Shrikantlavaniya

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1.रोग और निदान(Disease and Diagnosis), लकवा(Paralysis)औषधि नं-1औषधि के लिये लहसुन बड़ी गांठ वाला जिसमें से अधिक रस निकाल...
23/12/2017

1.रोग और निदान(Disease and Diagnosis), लकवा(Paralysis)
औषधि नं-1
औषधि के लिये लहसुन बड़ी गांठ वाला जिसमें से अधिक रस निकाल सकें ले।
विधि- लहसुन की आठ कली लेकर छील लें फिर इसे बारीक चटनी की तरह पीस लें फिर गाय का दूध लेकर उबाल लें,अब थोड़ा सा दूध अलग कर लें उसमें शक्कर मिला दें,जब यह दूध हल्का गरम रह जाय तो इस दूध में लहसुन मिलाकर पी जायें,ऊपर से इच्छा अनुसार जितना चाहें दूध पियें। परंतु ध्यान रखें लहसुन कभी
खौलते दूध में न मिलावें वरना उसके गुण नष्ट हो जायेंगे। दिन में दो बार ये विधि करें। इस प्रकार दिन में दो बार इसका सेवन करें। तीन दिन तक दोनों समय लेने के बाद इसकी मात्रा बढ़ाकर9या10कलियां कर दें। एक हफ्ते बाद कम से कम20कली लहसुन लें। इसी तरह तीन बाद फिर बढ़ाकर40कली का रस दूध से लें। इसके बाद अब इनकी मात्रा घटाने का समय है जैसे-जैसे बढ़ाया वैसे-वैसे ही घटाते जाना है तीन-तीन दिन पर यानी-
पहली बार – 8कली लहसुन की लें लेत रहें
बार तीन दिन बाद- 10कली लहसुन की लें लेते रहें
बार 1सप्ताह बाद –20कली लहसुन की लें लेते रहें
बार 1सप्ताह बाद-40कली लहसुन की लें लेते रहें
इसका सेवन करने से और भी लाभ है पेशाब खुलकर होगा।
दस्त साफ होने लगेगी शरीर की चेतना शक्ति बढ़ने लगेगी तथा पक्षाघात का असर धीरे-धीरे कम होने लगेगा। अगर उच्चरक्त चाप है तो यह प्रयोग काफी कारगर सिद्ध हो सकता है।
औषधि नं-2
मोटी पोथी वाला1मोटा दाना लहसुन का लेकर छीलकर पीस लें बारीक और इसे चाट लें ऊपर से गाय का दूध हल्का गर्म चीनी डालकर पी जायें। अब दूसरे दिन2लहसुन की चटनी चाट कर दूध पी जायें। तीसरे दिन तीन लहसुन,चौथे दिन चार कली इसी तरह से ग्यारह दिन तक11लहसुन पीसकर चाटें व दूध पी जायें। अब बारहवें दिन से1-1कली लहसुन की घटाती जायें तथा सेवन की विधि वहीं होगी। एक लहसुन की संख्या आ जाने पर बंद कर दें पीना। इससे हाई ब्लड प्रेशर का असर कम होगा। पक्षाघात का प्रभाव कम होगा। सर का भारी पन ठीक होगा। नींद अच्छी आयेगी। दस्त खुलकर होगा। भूख अच्छी लगेगी। (अगर आप सामान्य तरीके से रोज लहसुन खायें तो इसका खतरा ही नहीं होगा।)
औषधि नं-3
लहसुन व शतावर-7-8कली लहसुन,शतावर का चूर्ण1तोला दोनों को खरल में डालकर घोंट लें,आधा किलो दूध में शक्कर मिलाकर लहसुन शतावर पिसा हुआ मिलाकर पी जायें इसे लेने पर हल्का सुपाच्य भोजन लें। शरीर के हर अंग का भारी पन ठीक होगा साथ पक्षाघात में फायदा होगा। इसे31दिन लगातार लें।
औषधि नं-4
लहसुन,शतावर चूर्ण,असगंध चूर्ण-1चाय का बड़ा चशतावर चूर्ण,उतनी ही मात्रा में असगंध चूर्ण दोनों चूर्ण को दूध में मिलाकर पियें साथ दोपहर के भोजन के साथ लहसुन लें। लहसुन की मात्रा धीरे-धीरे बढ़ाते जायें,रोटी,आंवला,लहसुन का प्रयोग भोजन में अवश्य करें। शरीर की मालिश भी करें इन सभी विधियों से पक्षाघात में जल्दी व सरलता से मरीज ठीक होता है।
औषधि नं-5
लहसुन छीलकर पीस लें3-4कली,फिर उसमें उतनी ही मात्रा में शहद मिला कर चाटें। धीरे-धीरे लहसुन की मात्रा बढ़ाते जायें1-1कली करके कम से कम11-11कली तक पहुंचे साथ बराबर मात्रा में शहद भी मिलाकर चाटें। साथ लहसुन का रस किसी तेल में मिलाकर उस प्रभावित हिस्से पर लेप,मालिश हल्के हाथ से करें। लहसुन के रस को थोड़ा गरम करके लगायें धीरे-धीरे काफी फायदा पहुंचेगा लहसुन से रक्त संचार ठीक तरह से होता है।
औषधि नं-6
दो पोथी पूरी मोटे दाने वाले पीसकर रस निकाल लें अब इसे चार तोला तिल के तेल या सरसों के तेल में मिलाकर पकायें,जब सिर्फ तेल रह जाये तो छानकर इस तेल से सुबह,शाम मालिश करें लकवा,वात रोग मिट जायेगा। अगर आप तिल का तेल इस्तेमाल करें ज्यादा अच्छा होगा।
औषधि नं-7
पक्षाघात के रोगी को आप लहसुन की चटनी को मख्खन के समभाग के साथ भी दे सकते हैं(लहसुन मख्खन बराबर मात्रा) में। यह सुरक्षित योग है इसे प्रातः सांय दोनों समय प्रयोग कर सकते हैं।

