05/02/2024
*इंदौर हादसा : "सिविल इंजीनियरिंग", "इंजीनियर्स" और "समाज"*
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कुछ प्रश्न.....
सभी निर्माणों और उनके रखरखाव में क्या सिविल इंजीनियर्स की ज़रूरत नहीं होती है ?
*हमारे देश में निजी स्तर पर लाखों निर्माण कार्य चलते हैं, इनमें से कितने प्रतिशत में किसी सिविल इंजीनियर को कंसल्टेंट रखा जाता है ?*
*शायद 2-5 % में...मात्र।*
मध्य प्रदेश के इंदौर में 30 मार्च, 2023 को बेलेश्वर महादेव झूलेलाल मंदिर में रामनवमी के दिन बावड़ी की स्लैब गिर गई थी. इस हादसे में करीब 50 लोग बावड़ी में गिर गए थे, जिनमें से 36 लोगों की मौत हो गई.
बावड़ी की गहराई करीब 80 फ़ीट है. सालों पहले बावड़ी में गिरने से दो बच्चों की मौत हो गई थी. इसके बाद नगर निगम ने बावड़ी पर लोहे की जाली लगा दी थी.
इस हादसे के बाद बावड़ी को बंद कर दिया गया.
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कुछ प्रश्न.....
निजी क्षेत्र में अधिकाँश लोग अच्छा-बुरा मटेरियल खरीदने में लाखों रुपये लगा देंगे, नानटेक्निकल ठेकेदार या अनस्किल्ड लेबर को लाखों रुपये दे देंगे ....लेकिन जब लाखों रुपये के निर्माण के लिए एक क्वॉलिफाइड सिविल इंजीनियर अपॉइंट करने की बात आएगी तो उसकी फ़ीस के कुछ हज़ार रुपये देने में सबसे ज्यादा कष्ट का अनुभव किया जाता है।
यह किसी एक व्यक्ति की धारणा नहीं है, बल्कि समाज में चलने वाला एक व्यापक "चलन" है....
इंजीनियरिंग की केवल सिविल ब्राँच ही ऐसी है जिसे प्रायः आम लोग कोई ज्यादा महत्व ही नहीं देते हैं।
कैसे....? तो ज़रा सोचिये...
कभी किसी को *किसी मैकेनिक द्वारा बनायी कार, स्कूटर या साइकिल भी खरीदते देखा है ?* इन सबके लिए तो एक सामान्य आदमी भी ना जाने कितने पैरामीटर्स का अध्ययन करते हुए प्रतिष्ठित कंपनी में क्वॉलिफाइड ऑटोमोबाइल इंजीनियर्स द्वारा बनाये गए, *सरकारी मानकों का पालन करने वाले वाहन* ही खरीदता है।
मिक्सर, ग्राइंडर, ज्यूसर, ट्यूबलाइट यहाँ तक की 20 रुपये का बल्ब भी एक सामान्य आदमी *ISI द्वारा तय मानकों* का ही खरीदता है।
लेकिन.....वही समझदार आदमी लाखों रूपये का मकान कैसे बिना किसी मानक को जानने वाले नानटेक्निकल ठेकेदार से क्यों बनवा लेता है ? ....सिविल इंजीनियरिंग के महत्व के प्रति जानकारी का अभाव या उदासीनता ...!
*अब बात कर लें मैंटेनेंस की-*
*60 हज़ार रूपये के एक लेपटॉप या 20 हज़ार रूपये के एक साधारण से मोबाइल* में भी उसके "एंटी वायरस, फॉर्मेटिंग, अपडेट, अपग्रेड" जैसी *"सभ्य टेक्नीकल फिरौतियों"* के लिए सभी *हर हफ्ते, महीने और साल दर साल एक निश्चित राशि चुकाते ही हैं।*
60,000 से लेकर 60,00,000 रूपये तक का कोई भी वाहन हम ले लें, लेकिन यदि हमने *मात्र एक साल के अंदर ही उस वाहन की 3 नियमित सर्विसिंग, उसी कम्पनी के वेल क्वॉलिफाइड इंजीनियरों की देखरेख में ना करवाई हो कोई भी कम्पनी उस वाहन के 1 साल चलने की ग्यारंटी भी नहीं देती है !* इसके बाद भी हर वर्ष हज़ारों रूपये हम अपने वाहन की सर्विसिंग पर ख़ुशी ख़ुशी खर्च करते हैं।
लेकिन .........
