Kishan Sakha

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यह पेज ऑर्गेनिक और प्राकृतिक कृषि को समर्पित है, जहाँ खेती को रसायनों से नहीं बल्कि प्रकृति के नियमों से जोड़ा जाता है। हमारा उद्देश्य किसानों को ऐसी खेती की जानकारी देना है जो मिट्टी को जिंदा रखे, लागत कम करे और उत्पादन को सुरक्षित व टिकाऊ बनाए।

यहाँ लहसुन की फसल में होने वाले सभी प्रमुख रोगों के 100% ऑर्गेनिक (जैविक) उपचार सरल भाषा में दिए जा रहे हैं 🌱ये उपाय खेत...
05/01/2026

यहाँ लहसुन की फसल में होने वाले सभी प्रमुख रोगों के 100% ऑर्गेनिक (जैविक) उपचार सरल भाषा में दिए जा रहे हैं 🌱
ये उपाय खेती, भंडारण और भूमि – तीनों स्तर पर काम करते हैं।

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🌿 1. सफेद सड़न (White Rot) – ऑर्गेनिक उपचार

✅ उपचार

🌱 ट्राइकोडर्मा विरिडे / हार्ज़ियानम
👉 2.5 किलो/एकड़ गोबर खाद में मिलाकर मिट्टी में डालें

🌿 नीम खली
👉 100–150 किलो/एकड़

🌞 फसल चक्र (लहसुन के बाद गेहूं/धान न लें)

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🍃 2. पर्पल ब्लॉच (बैंगनी धब्बा)

✅ उपचार

🪴 नीम तेल 1500 ppm
👉 3–5 ml/लीटर पानी छिड़काव

🌿 दशपर्णी अर्क
👉 3–5% घोल

🌱 छाछ (मठा)
👉 10% घोल, 7 दिन में 1 बार

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🌧️ 3. डाउनy मिल्ड्यू (फफूंदी रोग)

✅ उपचार

🐄 गौमूत्र अर्क
👉 5–7% घोल छिड़काव

🌿 बेकिंग सोडा + साबुन (ऑर्गेनिक)
👉 1 ग्राम/लीटर

🌞 खेत में हवा और धूप का प्रवाह रखें

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🌱 4. बेसल रॉट / जड़ सड़न

✅ उपचार

🌱 ट्राइकोडर्मा + स्यूडोमोनास

🌿 नीम खली + गोबर खाद

🚫 जलभराव बिल्कुल न होने दें

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🦠 5. स्मट रोग (काला चूर्ण)

✅ उपचार

🌿 बीज उपचार
👉 ट्राइकोडर्मा 10 ग्राम/किलो बीज

🌞 धूप में बीज सुखाकर बोएँ

🌱 गहरी जुताई करें

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🧬 6. बैक्टीरियल सॉफ्ट रॉट (गांठ सड़न)

✅ उपचार

🐄 छाछ 10% + हल्दी पाउडर

🌞 कटाई के बाद अच्छे से सुखाना

🍃 भंडारण में नीम पत्तियाँ रखें

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🧪 7. वायरल मोज़ेक रोग

✅ उपचार (वायरस का इलाज नहीं, रोकथाम जरूरी)

🌿 नीम तेल 3 ml/लीटर

🌱 लहसुन–मिर्च अर्क

🐞 एफिड कीट नियंत्रण अनिवार्य

🌱 रोगमुक्त बीज ही लगाएँ

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🐛 8. निमेटोड (सूत्रकृमि)

✅ उपचार

🌿 नीम खली 150–200 किलो/एकड़

🌱 पौधों की जड़ में ट्राइकोडर्मा

🔄 फसल चक्र (सरसों, धनिया)

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🌾 9. पोषक तत्वों की कमी (ऑर्गेनिक सुधार)

✅ उपचार

🐄 गोबर खाद / वर्मी कम्पोस्ट

🌿 जीवामृत / घनजीवामृत

🍂 पत्तों पर छाछ या मटका खाद छिड़काव

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✅ संपूर्ण जैविक सुरक्षा पैकेज (Golden Rule)

