हुई कि मैं भी उनकी लीलाओं का साक्षी बनूं।
और जब मैंने अपना यह निश्चय पार्वती को बताया तो वह हठ कर बैठी कि मैं भी साथ ही रहूंगी। लेकिन यह समझ नहीं आया कि उसे इस लीला में किस तरह भागीदार बनाया जाए।
तब सभी देवताओं ने मिलकर मुझे यह मार्ग बताया। आप तो बंदर बन जाइये और शक्ति स्वरूपा पार्वती देवी आपकी पूंछ के रूप में आपके साथ रहे, तभी आप दोनों साथ रह सकते हैं।
और उसी अनुरूप मैंने हनुमान के रूप में जन्म लेकर राम जी की सेवा का व्रत रख लिया और शक्ति रूपा पार्वती ने पूंछ के रूप में और उसी सेवा के फल स्वरूप तुम्हारी लंका का दहन किया।

अब सुनो रावण! तुम्हारे उद्धार का समय आ गया है। अतः श्री राम के हाथों तुम्हारा उद्धार होगा। मेरा परामर्श है कि तुम युद्ध के लिए सबसे अंत में प्रस्तुत होना। जिससे कि तुम्हारा समस्त राक्षस परिवार भगवान श्री राम के हाथों से मोक्ष को प्राप्त करें और तुम सभी का उद्धार हो जाए।

*रावण को सारी परिस्थिति का ज्ञान होता है और उस अनुरूप वह युद्ध की तैयारी करता है और अपने पूरे परिवार को राम जी के समक्ष युद्ध के लिए पहले भेजता है और सबसे अंत में स्वयं मोक्ष को प्राप्त होता है।

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“जिस माँ के घर में कई-कई दिन चूल्हा नहीं जलता था… उसी माँ ने एक अजनबी को अपनी आखिरी रोटी खिला दी। और फिर जो हुआ, उसे देख...
26/04/2026

“जिस माँ के घर में कई-कई दिन चूल्हा नहीं जलता था… उसी माँ ने एक अजनबी को अपनी आखिरी रोटी खिला दी। और फिर जो हुआ, उसे देखकर पूरा गाँव रो पड़ा…”

एक छोटे से गाँव में एक बूढ़ी माँ रहती थी। उसका नाम था गंगा देवी। उसके पति की कई साल पहले मृत्यु हो चुकी थी। अब उसकी दुनिया में सिर्फ एक ही सहारा था—उसका बेटा मोहन।
मोहन शहर में मजदूरी करता था। वह हर महीने कुछ पैसे अपनी माँ को भेज देता, जिससे किसी तरह उनका घर चल जाता। लेकिन कई बार पैसे देर से आते, तो बूढ़ी माँ को भूखे पेट ही रात काटनी पड़ती।

फिर भी गंगा देवी ने कभी भगवान से शिकायत नहीं की।
हर सुबह सूरज निकलने से पहले वह उठती, अपने छोटे से टूटे हुए आँगन को साफ करती, तुलसी पर जल चढ़ाती और मिट्टी के दीपक में थोड़ा सा घी डालकर भगवान के सामने बैठ जाती।
गाँव वाले अक्सर उसका मज़ाक उड़ाते।

कोई कहता, “अरी गंगा, तेरे घर में खाने को नहीं है, और तू रोज घी का दीपक जलाती है?”

कोई हँसते हुए कहता, “भगवान ने अगर तेरी सुननी होती, तो तुझे इतना गरीब क्यों बनाता?”

लेकिन गंगा देवी बस मुस्कुरा देती और धीरे से कहती, “भगवान देर जरूर करते हैं, लेकिन कभी किसी का बुरा नहीं होने देते।”
एक दिन मोहन शहर गया… फिर एक हफ्ता बीता, फिर एक महीना… लेकिन वह वापस नहीं आया।
न कोई चिट्ठी आई, न कोई खबर।

गंगा देवी की आँखें हर दिन गाँव की पगडंडी पर टिक जातीं। जैसे ही कोई परछाई दिखाई देती, वह दौड़कर दरवाजे तक जाती… लेकिन हर बार उसे निराश होकर लौटना पड़ता।
धीरे-धीरे गाँव वालों ने बातें बनानी शुरू कर दीं।

“लगता है तेरा बेटा तुझे भूल गया…”
“इतने बड़े शहर में कौन किसे याद रखता है…”
“अब वह शायद कभी नहीं आएगा…”

ये बातें सुनकर गंगा देवी का दिल टूट जाता, लेकिन उसने भगवान का नाम लेना नहीं छोड़ा।

एक रात बहुत तेज बारिश हो रही थी। आसमान में बिजली चमक रही थी। गंगा देवी अपने घर के कोने में बैठी मोहन की पुरानी तस्वीर देखकर रो रही थी।

तभी अचानक उसे दरवाजे पर किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी।

वह डरते-डरते बाहर गई। देखा कि एक आदमी बारिश में भीगा हुआ, खून से लथपथ, उसके दरवाजे के पास पड़ा था।
गंगा देवी उसे तुरंत अंदर ले आई। उसके पास दवा नहीं थी, अच्छे कपड़े नहीं थे… लेकिन उसने अपनी पुरानी साड़ी फाड़कर उसके घाव बाँधे।

घर में सिर्फ दो सूखी रोटियाँ बची थीं।
वह चाहती तो उन्हें अपने लिए बचा सकती थी… क्योंकि उसने खुद भी सुबह से कुछ नहीं खाया था।

लेकिन उसने बिना सोचे-समझे वो दोनों रोटियाँ उस अजनबी को खिला दीं।

पूरी रात वह उसके सिरहाने बैठी रही। कभी उसके माथे पर पानी की पट्टी रखती, कभी भगवान से प्रार्थना करती—“हे प्रभु, जैसे मेरे बेटे की रक्षा करना… वैसे ही इस अजनबी को भी बचा लेना…”

सुबह जब उस आदमी की आँख खुली, तो वह गंगा देवी को देखकर रो पड़ा।

उसने काँपती आवाज में पूछा, “माँ… तुमने मेरी इतनी सेवा क्यों की? तुम तो खुद बहुत गरीब हो…”