अब यहाँ प्रश्न उठता है कि 20 लाख से लेकर 20 करोड़ के मकान में शुरू के एक साल की बात तो छोड़ ही दें, *अगले 40 साल तक भी हम किसी सिविल इंजीनियर को किसी निर्माण की नियमित देखरेख के लिए बुलाते हैं ? बिलकुल नहीं।* (जब तक कि उस मकान में कोई बड़ी समस्या ना आ जाए।)
*30, 40, 50 वर्ष पुराने निर्माणों की वर्तमान स्थिति क्या है ? इसकी किसी सक्षम सिविल इंजीनियर द्वारा आवश्यक जाँच का कोई प्रावधान कहीं है? या ऐसी किसी परम्परा का पालन कितने लोग करते हैं ?*
एक बार कोई मकान बन गया या कोई छत डल गयी तो किसी क्वॉलिफाइड इंजीनियर या सँस्था के द्वारा उसकी नियमित चेकिंग आवश्यक होना चाहिए या नहीं ? स्वयं ही सोच कर देखिये।
यह सब बातें केवल इंदौर की बावड़ी की संदर्भ में ही नहीं की जा रही हैं बल्कि इस मैसेज के माध्यम से समाज में चल रहे एक "चलन" की ओर इंगित किया जा रहा है। बावड़ी की छत डलवाने वाले लोग भी देखा जाए तो उसी "चलन" का पालन कर रहे होंगे जो समाज में अधिकाँश सिविल इंजीनियरिंग निर्माणों को लेकर अपनाया जाता है।
अभी कुछ दिनों पूर्व ही मोरबी में पुल हादसा हुआ था। तब भी मैंने यह प्रश्न खड़ा किया था कि, क्या 100 साल पुराने किसी तार वाले ब्रिज पर चलती-फिरती, कूदती भीड़ द्वारा आरोपित बलों के भयावह परिणामों का आकलन एक सिविल इंजीनियर से बेहतर कोई कर सकता है क्या ? *तो ऐसे निर्माणों पर सतत निगरानी की लिए किसी नियमित इंजीनियर की नियुक्ति क्यों नहीं की जाती है ?*
निजी निर्माण हो या शासकीय निर्माण सभी में अन्य कई मदों में तो खूब पैसा खर्च किया जाता है, लेकिन एक अच्छा इंजीनियर् नियुक्त करने में सबसे अधिक किफ़ायत देखने में आती है।
सोचिये यदि इंदौर की बावड़ी को ढंकने में किसी क़्वालिफ़ाइड इंजीनियर की सलाह ली जाती तो वह निश्चित रूप से सबसे पहले तो "निर्माण अनुमति" सम्बन्धी सलाह ही देता साथ ही, यथोचित भराव या समस्त संभावित लाइव और डेड लोड की गणना करके तथा फैक्टर ऑफ़ सेफ्टी को ध्यान में रखते हुए समुचित गर्डर या RCC निर्माण की सलाह देता ही।....इसके बाद भी यदि समाज में इंजीनियरिंग की प्रति जागरूकता होती तो इस निर्माण को किये इतना समय बीत जाने पर किसी इंजीनियर द्वारा तकनीकी जाँच भी करवाई जाती।
*लेकिन मुद्दा वही है समाज में सिविल इंजीनियरिंग और सिविल इंजीनियर्स के महत्वपूर्ण रोल के प्रति जागरूकता ही नहीं है।* मेरा यह भी मानना है कि समाज में इंजीनियरिंग के प्रति सही जागरूकता फैलाना भी हम इंजीनियर्स का ही तो काम है , *लेकिन हम खुद भी इसके प्रति प्रायः उदासीन ही रहते हैं।*
इसके साथ ही सिविल इंजीनियर्स की स्वयं की "कुशलता, ज्ञान या जिम्मेदारी" भी कई बार अच्छे स्तर की नहीं होती है, इस पक्ष में सुधार भी हम इंजीनियर्स को करना भी आवश्यक है ही।
इंदौर या मोरबी जैसे हादसे सामान्य उपभोक्ताओं तथा हम इंजीनियर्स के लिए भी बड़ा सबक हैं...अतः..*निर्माण कार्यों तथा उनके मैंटेनेंस में सिविल इंजीनियरिंग की भूमिका को सुनिश्चित करने तथा लोगों में जागरुकता संचारित करने के लिए एक अभियान चलाना आवश्यक है।*
आवश्यक इसलिए भी है क्योंकि पिछले 30,40,50 वर्षों में "स्टील और कांक्रिट" के द्वारा बड़े पैमाने पर निर्माण हुए हैं, जिनमें से अधिकांश कार्य किसी सुव्यवस्थित "इंजिनियरिंग संलग्नता" के बिना ही हुए हैं। इनके मैंटेनेंस की भी स्थिति ठीक नहीं रही है। और ऐसे में कई पुराने निर्माणों में प्रयुक्त स्टील और कांक्रीट लगातार क्षरण के प्रभाव में हो सकता है। अतः भविष्य में किसी हादसे से बचने हेतु इन निर्माणों की स्थिति पर ध्यान देना अत्यन्त आवश्यक है। यह सब सिविल इंजिनियरिंग के प्रति सामाजिक जागरुकता से ही संभव हो सकेगा।
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मध्य प्रदेश के इंदौर में 30 मार्च, 2023 को बेलेश्वर महादेव झूलेलाल मंदिर में रामनवमी के दिन बावड़ी की स्लैब गिर गई थी. इस हादसे में करीब 50 लोग बावड़ी में गिर गए थे, जिनमें से 36 लोगों की मौत हो गई.
बावड़ी की गहराई करीब 80 फ़ीट है. सालों पहले बावड़ी में गिरने से दो बच्चों की मौत हो गई थी. इसके बाद नगर निगम ने बावड़ी पर लोहे की जाली लगा दी थी.
इस हादसे के बाद बावड़ी को बंद कर दिया गया.