✔️ बीज उपचार – ट्राइकोडर्मा
✔️ नीम खली हर सीजन
✔️ 15 दिन में नीम तेल स्प्रे
✔️ जल निकासी सही
✔️ फसल चक्र अनिवार्य

🌱 एडवांटा की राधिका भिंडी (Radhika Okra) की खास विशेषताएँ 🌱एडवांटा सीड्स की राधिका भिंडी एक उन्नत किस्म है, जिसे किसान इ...
21/12/2025

🌱 एडवांटा की राधिका भिंडी (Radhika Okra) की खास विशेषताएँ 🌱

एडवांटा सीड्स की राधिका भिंडी एक उन्नत किस्म है, जिसे किसान इसकी उपज, गुणवत्ता और रोग सहनशीलता के कारण पसंद करते हैं।

⭐ राधिका भिंडी की प्रमुख विशेषताएँ

✔️ उच्च उपज देने वाली किस्म
राधिका भिंडी कम समय में अधिक फल देती है, जिससे किसानों को बेहतर उत्पादन मिलता है।

✔️ फल आकर्षक और कोमल
इसके फल गहरे हरे रंग के, सीधे, चमकदार और कोमल होते हैं, जो बाजार में अच्छी कीमत दिलाते हैं।

✔️ लंबे समय तक तुड़ाई
एक बार फसल लेने के बाद लंबे समय तक लगातार तुड़ाई की जा सकती है।

✔️ अगेती किस्म
बुवाई के लगभग 45–50 दिन में तुड़ाई शुरू हो जाती है।

✔️ बेहतर रोग सहनशीलता
पीला मोज़ेक, लीफ कर्ल जैसे प्रमुख रोगों के प्रति अच्छी सहनशीलता पाई जाती है (उचित प्रबंधन के साथ)।

✔️ गर्मी और वर्षा दोनों मौसम के लिए उपयुक्त
खरीफ और ग्रीष्म—दोनों सीजन में सफलतापूर्वक उगाई जा सकती है।

✔️ भंडारण और परिवहन में बेहतर
फल जल्दी खराब नहीं होते, जिससे दूर के बाजारों तक ले जाना आसान होता है।

🌾 किसानो के लिए फायदे

✅ कम लागत में ज्यादा उत्पादन
✅ बाजार में अच्छी मांग
✅ घरेलू व व्यावसायिक खेती दोनों के लिए उपयुक्त

👉 अगर आप मुनाफे वाली भिंडी की खेती करना चाहते हैं, तो एडवांटा की राधिका भिंडी एक भरोसेमंद विकल्प है।

#राधिकाभिंडी #एडवांटासीड़ #भिंडीकीखेती #उन्नतकिस्म #किसानदोस्त #सब्ज़ीखेती

🌿 दसपर्णी अर्क कैसे बनाएं और देशी तरीके से कीट नियंत्रण करें 🌿दसपर्णी अर्क जैविक खेती का एक प्रभावी, सस्ता और सुरक्षित उ...
20/12/2025

🌿 दसपर्णी अर्क कैसे बनाएं और देशी तरीके से कीट नियंत्रण करें 🌿

दसपर्णी अर्क जैविक खेती का एक प्रभावी, सस्ता और सुरक्षित उपाय है। यह कीटों, रोगों और फफूंद पर नियंत्रण करता है और फसलों को नुकसान नहीं पहुँचाता।

🌱 दसपर्णी अर्क क्या है?