गंगा देवी मुस्कुराई और बोली, “बेटा, गरीबी इंसान के घर में होती है… दिल में नहीं। और मुसीबत में पड़े इंसान की मदद करना ही सबसे बड़ा धर्म है।”

वह आदमी कुछ देर चुप रहा… फिर उसने कहा, “माँ, मैं कोई साधारण आदमी नहीं हूँ। मैं राजा का मंत्री हूँ। रास्ते में डाकुओं ने हमला कर दिया था। अगर तुम मुझे सहारा न देतीं, तो मैं शायद आज जिंदा नहीं होता।”

कुछ ही दिनों में पूरे गाँव में खबर फैल गई।

राजा की तरफ से गंगा देवी के लिए नया घर बनवाया गया। उसके लिए हर महीने खाने-पीने का सामान भेजा जाने लगा।
लेकिन गंगा देवी की आँखें आज भी अपने बेटे मोहन को ही ढूँढ रही थीं।

फिर एक दिन… वही पगडंडी, वही दरवाजा… और दूर से एक आवाज आई—

“माँ…!”

गंगा देवी बाहर भागी।

सामने मोहन खड़ा था।

वह दौड़कर अपनी माँ के गले लग गया और फूट-फूटकर रोने लगा।

उसने बताया कि वह शहर में बहुत बीमार पड़ गया था, इसलिए न कोई खबर भेज पाया, न घर लौट पाया।

उस दिन गंगा देवी ने आसमान की तरफ देखकर हाथ जोड़ लिए। उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे।

वह रोते हुए बस इतना बोली—

“हे प्रभु… आपने मेरी परीक्षा बहुत ली… लेकिन मेरा विश्वास कभी टूटने नहीं दिया…”

मित्रों, भगवान कभी किसी की सच्ची भक्ति और अच्छे कर्मों को व्यर्थ नहीं जाने देते। कभी-कभी जिंदगी में देर होती है, लेकिन भगवान के घर में अंधेर नहीं होता।

एक प्रसंग हनुमान जी कौन हैं,,,, जव रावण को पता चला हनुमान भगवान शिव का ही रुद्रावतार हें,,,, पुरा जरुर पढ़नापार्वती जी न...
26/04/2026

एक प्रसंग हनुमान जी कौन हैं,,,, जव रावण को पता चला हनुमान भगवान शिव का ही रुद्रावतार हें,,,, पुरा जरुर पढ़ना
पार्वती जी ने शंकर जी से कहा - भगवन अपने इस भक्त को कैलाश आने से रोक दीजिए, वरना किसी दिन मैं इसे अग्नि में भस्म कर दूंगी।
यह जब भी आता है, मैं बहुत असहज हो जाती हूँ। यह बात मुझे बिल्कुल भी पसंद नहीं है। आप इसे समझा दीजिए, यह कैलाश में प्रवेश न करें।
शिव जी जानते थे कि पार्वती सिर्फ उनके वरदान की मर्यादा रखने के लिए रावण को कुछ नहीं कहती हैं।
वह चुपचाप उठकर बाहर आकर देखते हैं। रावण नंदी को परेशान कर रहा है।
शिव जी को देखते ही वह हाथ जोड़कर प्रणाम करता है। प्रणाम महादेव।
आओ दशानन कैसे आना हुआ ?

मैं तो बस आप के दर्शन करने के लिए आ गया था महादेव।

अखिर महादेव ने उसे समझाना शुरू किया। देखो रावण तुम्हारा यहां आना पार्वती को बिल्कुल भी पसंद नहीं है। इसलिए तुम यहां मत आया करो।

महादेव यह आप कह रहे हैं। आप ही ने तो मुझे किसी भी समय आप के दर्शन के लिए कैलाश पर्वत पर आने का वरदान दिया है।

और अब आप ही अपने वरदान को वापस ले रहे हैं। ऐसी बात नहीं है रावण।

लेकिन तुम्हारे क्रिया कलापों से पार्वती परेशान रहती है और किसी दिन उसने तुम्हें श्राप दे दिया तो मैं भी कुछ नहीं कर पाऊंगा। इसलिए बेहतर यही है कि तुम यहां पर न आओ।

फिर आप का वरदान तो मिथ्या हो गया महादेव।
मैं तुम्हें आज एक और वरदान देता हूं। तुम जब भी मुझे याद करोगे। मैं स्वयं ही तुम्हारे पास आ जाऊंगा। लेकिन तुम अब किसी भी परिस्थिति में कैलाश पर्वत पर मत आना।
अब तुम यहां से जाओ, पार्वती तुमसे बहुत रुष्ट है। रावण चला जाता है।
समय बदलता है हनुमानजी रावण की स्वर्ण नगरी लंका को जला कर राख करके चले जाते हैं। और रावण उनका कुछ नहीं कर सकता है।
वह सोचते-सोचते परेशान हो जाता है कि आखिर उस हनुमान में इतनी शक्ति आई कहां से।
परेशान हो कर वह महल में ही स्थित शिव मंदिर में जाकर शिवजी की प्रार्थना आरम्भ करता है।

जटाटवीगलज्जल प्रवाहपावितस्थले।*

*गलेऽवलम्ब्य लम्बितां भुजंगतुंगमालिकाम्‌।।*

उसकी प्रार्थना से शिव प्रसन्न होकर प्रकट होते हैं। रावण अभिभूत हो कर उनके चरणों में गिर पड़ता है।

कहो दशानन कैसे हो ? शिवजी पूछते हैं।

आप अंतर्यामी हैं महादेव। सब कुछ जानते हैं प्रभु।

*एक अकेले बंदर ने मेरी लंका को और मेरे दर्प को भी जला कर राख कर दिया।*

मैं जानना चाहता हूं कि यह बंदर *जिसका नाम हनुमान है आखिर कौन है ?*

और प्रभु उसकी पूंछ तो और भी ज्यादा शक्तिशाली थी। किस तरह सहजता से मेरी लंका को जला दिया। मुझे बताइए कि यह हनुमान कौन है ?