20/03/2017

जीवन उपयोगी कुंजियां

त्रिफला चूर्ण

लाभ – आँखों की सुजन, लालिमा, दृष्टिमांद्य, कब्ज, मधुमेह, मूत्ररोग, त्वचा-विकार, जीर्णज्वर व पीलिया में लाभदायक |

शंखपुष्पी सिरप

लाभ – चक्कर आना, थकावट अनुभव करना, मानसिक तनाव, सहनशक्ति का अभाव, चिडचिडापन, निद्रल्पता, मन की अशांति तथा उच्च रक्तचाप आदि रोगों में लाभप्रद स्मरणशक्ति बढाने हेतु एक दिव्य औषधि |

वसंत ऋतु में बीमारियों से सुरक्षा

वसंत ऋतू में सर्दी-खाँसी, गले की तकलीफ, दमा, बुखार, पाचन की गडबडी, मंदाग्नि, उलटी-दस्त आदि बीमारियाँ अधिकांशत: देखने को मिलती हैं | नीचे कुछ सरल घरेलू उपाय दिये जा रहे हैं, जिन्हें अपनाकर आसानी से इन रोगों से छुटकारा पाया जा सकता हैं |

मंदाग्नि :
10 – 10 ग्राम सौंठ, कालीमिर्च, पीपर व सेंधा नमक सभी को कूटकर चूर्ण बना लें | इसमें 400 ग्राम काली द्राक्ष (बीज निकाली हुई) मिलायें और चटनी की तरह पीस के काँच के बर्तन में भरकर रख दें | लगभग 5 ग्राम सुवह-शाम खाने से भूख खुलकर लगती है |

कफ, खाँसी और दमा :
4 चम्मच अडूसे के पत्तों के ताजे रस में 1 चम्मच शहद मिलाकर दिन में 2 बार खाली पेट लें | (रस के स्थान पर अडूसा अर्क समभाग पानी मिलाकर उपयोग कर सकते हैं |) खाँसी, दमा, क्षयरोग आदि कफजन्य तकलीफों में यह उपयोगी है | इनमें गोझरण वटी भी अत्यंत उपयोगी हैं | गोझरण वटी की 2 से ४ गोलियाँ दिन में 2 बार पानी के साथ लेने से कफ का शमन होता हैं तथा कफ व वायुजन्य तकलीफों में लाभ होता हैं |

दस्त :
इसबगोल में दही मिलाकर लेने से लाभ होता है | अथवा मूँग की दाल की खिचड़ी में देशी घी अच्छी मात्रा में डालकर खाने से पानी जैसे पतले दस्त में फायदा होता है |

दमे का दौरा :
अ] साँस फूलने पर २० मि.ली.तिल का तेल गुनगुना करके पीने से तुरंत राहत मिलती हैं |