“दसपर्णी” का अर्थ है 10 प्रकार की कड़वी/औषधीय पत्तियाँ। इन पत्तियों में प्राकृतिक कीटनाशक गुण होते हैं।

🍃 दसपर्णी अर्क बनाने की सामग्री

(कुल पत्तियाँ लगभग 5 किलो)

नीम

करंज

धतूरा

आक (मदार)

अरंडी

पपीता

गुड़हल

अमरूद

बेल

तुलसी

अन्य सामग्री:

गोमूत्र – 5 लीटर

गोबर – 2 किलो

गुड़ – 500 ग्राम

पानी – 20 लीटर

प्लास्टिक ड्रम / मिट्टी का बर्तन

🧪 बनाने की विधि

सभी पत्तियों को बारीक काट या कूट लें।

ड्रम में पत्तियाँ, गोमूत्र, गोबर, गुड़ और पानी डालें।

लकड़ी से अच्छी तरह मिलाएँ।

ड्रम को ढककर छायादार जगह पर रखें।

15–20 दिन तक रोज़ सुबह-शाम हिलाएँ।

जब मिश्रण गाढ़ा और तेज गंध वाला हो जाए, तो छान लें।
➡️ दसपर्णी अर्क तैयार है।

🚜 प्रयोग की विधि

1 लीटर दसपर्णी अर्क

10 लीटर पानी में मिलाकर

फसल पर स्प्रे करें

📅 7–10 दिन के अंतराल पर छिड़काव करें।

🐛 किन कीटों पर असरदार?

✔️ माहू (एफिड)
✔️ सफेद मक्खी
✔️ थ्रिप्स
✔️ इल्ली
✔️ फल छेदक
✔️ पत्ती खाने वाले कीट

🌾 फायदे

✅ 100% जैविक
✅ मिट्टी और मित्र कीटों के लिए सुरक्षित
✅ कम लागत
✅ फसल की गुणवत्ता बढ़ाता है

👉 रसायन छोड़िए, प्रकृति अपनाइए।
दसपर्णी अर्क = देसी ज्ञान + जैविक समाधान

#दसपर्णी #जैविकखेती #देशीउपाय #कीटनियंत्रण #ऑर्गेनिकफार्मिंग #किसानदोस्त #प्राकृतिककृषि

इस नींबू में क्या दे की पौधा पूरा फ्रूट से लद जाए कमेंट करके बताएं
20/12/2025

इस नींबू में क्या दे की पौधा पूरा फ्रूट से लद जाए
कमेंट करके बताएं

🌿 चने में खरपतवार रोकने के जैविक उपाय1️⃣ समय पर निंदाई–गुड़ाई (सबसे ज़रूरी)✔️ पहली निंदाई: 25–30 दिन बाद✔️ दूसरी निंदाई:...
18/12/2025

🌿 चने में खरपतवार रोकने के जैविक उपाय

1️⃣ समय पर निंदाई–गुड़ाई (सबसे ज़रूरी)

✔️ पहली निंदाई: 25–30 दिन बाद
✔️ दूसरी निंदाई: 40–45 दिन बाद
✔️ खुरपी, डोरा या हाथ से करें

👉 शुरुआती 40 दिन साफ रखेंगे तो 70% खरपतवार खुद ही खत्म हो जाते हैं।

2️⃣ मल्चिंग (ढकाव विधि)

✔️ बोआई के बाद खेत में:

सूखी घास

भूसा

फसल अवशेष

बिछा दें

👉 इससे:

खरपतवार उगते नहीं

मिट्टी की नमी बनी रहती है

तापमान संतुलित रहता है

3️⃣ ग्रीन मैन्योर / ढैंचा उपयोग

✔️ बोआई से पहले:

ढैंचा / सनई उगाकर

40–45 दिन में पलट दें

👉 इससे:

मिट्टी ढकी रहती है

खरपतवार के बीज दब जाते हैं

भूमि की उर्वरता बढ़ती है

4️⃣ बीज दर और पंक्ति दूरी सही रखें

✔️ पंक्ति दूरी: 30 सेमी
✔️ पौधा दूरी: 10 सेमी

👉 पौधे पास-पास होंगे तो खरपतवार को जगह नहीं मिलेगी।

5️⃣ जैविक घोल (खरपतवार दबाने के लिए)