शिव जी मुस्कुराते हुए रावण की बात सुनते रहते हैं। और फिर बताते हैं कि रावण *यह हनुमान और कोई नहीं मेरा ही रूद्र अवतार है।*

विष्णु ने जब यह निश्चय किया कि वे पृथ्वी पर अवतार लेंगे और माता लक्ष्मी भी साथ ही अवतरित होंगी। तो मेरी इच्छा हुई कि मैं भी उनकी लीलाओं का साक्षी बनूं।
और जब मैंने अपना यह निश्चय पार्वती को बताया तो वह हठ कर बैठी कि मैं भी साथ ही रहूंगी। लेकिन यह समझ नहीं आया कि उसे इस लीला में किस तरह भागीदार बनाया जाए।
तब सभी देवताओं ने मिलकर मुझे यह मार्ग बताया। आप तो बंदर बन जाइये और शक्ति स्वरूपा पार्वती देवी आपकी पूंछ के रूप में आपके साथ रहे, तभी आप दोनों साथ रह सकते हैं।
और उसी अनुरूप मैंने हनुमान के रूप में जन्म लेकर राम जी की सेवा का व्रत रख लिया और शक्ति रूपा पार्वती ने पूंछ के रूप में और उसी सेवा के फल स्वरूप तुम्हारी लंका का दहन किया।

अब सुनो रावण! तुम्हारे उद्धार का समय आ गया है। अतः श्री राम के हाथों तुम्हारा उद्धार होगा। मेरा परामर्श है कि तुम युद्ध के लिए सबसे अंत में प्रस्तुत होना। जिससे कि तुम्हारा समस्त राक्षस परिवार भगवान श्री राम के हाथों से मोक्ष को प्राप्त करें और तुम सभी का उद्धार हो जाए।

*रावण को सारी परिस्थिति का ज्ञान होता है और उस अनुरूप वह युद्ध की तैयारी करता है और अपने पूरे परिवार को राम जी के समक्ष युद्ध के लिए पहले भेजता है और सबसे अंत में स्वयं मोक्ष को प्राप्त होता है।

ll जय_सियाराम_जी lll ॐ_नमः_शिवाय ll

अगर कोई बहू रोज़ घंटों पूजा करती है,मंदिर सजाती है,दान-पुण्य भी करती है…लेकिन उसी घर में70–80 साल की बूढ़ी सासअपना खाना ...
26/04/2026

अगर कोई बहू रोज़ घंटों पूजा करती है,
मंदिर सजाती है,
दान-पुण्य भी करती है…
लेकिन उसी घर में
70–80 साल की बूढ़ी सास
अपना खाना खुद बनाकर खाती हो,
बीमार होने पर भी अपने काम खुद करती हो…
तो एक सवाल उठता है—
क्या ऐसी पूजा सच में भगवान तक पहुंचती है?
मैं मानती हूँ,
हो सकता है सास में लाख कमियाँ रही हों…
शायद उसने कभी गलत व्यवहार भी किया हो…
लेकिन उम्र के इस पड़ाव पर
वो सबसे पहले एक बूढ़ा और कमजोर इंसान है।
जिसे जरूरत है—
थोड़ी देखभाल की,
दो वक्त की रोटी की,
और सबसे ज़्यादा… सम्मान की।
अगर हम अपने ही घर के
एक असहाय इंसान को नजरअंदाज़ कर दें,
और बाहर जाकर दान-पुण्य करते रहें…
तो वो पुण्य नहीं,
सिर्फ एक दिखावा बनकर रह जाता है।
क्योंकि असली धर्म मंदिरों में नहीं,
घर के बुजुर्गों की सेवा में होता है।
भगवान को खुश करना है,
तो पहले उस इंसान का ख्याल रखिए
जो आपके घर में ही है,
और जो अब खुद से ज़्यादा कुछ कर भी नहीं सकता।
🪔 अंत में एक बात:
“जिस घर में बुजुर्गों की थाली खाली हो,
वहाँ पूजा की थाली कभी पूरी नहीं होती।”

काउंटर पर बैठी लड़की ने जब बुढ़िया से डॉक्टर की फीस के 200 रुपये मांगे तो बुढ़िया उसके मुँह की तरफ देखने लगी। फिर गुस्से...
26/04/2026

काउंटर पर बैठी लड़की ने जब बुढ़िया से डॉक्टर की फीस के 200 रुपये मांगे तो बुढ़िया उसके मुँह की तरफ देखने लगी। फिर गुस्से मे बोली " किस बात के दो सौ रुपये दूँ? अभी तेरे डॉक्टर ने देखा भी नही है और ना कोई दवाई दी? " लड़की बोली " दादी ये तो डॉक्टर साहब की फीस के दो सौ रुपये हैं। जांच और दवाई के पैसे तो बाद मे देने पड़ेंगे!" इतना सुनकर बुढ़िया का मुँह उतर गया। अपने पल्लू से बंधे 150 रुपये को मुट्ठी में दबाते हुए बोली " मुझे नही दिखाना तेरे डॉक्टर को। लूट मचा रखी है। कहते हुए वह हॉस्पिटल से बाहर जाने लगी। उधर OPD मे बैठा डॉक्टर जो अपने हॉस्पिटल का मालिक भी था। स्क्रीन पर सब कुछ देख रहा था। वैसे तो उसने आज तक किसी मरीज को फ्री मे नही देखा था मगर पता नही आज क्यों उसके मन मे दया भाव जाग गया था। उसने उस बूढ़ी औरत को अपने कक्ष मे बुला लिया। बुढ़िया बोली " मेरे पास डेढ़ सौ रुपया ही है बेटा।" डॉक्टर बोला " कोई बात नही दादी। आप डेढ़ सौ दे देना। " बुढ़िया बोली " डेढ़ सौ भी पूरा नही दूँगी। तीस रुपया बस किराया भी तो लगेगा। घर कैसे जाऊंगी? " डॉक्टर मुस्कराया फिर बोला " ठीक है आप कुछ न देना।, अब बताओ तकलीफ क्या है? " दादी ने तकलीफ बताई। डॉक्टर ने दादी की दो तीन जांच करवाई। बीपी चेक किया। दादी को सिर्फ बीपी की प्रोब्लम थी। इसलिए डॉक्टर ने अपने हॉस्पिटल के मेडिकल स्टोर से एक महीने की दवाई दे दी और आइंदा भी फ्री मे दवाई देने का वादा किया। बातों बातों मे दादी ने बताया कि अपनी विधवा बेटी के साथ रहती है। और इस दुनिया मे उसका कोई नही है। इस तरह दो तीन हजार का दादी का बिल माफ हो गया। और वह डॉक्टर को आशीष देती हुई चली गई। कि भगवान तुम्हे दुनिया की सारी खुशी दे। दादी के जाने के बाद डॉक्टर के आशांत मन को शांति मिली। वो इसलिए कि पिछले एक महीने से उसका अपनी पत्नी से झगडा चल रहा था। पत्नी घर छोड़ कर मायके जा चुकी थी। और तलाक़ की धमकी दे रही थी। रिश्ता टूटने के कगार पर था। उस दिन डॉक्टर का मन शांत रहा। ऐसे लगा जैसे बुढ़िया जाते जाते मन ठीक होने की दवाई दे गई हो। जब वह रात को घर पहुंचा तो देखा पत्नी घर मे मौजूद थी। उसे सब कुछ सपना सा लगा। पत्नी ने झगडा खत्म करने की बात की और अचानक सब कुछ सही हो गया। उस दिन के बाद डॉक्टर बदल गया। उसने अपनी फीस 200 रुपये की जगह 50 रुपये कर दी। और गरीबो का इलाज फ्री मे करने का संकल्प ले लिया। डॉक्टर समझ गया सबसे बड़ी खुशी तो मन की खुशी है। धन की नही। लेखक डी आर सैनी।

