26/06/2026
दोस्तों इस खूबसूरत पौधे को आपने देखा ही होगा, हर गांव, गली मुहल्ले में दिख जाता है। हम 90 के दशक के लोगो का जीवन रहन सहन बिल्कुल ही अलग था, आज से। इस पौधे को देख कर मैं अपने बचपन की यादों में लौट जाता हूँ, बहुत भावनात्मक जुड़ाव हैं इससे , इसी लिए इस पौधे को मैंने खरीद कर पिछले साल बरसात के मौसम में घर के सामने सड़क के किनारे लगा दिया था, देखिये एक साल से भी कम समय में यह कितना बड़ा और खूबसूरत हो चूका हैं, कितने ज्यादा फूल आना शुरू हो चुके हैं। इसी पोस्ट में इस पौधे से जुड़े सभी बातें रखूँगा। इसकी देखभाल से जुडी जानकारिया भी आप पढ़ेंगे।
मेरी माता जी को पूजा करनी होती थी, और मुझे लगता हैं गांव में सभी घरो कि महिलाएं प्रति दिन पूजा पाठ करती थी, और फूल लाने कि जिम्मेदारी हम बच्चों की थी। तब उम्र आठ दस साल रही होगी, सभी पडोसी बच्चे, आस पास के घरों, डेरों पर लगे फूलों को तोड़ने निकल जाते थे, कई महिलाएं भी फूल तोड़ने जाती थी। सबको पता होता था की कहाँ कहाँ फूल वाले पौधे लगे हैं , और जैसे ही नींद खुलती हम भागते थे। कही सारे फूल ख़त्म न हो जाये यह एक टेंशन रहा करती थी। अधिकतर फूलों वाले पेड़ छोटे रहा करते थे, जैसे गेंदा, गुड़हल (हमारे यहाँ अढ़उल कहा जाता हैं ), धतूरा, अपराजिता, गंधराज, केली, चांदनी के फूल प्रमुख थे। लेकिन फूलों के पौधे लगाने का शौक बहुत ही कम लोगो में था। आज भी वैसा ही हैं। लेकिन ठाकुर जी की मठिया पर कई सारे बड़े पेड़ होते थे कनेर के। वह यही पौधा था, जिसकी फोटो मैंने लगायी हैं। हमारे यहाँ उत्तर प्रदेश बलिया में इसे कैनेला कहा जाता हैं। इसका वैज्ञानिक नाम Nerium oleander है। इसे भगवान शिव को अर्पित करने की परंपरा भी है.
सुबह के तीन चार बजे घना अँधेरा होता था, और इसी समय को ब्रम्ह मुहूर्त कहा जाता हैं, और गांव में यह समय सभी के उठने का सामान्य समय होता था। अँधेरे में टोर्च हमारा सबसे बड़ा हथियार होता था। मठिआ पर जहाँ ये पेड़ उगे होते थे वहां जंगल था, सांप बिच्छू का खतरा भी होता था, हम टोर्च लेकर जाते थे, घने अँधेरे में टोर्च की रौशनी में फूल खोजना, ताजे फूलों की पहचान करना भी अपने आप में एक टैलेंट था। सारे फूल ख़त्म हो जाते थे लेकिन कनैला के कुछ फूल बच जाते थे, क्यूंकि इसके बड़े बड़े पेड़ भी हुआ करते थे, और सभी लोग ऊपर के फूलों तक नहीं पहुंच पाते थे। कुछ लोग जिसमे हम भी थे, पेड़ पर चढ़ कर तोड़ लेते थे। फूल मिल जाना एक बड़ा अचीवमेंट से कम नहीं होता था। और यह प्रतिदिन का पहला काम होता था।