आ] सरसों के तेल में थोडा-सा कपूर मिलाकर पीठ पर मालिश करें | इससे बलगम पिघलकर बाहर आ जायेगा और साँस लेने में आसानी होती है |

इ] उबलते हुए पानी में अजवायन डालकर भाप सुंघाने से श्वास-नलियाँ खुलती हैं और राहत मिलती है |

मंडूकासन
इस आसन में शरीर मंडूक (मेढ़क) जैसा दिखता है | अत: इसे मंडूकासन कहते हैं |

लाभ : १] प्राण और अपान की एकता होती है | वायु-विकारवालों के लिए यह आसन रामबाण के समान है | यह आसन ऊर्ध्व वायु और अधोवायु का निष्कासन करता है |

२] पेट के अधिकांश रोगों में लाभप्रद है व तोंद कम होती है | अतिरिक्त चरबी दूर होती है |

३] मधुमेह में विशेष लाभ होता है |

४] रीढ़ की हड्डी मजबूत होती है |

५] पंजों को बल मिलता हैं और उछलने की क्षमता बढती है |

६] शरीर में हलकापन व आराम महसूस होता है |

७] जोड़ों व घुटनों के दर्द में राहत होती है |

विशेष : जो सामान्य (13 से 15 प्रति मिनट) से ज्यादा श्वास लेते हों, उनको यह आसन अवश्य करना चाहिये |

विधि : दोनों पैरों को पीछे की तरफ मोडकर (वज्रासन में ) बोथे | घुटनों को आपस में मिलाएं | हथेलियों को एक के ऊपर एक रखकर नाभि पर इसप्रकार रखें कि दायें हाथ की हथेली ठीक नाभि पर आये | फिर श्वास छोड़ते हुए शरीर को आगे की और झुकाये और सीने को घुटनों से लगाये | सिर उठाकर दृष्टि सामने रखें | 4 – 5 सेंकड इसी स्थिति में रुकें, फिर श्वास भरते हुए वज्रासन की स्थिति में आए | 3 – 4 बार यह प्रक्रिया दोहराये |

पुष्टिवर्धक प्रयोग
छोटे बच्चे और गर्भवती माताएँ १५ से २५ ग्राम भुनी हुई मूँगफली पुराने गुड के साथ खायें तो उन्हें बहुत पुष्टि मिलती हैं | जिन माताओं का दूध पर्याप्त मात्रा में न उतरता हो, उनके लिए भी इनका सेवन लाभप्रद है |

अनेक रोगों की एक दवा –

कंद-सब्जियों में श्रेष्ठ -सूरन
सूरन (जमीकंद)पचने में हलका,कफ एवं वात शामक, रुचिवर्धक, शूलहर, मासिक धर्म बढानेवाला व बलवर्धक हैं | सफेद सूरन अरुचि, मंदाग्नि, कब्ज, पेटदर्द, वायुगोला, आमवात तथा यकृत व् प्लीहा के मरीजों के लिए एवं कृमि, खाँसी व् श्वास की तकलीफवालों के लिए उपयोगी हैं | सूरन पोषक रसों के अवशोषण में मदद करके शरीर में शक्ति उत्पन्न करता हैं | बेचैनी, अपच, गैस, खट्टी डकारे, हाथ-पैरों का दर्द आदि में तथा शरीरिक रुप से कमजोर व्यक्तियों के लिए सूरन लाभदायी हैं |

सूरन की लाल व सफेद इन दो प्रजातियों में से सफेद प्रजाति का उपयोग सब्जी के रूप में विशेष तौर पर किया जाता हैं |

बवासीर में रामबाण औषधि

सूरन के टुकड़ों को पहले उबाल लें और फिर सुखाकर उनका चूर्ण बना लें | यह चूर्ण ३२० ग्राम, चित्रक १६० ग्राम, सौंठ ४० ग्राम, काली मिर्च २० ग्राम एवं गुड १ किला – इन सबको मिलाकर देशी बेर जैसी छोटी-छोटी गोलियाँ बना लें | इसे ‘सूरन वटक’ कहते हैं | प्रतिदिन सुबह-शाम ३ – ३ गोलियाँ खाने से बवासीर में खूब लाभ होता हैं |सूरन के टुकड़ों को भाप में पका लें और टिल के तेल में सब्जी बनाकर खायें एवं ऊपर से छाछ पियें | इससे सभीप्रकार की बवासीर में लाभ होता हैं | यह प्रयोग ३० दिन तक करें | खूनी बवासीर में सूरन की सब्जी के साथ इमली की पत्तियाँ एवं चावल खाने से लाभ होता हैं |