good morning
26/04/2026

good morning

बहू जल्दी से काम निपटाकर तैयार हो जाना, आज तो विरेन की बुआजी आने वाली है| और हाँ ढंग की साड़ी पहनना, बुआजी बहुत हाईफाई है...
25/04/2026

बहू जल्दी से काम निपटाकर तैयार हो जाना, आज तो विरेन की बुआजी आने वाली है| और हाँ ढंग की साड़ी पहनना, बुआजी बहुत हाईफाई हैं| बड़ा रईस और नामचीन खानदान है उनका| "

नेहा ने हामी भरी और झट से भोजन की तैयारी कर| बुआजी के आने से पहले वह सजधज कर तैयार हो गई|

डोर बेल बजी...

"नेहा बेटा दरवाजा खोल लगता है बुआजी आ गये| " निर्मलाजी ने कहा|

निर्मलाजी की ननद उम्र में उनसे बड़ी थी| तो उन्होंने पैर दबाकर आशीर्वाद लिया| वैसे बुआजी बड़ी हाई फाई थी| लेकिन सोच आज भी पुराने जमाने की थी| निर्मलाजी को देख नेहा ने भी उनके पैर दबाये|

खुश रहो बहू...

तुम्हारी शादी में तो आ नहीं पाई| इसिलिए निर्मला के बर बार बुलाने पर आ गई| सोचा कुछ दिन भाई के यहाँ रहना भी हो जायेगा और बहू से मिलना भी|

निर्मला तेरी बहू तो सुन्दर होने के साथ साथ सुशील भी है सुना है खूब पढी लिखी भी है|

हाँ, हाँ, बाईसा वैसे भी मुझे तो अपने बेटे के लिए पढी लिखी बिवी ही चाहिए थी|

सही कह रही हो निर्मला..

अच्छा तो बाईसा अब आप हाथ मुहँ धो भोजन कर लिजिये| वैसे भी दो बजे है और आप लंबा सफर तय कर आई है तो भूख भी लगी होगी|

नेहा ने भोजन परोसा ..नेहा रसोई के काम में बहुत होशियार थी| विविध प्रकार के पकवान बनाये थे उसने और सब बुआजी के स्वाद हिसाब से|

'बहू सब घर पर बनाया है या बाहर से ऑडर किया है| "..बुआजी ने पूछा|

नहीं बाईसा मैं जानती हूँ आप बाहर का नहीं खाती बहू ने सब कुछ घर पर ही बनाया है|

हाँ ,पर आजकल की पढी लिखी बहुओ को खाना बनाना कहा आता है?

बाईसा आप चख कर तो देखो..

भोजन इतना स्वादिष्ट था कि बस ऊंगलियां चाटते रहो| उन्होंने नेहा कि खूब तारीफ की और शगुन भी दिया|

"इतना स्वादिष्ट खाना खाकर मन तृप्त हो गया बहू तुमने तो मेरा दिल जीत लिया| "-बुआजी ने कहा

कुछ देर बाद

सबके भोजन करने के बाद नेहा ज्यो ही खाना खाने बैठी| बुआजी ने टोका.. ये क्या बहू,खाना खाने से पहले सास के पैर दबाते है यह भी नहीं सिखाया क्या तेरी माँ ने? मेरी बहुए तो आज भी मैं कहती हूँ तब ही खाना खाने बैठती है| और पैर दबायें बिना तो कभी खाना नहीं खाती| तुम तो ज्यादा पढी लिखी हो इन सब बातो को कहा समझोगी|

सास के इशारा करने पर उसने पैर दबाये और खाना खाने बैठी|

एक दिन निर्मला जी बाहर गई हुई थी| उनके पीछे बुआजी नेहा के कान भरने लगी| बहू तुम तो पढी लिखी हो ये साड़ी वाडी क्यों पहनती हो| हमारे यहाँ तो बहुओ को पूरी आजादी है तुम कहो तो मैं बात करूँ निर्मला से| निर्मलाजी के सामने कुछ और और उनके पीठ पिछे कुछ और..नेहा को उनका यह गिरगिट जैसे रंग बदलना बिल्कुल पसंद नहीं आया| नेहा पढी लिखी और समझदार थी| वह समझ गई कि बुआजी उनके हँसते खेलते परिवार में फूट डालने का काम कर रही है...

उसने कहा नहीं बुआजी मम्मीजी ने मुझे मना नहीं किया| मुझे साड़ी पहनना पसंद है इसिलिए मैं पहनती हूँ|

दो तीन दिन तक उनका यह सब नाटक चलता रहा बात बात में टोकना गलतियां निकालना| हर बात पर गिरगिट की तरह रंग बदलना| नेहा को उनका दोहरा चरित्र समझ ही नहीं आ रहा था|

उसने विरेन से इस बारे में बात की ...