🔹 छाछ का घोल

10 लीटर छाछ + 90 लीटर पानी

शुरुआती अवस्था में खेत में छिड़काव

🔹 गोमूत्र अर्क

5 लीटर गोमूत्र + 100 लीटर पानी

20–25 दिन बाद छिड़काव

👉 ये खरपतवार की बढ़त को धीमा करते हैं (पूरी तरह मारते नहीं)

6️⃣ फसल चक्र अपनाएं

✔️ चना हर साल एक ही खेत में न लगाएँ
✔️ बीच-बीच में:

ज्वार

बाजरा

तिल

👉 इससे खरपतवार का चक्र टूटता है।

🌱 देसी किसान मंत्र

“पहले 40 दिन खेत साफ — फिर चना खुद लड़ लेगा।”

पौधों की पत्तियों के रंग देखकर कई बार रोग या पोषक तत्व की कमी को आसानी से पहचाना जा सकता है। नीचे रंग के अनुसार पहचान दी...
15/12/2025

पौधों की पत्तियों के रंग देखकर कई बार रोग या पोषक तत्व की कमी को आसानी से पहचाना जा सकता है। नीचे रंग के अनुसार पहचान दी जा रही है 👇

🟢 1. पत्तियाँ हल्की पीली (Yellowing)

संभावित कारण:

नाइट्रोजन की कमी

जड़ों की कमजोरी

अधिक पानी भराव

लक्षण:

पुरानी पत्तियाँ पहले पीली होती हैं

पौधे की बढ़वार रुक जाती है

🟡 2. नसें हरी, पत्तियाँ पीली

संभावित कारण:

आयरन (लोहा) की कमी

लक्षण:

नई पत्तियाँ पीली

नसें हरी रहती हैं

🟣 3. पत्तियाँ बैंगनी / जामुनी

संभावित कारण:

फॉस्फोरस की कमी

ठंडा मौसम

लक्षण:

पत्तियाँ जामुनी

जड़ विकास कमजोर

🟤 4. पत्तियों के किनारे जलना / भूरे

संभावित कारण:

पोटाश (पोटैशियम) की कमी

लक्षण:

किनारे सूखे, जले जैसे

फल की गुणवत्ता खराब

⚫ 5. काले या भूरे धब्बे

संभावित कारण:

फंगल रोग (लीफ स्पॉट, ब्लाइट)

लक्षण:

गोल या अनियमित धब्बे

पत्तियाँ झड़ने लगती हैं

⚪ 6. सफेद पाउडर जैसा पदार्थ

संभावित कारण:

पाउडरी मिल्ड्यू (फफूंद रोग)

लक्षण:

सफेद चूर्ण

पत्तियाँ सिकुड़ती हैं

🌱 जरूरी सलाह

सिर्फ रंग देखकर निर्णय न लें, मिट्टी परीक्षण कराना बेहतर

रोग हो तो फफूंदनाशक, कमी हो तो उचित खाद दें

#कृषि_ज्ञान
ोग
#पौधों_की_देखभाल
#किसान_सलाह
#खेती_बाड़ी

🔬 माइकोराइजा क्या है?माइकोराइजा एक लाभकारी फफूंद (fungi) है, जो पौधों की जड़ों के साथ सहजीवी (symbiotic) संबंध बनाती है।...
14/12/2025

🔬 माइकोराइजा क्या है?