अब जब भी मैं इस पौधे को देखता हूँ तो उन्ही ख्वाबो में खो जाता हूँ। और इस पौधे से खासा जुड़ाव मह्सुश करता हूँ , और इसी लिए मैंने इस पौधे को लेकर लगा दिया हैं अपने गार्डन में। भोपाल में सड़को पर मिटटी नहीं होता हैं, आप यदि इस क्षेत्र से जुड़े होंगे तो जानते होंगे की यहाँ सडकों और घरो को बनाते समय मिटटी नहीं कोपरा भरा जाता हैं, कोपरा पहाड़ों को काट कर आता हैं, जिसमे मिटटी कम पत्थर ज्यादा होते हैं। सरकार द्वारा इनके खनन पर प्रतिबन्ध हैं, लेकिन सिर्फ कागजों पर। तो सड़क के किनारो पत्थरों पर थोड़ी सी रेतीली पथरीली मिटटी होती हैं, वहां से थोड़े पत्थर हटा कर मिटटी भरकर मैंने इस पौधे को लगा दिया था, मतलब यह हैं की पत्थरों पर, पथरीली मिटटी में जिसमे पोषक तत्वों की काफी कमी होगी उसमे भी यह पौधा आसानी से जीवित रह सकता हैं।
गर्मियों में इसको मैं बराबर पानी डालता रहा, खाद बिलकुल भी नहीं। यह मिटटी में उपस्थित पोषक तत्वों में भी अपना बराबर विकास कर लेता हैं। लेकिन यदि आप इसे गोबर कि खाद या वर्मी कम्पोस्ट देते हैं तो इसकी ताकत कई गुना बढ़ जाएगी और बहुत तेजी से यह विकसित होगा। प्रत्येक तीन महीने में इसके मिटटी कि गुड़ाई करके सड़े हुए गोबर कि खाद या वर्मी कम्पोस्ट इसकी जड़ों में डालना चाहिए। खाद कि मात्रा पौधे की आकार के हिसाब से तय करना पड़ता हैं। कनैला की यह खूबसूरती हैं कि इसको बहुत अधिक पानी नहीं चाहिए होता हैं, कम पानी में भी यह जीवित रह सकता हैं, इसलिए सड़को के किनारे डिवाइडरों पर इसके पौधे लगाए जाते हैं।
आप सभी इस पौधे से परिचित तो होंगे ही कि इसके फूल पूजा पाठ में प्रयोग किये जाते हैं। पीले , सफ़ेद और हल्का गुलाबी रंग के भी इसके फूल खिलते हैं, और काफी पसंद किये जाते हैं। लेकिन पीले फूलों कि बात अलग ही हैं। सबसे खूबसूरत और मनमोहक लगते हैं।
इसके फल जहरीले माने जाते हैं। इसके दूध आँखों में पड़ जाये तो ऑंखें ख़राब हो जाती हैं। इसलिए यह हमें बचपन इसके फलों और दूध के बारे में आगाह किया जाता था। डराया जाता था। और आपके आस पास भी यह पौधा हैं तो खुद भी सतर्क रहें और अपने बच्चों को भी इसके बारे में जरूर बताएं, जिससे वे भी सावधान रहें।
दोस्तों इसमें फ्लेवोनोइड्स, ग्लाइकोसाइड्स, टैनिन्स और एंटीऑक्सीडेंट्स प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। कनेर के फूलों को पीसकर त्वचा पर लगाने से फोड़े-फुंसी, दाने और संक्रमण से राहत मिलती है. इसमें एंटीबैक्टीरियल और एंटी-इंफ्लेमेटरी गुण होते हैं.
बवासीर की समस्या में कनेर के फूलों का सेवन फायदेमंद साबित होता है. इसके फूलों का रस सूजन और दर्द को कम करने में मदद करता है.
कनेर के फूलों से बना तेल बालों की जड़ों को मजबूत करता है और डैंड्रफ को दूर करने में सहायक होता है. बल्कि आयुर्वेद में एक महत्वपूर्ण औषधि के रूप में भी जाना जाता है.
कनेर के फूलों का तेल या पेस्ट जोड़ो और मांसपेशियों के दर्द में लगाने से सूजन कम होती है और दर्द से छुटकारा मिलता है
क्या आपके जिंदगी में पौधों से भावनात्मक जुड़ाव के कोई किस्से हैं, तो आप हमारे साथ साझा कर सकते हैं। पेड़ पौधों हमारे अभिन्न अंग होते हैं , मेरा आपसे अनुरोध हैं की जितना ज्यादा संभव हो उतने ही ज्यादा पेड़ पौधे लगाएं। आपने इस लेख को इतने प्यार से अंत तक पढ़ा इसके लिए आपको तहे दिल से धन्यवाद। आभार।