"नेहा, बुआजी तो उम्र में बड़ी है और चार दिन के लिये आई है| तो लेट गो करने में फायदा है| वरना बेमतलब घर में क्लेश होगा| वैसे भी मम्मी ने तो इतने दिनो से कभी कोई शिकायत नहीं की तो उनकी बातो का बुरा मत मानो| "..विरेन ने समझाया

ठीक है विरेन| आप सही कहते है पर बुआजी दिनभर मम्मीजी के कान भरती रहती है|

नेहा बुआजी का तो स्वभाव ही ऐसा है पर तुम तो समझदार हो ना|

कुछ दिन ये सब चलता रहा..

एक दिन सुबह सुबह बुआजी निर्मलाजी से बात कर रही थी|

"देखो निर्मला तुम तो बड़ी भोली हो, बहू की लगाम जरा कसकर रखोगी तो अच्छा होगा| वरना भैया के जाने के बाद तुम तो बिल्कुल अकेली हो| पता नहीं कब बहला फुसलाकर विरेन को अपने बस में कर ले और तुझे वृद्धाश्रम छोड आये| वैसे भी ज्यादा पढी लिखी बहुएं ऐसी ही होती हैं| मैंने कई घरों में देखा है और तुम्हारी बहू के चेहरे पर तो चालाकी साफ नजर आती है|"

मुझे नहीं लगता उसको तुम्हारी कुछ पड़ी है| चार दिन से देख रही हूँ| कभी हमारे पास बैठकर क्षण भर के लिए बात तक नहीं की| रात हुई नहीं की कमरे में जाकर सो गई| कभी पैर तक नहीं दबाये ये क्या खाक सेवा करेगी|

नेहा चाय पूछने आई थी| लेकिन बुआजी की बात सुन वह बाहर ही खड़ी रही| इतने दिनों से वह चुप थी लेकिन आज उसे समझ आ गया कि अगर वह चुप रही तो उसके घर को बिखरते समय नहीं लगेगा|

उसने अंदर आकर कहा "मैं माफी चाहुँँगी कि मैंने छुपकर आप लोगों की बात सुनी| बुआजी आप घर की बड़ी हो हमारे हँसते खेलते परिवार को देख खुश होने की बजाय आप हमारे घर में फूट डालने का काम कर रही हैं| हाँ मम्मीजी भोली हैं लेकिन मैं तो चालाक हूँ, इसलिए एक बात कहना चाहती हूँ बुआजी माफ करना, लेकिन इंसान के कपड़े नहीं उसकी सोच स्टैण्डर्ड होनी चाहिए| छोटी सोच और पैर में मोच इंसान को जीवन में कभी आगे नहीं बढने देती|

तो दोस्तों, हमारे जीवन में हम भी बुआजी जैसे कई लोगों से मिलते हैं जिनका काम ही होता है लोगों के घर तोड़ना| यह हम पर निर्भर करता है कि हम नेहा की तरह समझदारी से काम लेते हैं या लोगों की बातों में आकर खुद ही अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार देते हैं|

कंचन हितेश जैन

रामचरितमानस में 14 प्रकार के व्यक्तियों को मरा हुआ माना है । कौनसे वो चौदह प्रकार के व्यक्ति है जो जीवित होते हुए भी मरे...
25/04/2026

रामचरितमानस में 14 प्रकार के व्यक्तियों को मरा हुआ माना है । कौनसे वो चौदह प्रकार के व्यक्ति है जो जीवित होते हुए भी मरे हुए है।🐦🍁राम-रावण युद्ध चल रहा था, तब अंगद ने रावण से कहा- हे रावण! तू तो मरा हुआ है, मरे हुए को मारने से क्या फायदा?🐦

रावण बोला– मैं जीवित हूँ, मरा हुआ कैसे?

अंगद बोले, सिर्फ साँस लेने वालों को जीवित नहीं कहते - साँस तो लुहार की धौंकनी भी लेती है!🐦

कौल कामबस कृपिन विमूढ़ा।

अतिदरिद्र अजसि अतिबूढ़ा।।

सदारोगबस संतत क्रोधी।

विष्णु विमुख श्रुति संत विरोधी।।

तनुपोषक निंदक अघखानी।

जीवत शव सम चौदह प्रानी।।🐦

१. कामवश: जो व्यक्ति अत्यंत भोगी हो, कामवासना में लिप्त रहता हो, जो संसार के भोगों में उलझा हुआ हो, वह मृत समान है। जिसके मन की इच्छाएं कभी खत्म नहीं होतीं और जो प्राणी सिर्फ अपनी इच्छाओं के अधीन होकर ही जीता है, वह मृत समान है। वह अध्यात्म का सेवन नहीं करता है, सदैव वासना में लीन रहता है।

२. वाममार्गी: जो व्यक्ति पूरी दुनिया से उल्टा चले, जो संसार की हर बात के पीछे नकारात्मकता खोजता हो, नियमों, परंपराओं और लोक व्यवहार के खिलाफ चलता हो, वह वाम मार्गी कहलाता है। ऐसे काम करने वाले लोग मृत समान माने गए हैं।

३. कंजूस: अति कंजूस व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जो व्यक्ति धर्म कार्य करने में, आर्थिक रूप से किसी कल्याणकारी कार्य में हिस्सा लेने में हिचकता हो, दान करने से बचता हो, ऐसा आदमी भी मृतक समान ही है।

४. अति दरिद्र: गरीबी सबसे बड़ा श्राप है। जो व्यक्ति धन, आत्म-विश्वास, सम्मान और साहस से हीन हो, वह भी मृत ही है। अत्यंत दरिद्र भी मरा हुआ है। गरीब आदमी को दुत्कारना नहीं चाहिए, क्योंकि वह पहले ही मरा हुआ होता है। दरिद्र-नारायण मानकर उनकी मदद करनी चाहिए।