माइकोराइजा एक लाभकारी फफूंद (fungi) है, जो पौधों की जड़ों के साथ सहजीवी (symbiotic) संबंध बनाती है।

फफूंद पौधे की जड़ों से जुड़कर मिट्टी में बहुत दूर तक फैल जाती है

बदले में पौधा फफूंद को कार्बोहाइड्रेट देता है
👉 यानी दोनों को फायदा — यही है प्राकृतिक खेती का मूल सिद्धांत

🌾 ऑर्गेनिक कृषि में माइकोराइजा की भूमिका

माइकोराइजा रासायनिक खाद का प्राकृतिक विकल्प है और मिट्टी को जीवित बनाती है।

✅ प्रमुख फायदे

1. फॉस्फोरस का बेहतर अवशोषण

मिट्टी में मौजूद फॉस्फोरस को पौधे तक पहुँचाती है

2. जड़ों का तेज विकास

जड़ें मजबूत और फैलावदार बनती हैं

3. कम पानी में भी अच्छी फसल

सूखा सहन करने की क्षमता बढ़ती है

4. रोग प्रतिरोधक शक्ति में वृद्धि

जड़ सड़न और फंगल रोगों से सुरक्षा

5. उत्पादन और गुणवत्ता दोनों में बढ़ोतरी

6. मिट्टी की संरचना में सुधार

मिट्टी भुरभुरी और जीवाणुओं से भरपूर बनती है

🌱 किन फसलों में माइकोराइजा ज्यादा असरदार है?

🌾 गेहूं, धान, मक्का

🥦 सब्जियां (टमाटर, मिर्च, बैंगन)

🌳 फलदार पौधे (आम, केला, पपीता)

🌼 फूलों की खेती

🌿 औषधीय पौधे

> ❌ गोभी वर्ग (पत्ता गोभी, फूल गोभी) में इसका असर कम होता है

🧑‍🌾 माइकोराइजा का उपयोग कैसे करें?

1️⃣ नर्सरी में

5–10 ग्राम माइकोराइजा प्रति पौधा

जड़ों के पास मिट्टी में मिलाएं

2️⃣ खेत में रोपाई के समय

2–5 किलो माइकोराइजा प्रति एकड़

गोबर खाद या वर्मीकम्पोस्ट में मिलाकर डालें

3️⃣ ड्रिप/सिंचाई से

तरल माइकोराइजा उपलब्ध हो तो ड्रिप से भी दे सकते हैं

⚠️ ध्यान रखने योग्य बातें

रासायनिक फफूंदनाशक (fungicide) के साथ न डालें

मिट्टी में नमी होनी चाहिए

गोबर खाद, जीवामृत, घनजीवामृत के साथ उपयोग सबसे अच्छा

🌍 माइकोराइजा और प्राकृतिक खेती

जीरो बजट प्राकृतिक खेती (ZBNF)

जैविक खेती

रीजेनेरेटिव एग्रीकल्चर

👉 माइकोराइजा मिट्टी को जिंदा करती है, सिर्फ फसल नहीं उगाती

🕉️ निष्कर्ष

माइकोराइजा आधारित ऑर्गेनिक कृषि
✔️ लागत कम
✔️ उत्पादन अधिक
✔️ मिट्टी स्वस्थ
✔️ पर्यावरण सुरक्षित

यह आधुनिक विज्ञान द्वारा प्रमाणित वही ज्ञान है, जिसे प्रकृति सदियों से सिखा रही है।
#माइकोराइजा #ऑर्गेनिक_खेती #प्राकृतिक_कृषि #जैविक_खाद #मिट्टी_स्वास्थ्य #किसान_कल्याण

🌱 ऑर्गेनिक पोटाश (जैविक पोटैशियम खाद) बनाने की विधिऑर्गेनिक पोटाश फसलों में फूल, फल, दाना भराव, मिठास और रोग प्रतिरोधक क...
13/12/2025

🌱 ऑर्गेनिक पोटाश (जैविक पोटैशियम खाद) बनाने की विधि

ऑर्गेनिक पोटाश फसलों में फूल, फल, दाना भराव, मिठास और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने में बहुत उपयोगी होता है। इसे घर पर प्राकृतिक तरीकों से बनाया जा सकता है।

🔥 विधि 1: लकड़ी की राख से ऑर्गेनिक पोटाश (सबसे प्रभावी)

सामग्री

बिना रंग/केमिकल की लकड़ी की राख

पानी

बनाने व उपयोग की विधि

1. 1 किलो लकड़ी की राख को 10 लीटर पानी में मिलाएँ

2. 24 घंटे ढककर रखें

3. ऊपर का साफ पानी छान लें

4. 1 लीटर घोल को 10 लीटर पानी में मिलाकर सिंचाई करें

✔ केला, आलू, टमाटर, गन्ना, फूलदार पौधों के लिए श्रेष्ठ

⚠️ ध्यान रखें: अधिक मात्रा मिट्टी को क्षारीय बना सकती है

🍌 विधि 2: केले के छिलकों से पोटाश

सामग्री

केले के सूखे छिलके

विधि

1. छिलकों को धूप में सुखाकर पीस लें

2. 1–2 चम्मच पाउडर पौधे की जड़ में मिलाएँ

3. या 24 घंटे पानी में भिगोकर तरल रूप में दें

✔ सब्ज़ी और बागवानी के लिए सुरक्षित

🌿 विधि 3: गोबर + फसल अवशेष से पोटाश कम्पोस्ट

सामग्री

गोबर

सूखी पत्तियाँ / भूसा

राख (थोड़ी मात्रा)

विधि

1. सभी सामग्री को परतों में ढेर करें

2. 30–40 दिन सड़ने दें

3. तैयार खाद खेत में डालें

✔ मिट्टी की संरचना भी सुधरती है

🧂 विधि 4: गुड़ + गोमूत्र तरल पोटाश

सामग्री

गोमूत्र – 10 लीटर

गुड़ – 250 ग्राम

राख – 500 ग्राम

विधि

1. सबको मिलाकर 7 दिन ढककर रखें

2. रोज़ 1 बार हिलाएँ

3. छानकर 1:10 अनुपात में पानी मिलाकर प्रयोग करें

🌾 उपयोग का सही समय

फूल आने से पहले

फल/दाना बनने के समय

शाम या सुबह छिड़काव करें

⚠️ सावधानियाँ

❌ ज्यादा मात्रा नुकसानदायक
❌ क्षारीय मिट्टी में राख कम डालें
❌ पत्तों पर सीधे सूखी राख न डालें

🌾 गेहूं की खेती में रोग आ जाएँ तो मेहनत की पूरी फसल खतरे में पड़ जाती है।लेकिन अगर समय पर सही स्प्रे शेड्यूल अपनाया जाए,...
12/12/2025

🌾 गेहूं की खेती में रोग आ जाएँ तो मेहनत की पूरी फसल खतरे में पड़ जाती है।
लेकिन अगर समय पर सही स्प्रे शेड्यूल अपनाया जाए, तो रतुआ, झुलसा, मिल्ड्यू जैसे बड़े रोग भी आसानी से नियंत्रित हो जाते हैं।

कई किसान भाइयों को सही समय पर दवा कब और कितनी मात्रा में डालनी है—यह साफ जानकारी नहीं मिलती।
इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए हमने आपके लिए पूरे सीजन का आसान और असरदार रोग-नियंत्रण शेड्यूल तैयार किया है👇

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✅ गेहूं का पूरा स्प्रे शेड्यूल (Seed to Harvest)

1️⃣ बीज उपचार:
कार्बेन्डाजिम या टेबुकोनाजोल से बीज ट्रीटमेंट — जड़ गलन, करनाल बंट 70% तक कम।

2️⃣ पहला स्प्रे (25–30 दिन):
मानकोजेब / हेक्साकोनाजोल — पीली रतुआ और झुलसा पर प्रभावी।

3️⃣ दूसरा स्प्रे (45–50 दिन):
प्रोपिकोनाज़ोल / टेबुकोनाजोल — रतुआ व पाउडरी मिल्ड्यू नियंत्रण।

4️⃣ तीसरा स्प्रे (65–70 दिन):
Opera या मानकोजेब + कार्बेन्डाजिम — दाने बनते समय फसल की सुरक्षा।