५. विमूढ़: अत्यंत मूढ़ यानी मूर्ख व्यक्ति भी मरा हुआ ही होता है। जिसके पास बुद्धि-विवेक न हो, जो खुद निर्णय न ले सके, यानि हर काम को समझने या निर्णय लेने में किसी अन्य पर आश्रित हो, ऐसा व्यक्ति भी जीवित होते हुए मृतक समान ही है, मूढ़ अध्यात्म को नहीं समझता।

६. अजसि: जिस व्यक्ति को संसार में बदनामी मिली हुई है, वह भी मरा हुआ है। जो घर-परिवार, कुटुंब-समाज, नगर-राष्ट्र, किसी भी ईकाई में सम्मान नहीं पाता, वह व्यक्ति भी मृत समान ही होता है।

७. सदा रोगवश: जो व्यक्ति निरंतर रोगी रहता है, वह भी मरा हुआ है। स्वस्थ शरीर के अभाव में मन विचलित रहता है। नकारात्मकता हावी हो जाती है। व्यक्ति मृत्यु की कामना में लग जाता है। जीवित होते हुए भी रोगी व्यक्ति जीवन के आनंद से वंचित रह जाता है।

८. अति बूढ़ा: अत्यंत वृद्ध व्यक्ति भी मृत समान होता है, क्योंकि वह अन्य लोगों पर आश्रित हो जाता है। शरीर और बुद्धि, दोनों अक्षम हो जाते हैं। ऐसे में कई बार वह स्वयं और उसके परिजन ही उसकी मृत्यु की कामना करने लगते हैं, ताकि उसे इन कष्टों से मुक्ति मिल सके।

९. सतत क्रोधी: २४ घंटे क्रोध में रहने वाला व्यक्ति भी मृतक समान ही है। ऐसा व्यक्ति हर छोटी-बड़ी बात पर क्रोध करता है। क्रोध के कारण मन और बुद्धि दोनों ही उसके नियंत्रण से बाहर होते हैं। जिस व्यक्ति का अपने मन और बुद्धि पर नियंत्रण न हो, वह जीवित होकर भी जीवित नहीं माना जाता। पूर्व जन्म के संस्कार लेकर यह जीव क्रोधी होता है। क्रोधी अनेक जीवों का घात करता है और नरकगामी होता है।

१०. अघ खानी: जो व्यक्ति पाप कर्मों से अर्जित धन से अपना और परिवार का पालन-पोषण करता है, वह व्यक्ति भी मृत समान ही है। उसके साथ रहने वाले लोग भी उसी के समान हो जाते हैं। हमेशा मेहनत और ईमानदारी से कमाई करके ही धन प्राप्त करना चाहिए। पाप की कमाई पाप में ही जाती है और पाप की कमाई से नीच गोत्र, निगोद की प्राप्ति होती है।

११. तनु पोषक: ऐसा व्यक्ति जो पूरी तरह से आत्म संतुष्टि और खुद के स्वार्थों के लिए ही जीता है, संसार के किसी अन्य प्राणी के लिए उसके मन में कोई संवेदना न हो, ऐसा व्यक्ति भी मृतक समान ही है। जो लोग खाने-पीने में, वाहनों में स्थान के लिए, हर बात में सिर्फ यही सोचते हैं कि सारी चीजें पहले हमें ही मिल जाएं, बाकी किसी अन्य को मिलें न मिलें, वे मृत समान होते हैं। ऐसे लोग समाज और राष्ट्र के लिए अनुपयोगी होते हैं। शरीर को अपना मानकर उसमें रत रहना मूर्खता है, क्योंकि यह शरीर विनाशी है, नष्ट होने वाला है।

१२. निंदक: अकारण निंदा करने वाला व्यक्ति भी मरा हुआ होता है। जिसे दूसरों में सिर्फ कमियाँ ही नजर आती हैं, जो व्यक्ति किसी के अच्छे काम की भी आलोचना करने से नहीं चूकता है, ऐसा व्यक्ति जो किसी के पास भी बैठे, तो सिर्फ किसी न किसी की बुराई ही करे, वह व्यक्ति भी मृत समान होता है। परनिंदा करने से नीच गोत्र का बंध होता है।

१३. परमात्म विमुख: जो व्यक्ति ईश्वर यानि परमात्मा का विरोधी है, वह भी मृत समान है। जो व्यक्ति यह सोच लेता है कि कोई परमतत्व है ही नहीं; हम जो करते हैं, वही होता है, संसार हम ही चला रहे हैं, जो परमशक्ति में आस्था नहीं रखता, ऐसा व्यक्ति भी मृत माना जाता है।

१४. श्रुति संत विरोधी: जो संत, ग्रंथ, पुराणों का विरोधी है, वह भी मृत समान है। श्रुत और संत, समाज में अनाचार पर नियंत्रण (ब्रेक) का काम करते हैं। अगर गाड़ी में ब्रेक न हो, तो कहीं भी गिरकर एक्सीडेंट हो सकता है। वैसे ही समाज को संतों की जरूरत होती है, वरना समाज में अनाचार पर कोई नियंत्रण नहीं रह जाएगा।

कल एक महिला मिली। किसी महकमे मे सरकारी कर्मचारी है। उम्र 57 साल है। रिटायरमेंट मे 3 साल बचे हैं। उसने 30 लाख की गाड़ी खर...
25/04/2026

कल एक महिला मिली। किसी महकमे मे सरकारी कर्मचारी है। उम्र 57 साल है। रिटायरमेंट मे 3 साल बचे हैं। उसने 30 लाख की गाड़ी खरीदी है। खुद को चलानी नही आती इसलिए ड्राइवर रखा है सारी उम्र पैदल और ऑटो मे चलकर गुजर गई। मगर बुढ़ापे मे गाड़ी खरीदना उसके परिवार को रास नही आ रहा। पति और बेटा-बहु उसे कोस रहे हैं कि इतनी फिजुलाखर्ची क्यों की? उसका पति हमेशा से बेरोजगार रहा। कभी कोई काम नही किया। पत्नी की कमाई का पूरा मैनेजमेंट पति के पास रहा । बेटा सरकारी नौकरी मे है। बहु भी सरकारी नौकरी मे है। महिला को रिटायरमेंट पर एक करोड़ रुपयो के आसपास मिलेंगे। सबकी नजर उन्ही पैसों पर है। महिला मुझसे बोली " मैंने अपने सारे दायित्व निभाए। पति और बेटे के लिए अपने शौक और इच्छाएं दिल मे दफन कर लिए। लोगों से लिफ्ट लेकर, या ऑटो और पैदल सफर किया। अब जब फुर्सत के दिन आये है तो गाड़ी खरीद ली। मगर गाड़ी खरीदते ही सब को सांप सूंघ गया है। कोई मुझसे सीधी तरह बात नही करता। पति कह रहा है। तीस लाख खर्च क्यों किये? शौक पूरा करना था तो चार पांच लाख की गाड़ी खरीद लेती। बेटा बहु तो एक महीने से बात ही नही कर रहे। अब उन्हे डर है कि रिटायरमेंट पर मिलने वाले एक करोड़ रुपये भी मै कहीं शौक पर न खर्च कर दूँ। बेटा उन पैसों से जमीन खरीदकर उस पर बंगला बनाने के ख्वाब देख रहा है। सच पूछो तो मै अब ऐसा ही करूँगी। किसी को दो कौड़ी भी नही दूँगी। पति साथ देते है तो ठीक है वरना अकेले जी लुंगी मगर अब थोड़ा सा जीना को चाहती हूँ। सिर्फ अपने लिए। क्योंकि मैंने जान लिया है सारे रिश्ते मतलबी है। "
क्या वो महिला सही कर रही है???

रविवार की सुबह थी, लेकिन घर में शांति की जगह कोहराम मचा हुआ था। शर्मा जी के घर में आज खास मेहमान आने वाले थे। रसोई में ब...
25/04/2026

रविवार की सुबह थी, लेकिन घर में शांति की जगह कोहराम मचा हुआ था। शर्मा जी के घर में आज खास मेहमान आने वाले थे। रसोई में बर्तनों की खनखनाहट और मसालों की खुशबू मिली-जुली आ रही थी।

घर का बड़ा बेटा, रमन, अभी-अभी सोकर उठा था। डाइनिंग टेबल पर बैठते ही उसने जोर से आवाज़ लगाई, "माँ! चाय कहाँ है? दस बार कह चुका हूँ कि उठते ही मुझे चाय चाहिए होती है। इस घर में किसी को मेरी परवाह है भी या नहीं?"
रमन ने गुस्से में न्यूज़पेपर सोफे पर पटक दिया।

रसोई से सुमित्रा जी दौड़ती हुई आईं, हाथ में गरमा-गरम चाय का प्याला था। "अरे मेरा राजा बेटा, गुस्सा क्यों करता है? बस दो मिनट की देरी हो गई। ले पी ले। तुझे पता है ना, ऑफिस के काम से तू कितना थक जाता है, इसलिए चिड़चिड़ा हो जाता है। कोई बात नहीं।"

सुमित्रा जी ने बड़े प्यार से बेटे के सिर पर हाथ फेरा। रमन का गुस्सा शांत हो गया, और वो चाय की चुस्कियाँ लेने लगा।
तभी सुमित्रा जी की बेटी, प्रिया, जो दो दिन के लिए मायके आई हुई थी, अपने कमरे से बाहर निकली। उसके हाथ में एक सूट था।

"माँ! आपने यह सूट प्रेस नहीं करवाया? मैंने कहा था ना मुझे आज यही पहनना है!" प्रिया ने पैर पटकते हुए कहा और सूट को कुर्सी पर फेंक दिया। उसकी भौहें तनी हुई थीं।
सुमित्रा जी हँस पड़ीं। "अरे पगली, इतनी सी बात पर मुँह लाल कर लिया? तू तो बचपन से ही ऐसी है, नाक पर गुस्सा धरा रहता है। ला, मैं अभी प्रेस कर देती हूँ। तू गुस्सा करते हुए भी कितनी प्यारी लगती है।"

सुमित्रा जी ने बेटी को गले लगाया और सूट लेकर अंदर चली गईं।

अब बारी थी घर की बहू, अंजलि की। अंजलि सुबह पाँच बजे से उठी हुई थी। नाश्ता बनाना, घर की सफाई, मेहमानों के लिए तैयारी—वह एक मशीन की तरह काम कर रही थी। पसीने से लथपथ अंजलि जब डाइनिंग टेबल साफ कर रही थी, तभी सुमित्रा जी ने आवाज़ दी।

"बहू, मेहमानों के लिए समोसे तलने हैं, कढ़ाई चढ़ा दी?"
अंजलि की कमर में दर्द था और सिर चकरा रहा था। उसने एक पल रुककर, थोड़े भारी स्वर में कहा, "माँ जी, अभी तो नाश्ते के बर्तन भी नहीं धुले हैं। मैं अकेली हूँ, रमन और प्रिया फ्री बैठे हैं, क्या वो थोड़ी मदद नहीं कर सकते? मैं थक गई हूँ, मुझे भी थोड़ा आराम चाहिए।"

अंजलि की आवाज़ में थकावट और हल्का सा आक्रोश था। बस, इतनी सी बात थी और घर का माहौल बदल गया। सुमित्रा जी के चेहरे की वो ममता, जो अभी रमन और प्रिया के लिए बह रही थी, अचानक कठोरता में बदल गई।

"आराम?" सुमित्रा जी ने व्यंग्य से कहा, "अभी दो साल हुए नहीं ब्याह को और ज़बान इतनी चलने लगी? इसे कहते हैं बड़ों के सामने बोलना। हम भी बहुएं थे, पर मजाल है कि सास के सामने उफ़ भी कर दें। यह सब तुम्हारे मायके की देन है। तुम्हारी माँ ने तुम्हें सहनशीलता नहीं सिखाई? जरा सा काम क्या बता दिया, तुम तो हम पर एहसान जताने लगीं।"
रमन भी बोल पड़ा, "अंजलि, तुम माँ से ऐसे कैसे बात कर सकती हो? तमीज़ नहीं है क्या?"