5️⃣ चौथा स्प्रे (85–90 दिन):
हेक्साकोनाज़ोल — अंतिम चरण का झुलसा और रतुआ नियंत्रण।

🌱 ध्यान रखें:
✔ स्प्रे के लिए 200 लीटर पानी प्रति एकड़
✔ खेत में पानी न रुके
✔ पार्टली संक्रमित पौधों को तुरंत हटाएँ

🌾 सही समय पर सही दवा = अधिक उपज + स्वस्थ फसल
आपकी फसल हरी-भरी रहे, यही शुभकामना! 🌿🙏
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🌾 1. करनाल बंट (Karnal Bunt / Tellya रोग)👉 लक्षणदानों में काला पाउडर जैसे फफूंदी दिखाई देती हैदानों में बदबू आती है✅ उपा...
12/12/2025

🌾 1. करनाल बंट (Karnal Bunt / Tellya रोग)

👉 लक्षण

दानों में काला पाउडर जैसे फफूंदी दिखाई देती है

दानों में बदबू आती है

✅ उपाय

बीज उपचार: टेबुकोनाज़ोल 1 g/kg या कार्बेन्डाजिम 2 g/kg

रोगग्रस्त दानों को खेत से हटाएँ

समय पर बुवाई करें
एक

🍃 2. झुलसा रोग (Leaf Blight)

👉 लक्षण

पत्तियों पर भूरे/काले धब्बे

पत्तियाँ सूखने लगती हैं

✅ उपाय

मानकोजेब 2.5 ग्राम/लीटर पानी में मिलाकर 10–12 दिन के अंतर पर छिड़काव

खेत में सफाई और संतुलित खाद

🍂 3. पीली रतुआ (Yellow Rust)

👉 लक्षण

पत्तियों पर पीली धारियाँ

फसल कमजोर होकर गिरने लगती है

✅ उपाय

प्रारम्भिक अवस्था में प्रोपिकोनाज़ोल 1 ml/litre या टेबुकोनाजोल स्प्रे

संक्रमित पौधों को तुरंत हटाएँ

रतुआ-रोधी किस्में बोएँ (जैसे WH-1105, HD-3086)

🔥 4. काला रतुआ (Black Rust)

👉 लक्षण

पत्तियों, तनों पर काले दानों जैसे फफूंद

तेजी से फैलकर उपज कम करता है

✅ उपाय

हेक्साकोनाज़ोल या प्रोपिकोनाज़ोल 1 ml/litre छिड़काव

खेत में अत्यधिक नमी न रहें

🌿 5. पाउडरी मिल्ड्यू (Powdery Mildew)

👉 लक्षण

पत्तियों पर सफेद चूर्ण जैसा पाउडर

बाद में पत्तियाँ सूख जाती हैं

✅ उपाय

सल्फर 2–3 g/litre स्प्रे

प्रोपिकोनाज़ोल भी प्रभावी

🌱 6. झुलसा (Blast Disease)

👉 लक्षण

पत्तियों पर छोटे-छोटे धब्बे जो बड़े होकर पत्तियाँ जला देते हैं

✅ उपाय

ट्राइजोफॉस + मैनकोजेब स्प्रे

फसल में संतुलित नाइट्रोजन का प्रयोग

🐛 7. जड़ सड़न व गलन रोग (Root Rot)

👉 लक्षण

पौधे जड़ से सड़ने लगते हैं

फसल पीली होकर रुक जाती है

✅ उपाय

बीज उपचार: थायरम + कार्बेन्डाजिम (2.5 g/kg seed)

खेत में जलभराव न होने दें

🌾 रोग रोकथाम के मुख्य उपाय

बीज उपचार अनिवार्य करें

समय पर बुवाई (देरी से बुवाई में रोग बढ़ते हैं)

संतुलित NPK का उपयोग

खेत में नमी प्रबंधन रखें

फसल अवशेष जलने से बचें; सफाई रखें

रोग-रोधी किस्मों का उपयोग

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