प्रिया ने भी नाक सिकोड़ी, "भाभी, आप तो बहुत रूड हो गई हैं।"

अंजलि की आँखों में आँसू आ गए। वही गुस्सा जब रमन ने किया तो 'काम का तनाव' था। जब प्रिया ने किया तो 'बचपन की आदत' थी। लेकिन जब उसने अपनी जायज़ तकलीफ बताई, तो वह 'बदतमीज़ी' और 'संस्कारों की कमी' बन गई।
तभी घर के मुखिया, शर्मा जी, जो चुपचाप अखबार पढ़ रहे थे, उठे। उन्होंने अपना चश्मा उतारा और सुमित्रा जी के सामने आकर खड़े हो गए।

"सुमित्रा," उनकी आवाज़ में एक गंभीरता थी, "रमन ने अखबार पटका, तुम्हें प्यार आया। प्रिया ने कपड़े फेंके, तुम्हें हँसी आई। अंजलि ने सिर्फ अपनी तकलीफ बताई, तो तुम्हें उसके संस्कार याद आ गए?"

सुमित्रा जी चुप हो गईं।

शर्मा जी ने आगे कहा, "रमन का गुस्सा उसकी आदत है, प्रिया का गुस्सा उसका भोलापन, और अंजलि का गुस्सा बदतमीज़ी? यह दोहरा तराजू क्यों? क्या अंजलि इंसान नहीं है? क्या उसे थकने का हक नहीं है? जब तुम्हारी बेटी ससुराल में थकी-हारी हो और अपनी सास से मदद मांगे, और उसकी सास उसे बदतमीज़ कहे, तो तुम्हें कैसा लगेगा?"

पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया। सुमित्रा जी को जैसे आईना दिख गया हो। उन्हें एहसास हुआ कि जिसे वो 'बहू' कहकर एक ढांचे में कैद कर रही थीं, असल में वो भी किसी की बेटी है, और सबसे बड़ी बात, वो भी एक जीती-जागती इंसान है।
सुमित्रा जी धीरे से अंजलि के पास गईं। अंजलि ने डरते हुए नज़रें झुका लीं। सुमित्रा जी ने कढ़ाई अंजलि के हाथ से ले ली।

"तू जा, अपने कमरे में जाकर थोड़ा आराम कर ले। समोसे मैं और प्रिया मिलकर तल लेंगे। और रमन, तू बर्तन धो दे, आज संडे है, तेरा ऑफिस नहीं है।"

रमन और प्रिया एक-दूसरे का मुँह देखने लगे, लेकिन पिता की सख्त नज़रों के आगे उन्हें उठना पड़ा। अंजलि ने अपनी सास को देखा, उनकी आँखों में अब ताना नहीं, बल्कि एक नई समझदारी थी। उस दिन अंजलि को महसूस हुआ कि घर ईंट-गारे से नहीं, बल्कि एक-दूसरे की भावनाओं को एक ही तराजू में तौलने से बनता है। गुस्सा सबका एक जैसा होता है, बस ज़रूरत है उसे अपनाने वाले दिल की।

दोस्तों, हमारे समाज की यह कड़वी सच्चाई है कि हम बहू को 'बेटी' बनाने का दावा तो करते हैं, लेकिन जब गलती करने या गुस्सा दिखाने की बारी आती है, तो नियम बदल जाते हैं। याद रखिये, बहू मशीन नहीं है। उसे भी थकने का, चिढ़ने का और अपनी बात कहने का उतना ही हक है जितना आपके बेटे या बेटी को। जिस दिन हम यह फर्क मिटा देंगे, उस दिन हर घर स्वर्ग बन जाएगा।

क्या आपके घर में भी ऐसा दोहरा मापदंड देखने को मिलता है? अपने विचार कमेंट में ज़रूर लिखें।

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पूजा मिश्रा ❤️ 🪻🙏क्रेडिट

अक्सर देखा है—जब घर में नई बहु आती है, तो ससुर उसे बहुत मान-सम्मान देते हैं, उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखते हैं। ...
25/04/2026

अक्सर देखा है—जब घर में नई बहु आती है, तो ससुर उसे बहुत मान-सम्मान देते हैं, उसकी हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रखते हैं। ये बहुत अच्छी बात है।
लेकिन उसी घर में वही ससुर अपनी पत्नी, यानी सास से कैसे बात करते हैं… ये भी उतना ही ज़रूरी है।
अगर सास बहु को किसी बात पर समझाए या डांटे,
तो ससुर उसी बहु के सामने सास को डांट देते हैं।
कभी गुस्से में बुरा-भला कह देते हैं, गाली-गलौज तक कर देते हैं…
क्योंकि ये उनका पुराना व्यवहार है, जो सालों से चलता आ रहा है।
ऐसे में क्या होता है?
ससुर बहु की नजरों में “अच्छे” बन जाते हैं,
लेकिन उसी समय सास की इज्जत धीरे-धीरे कम हो जाती है।
आजकल कुछ बेटों का भी यही हाल है—
अपनी पत्नी के सामने अपनी ही मां से उल्टा-सीधा बोल जाते हैं।
और फिर वही चीज़ बहु के behavior में भी दिखने लगती है।
सच तो ये है—
Respect सिखाई नहीं जाती, दिखाई जाती है।
जिस घर में पति अपनी पत्नी की इज्जत नहीं करता,
जहां बेटा अपनी मां से सम्मान से बात नहीं करता,
वहां बहु से सम्मान की उम्मीद करना अधूरा सच है।
और एक बात…
वो सास, जो चुप रहती है—
वो कमजोर नहीं होती।
वो इसलिए चुप रहती है क्योंकि वो नहीं चाहती कि उसके अपने घर में,
उसकी बहु के सामने उसकी और बेइज्जती हो।
जिस तरह ससुर ने मेहनत से घर बनाया,
उसी तरह सास ने अपनी पूरी जिंदगी उस घर को संवारने में लगा दी है।
और बेटा… उसे इस दिन के लिए नहीं पाला गया था
कि वो अपनी पत्नी के सामने अपनी मां को छोटा करे।
हर सास respect deserve करती है,
क्योंकि वो सिर्फ एक औरत नहीं—
उस घर की नींव होती है।

Note (कुछ लोगों को मेरी सच बोलने से बहुत दिक्कत होती है।पर इससे मुझे कुछ फर्क नहीं पड़ता और न मैं सच बोलने से डरती हु।)

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