सावधानी – त्वचा-विकार, ह्रदयरोग, रक्तस्त्राव एवं कोढ़ के रोगियों को सूरन का सेवन नही करना चाहिए | अत्यंत कमजोर व्यक्ति के लिए उबाला हुआ सूरन पथ्य होने पर भी इसका ज्यादा मात्रा से निरंतर सेवन हानि करता हैं | सूरन के उपयोग से यदि मुँह आना, कंठदाह या खुजली जैसा हो तो नींबू अथवा इमली का सेवन करें |

हर्निया(Harnia) कितने प्रकार का होता है व क्यों होता हैहर्निया आज एक आम रोग हो गया है लेकिन अभी भी बहुत से लोग पीड़ित है...
04/10/2016

हर्निया(Harnia) कितने प्रकार का होता है व क्यों होता है

हर्निया आज एक आम रोग हो गया है लेकिन अभी भी बहुत से लोग पीड़ित हैं। लेकिन या तो वह इस बीमारी से अभी तक अनभिज्ञ हैं

या फिर डॉक्टर के पास तभी जाते हैं, जब तकलीफ असहनीय हो जाती है। या ये कहे की आज की भाग दौड़ वाली जिंदगी में किसी के पास भी समय नहीं है की वो अपने शरीर का ध्यान रख सके ! उन्हें लगता है की जब तक काम चल रहा है चलाओ जब तकलीफ जायदा हो जाती है तब डॉक्टर याद आता है लेकिन वो लोग ये नहीं सोचते की यदि किसी भी बीमारी को समय पैर उपचार करवा लिया जाये तो एक तो उस बीमारी से जल्दी छुटकारा मिल जाएगा और दूसरे समय और धन दोनों की बचत होगी ! आमतौर पर लोग हर्निया के इलाज से केवल इसलिए बचते हैं, क्योंकि उन्हें इसके लिए ऑपरेशन करवाना होगा। वे ऑपरेशन के डर से हर्निया का इलाज करवाने से बचते हैं, लेकिन वह यह नहीं जानते कि हर्निया का एकमात्र इलाज ऑपरेशन ही है। यह समस्या महिलाओं व पुरुषों दोनों को हो सकती है, यदि उम्र के हिसाब से देखें तो यह या तो 10 साल से कम उमर के बच्चों या 40 साल की उम्र के बाद इसके होने के चांस ज्यादा होते हैं और जैसे जैसे उम्र बढती जाती है वैसे वैसे इस रोग के होने के चांस भी बढ़ जाते हैं पर यदि हम शरीर के प्रति जागरूक हैं और नियमित व्यायाम करते हैं प्राणयाम करते हैं तो हम सभी बिमारियों से बच सकते हैं !

हर्निया क्या होता है ?

मनुष्य के शरीर के अंदर कुछ अंग खोखले स्थानों में मौजूद होते हैं। इन खोखले स्थानों को बॉडी केविटी कहते हैं। दरअसल बॉडी केविटी चमड़ी की झिल्ली से ढकी होती है। जब इन केविटी की झिल्लियां कभी-कभी फट जाती हैं तो अंग का कुछ भाग बाहर निकल जाता है। इस विकृति को ही हर्निया कहा जाता है।

लंबे समय तक खांसी या भारी सामान उठाने के कारण मांसपेशियों के कमजोर हो जाने की वजह से हर्निया के होने की संभावना ज्यादा होती है। हालांकि हर्निया के कोई खास लक्षण नहीं होते, लेकिन कुछ लोग में सूजन और दर्द की शिकायत हो सकती है। इस प्रकार का दर्द खड़े होने, मांसपेशियों में खिंचाव होने या कुछ भारी सामान उठाने पर बढ़ सकता है। हर्निया वैसे तो एक बहुत ही सामान्य सी समस्या है किन्तु लापरवाही इसे गंभीर रोग में तब्दील कर सकती है। शरीर के कमजोर उतकों को ठेल कर बाहर निकल आए अंदरूनी अंग जख्मी हो सकते हैं तथा उनमें सडऩ तक पैदा हो सकती है।

इस को लेकर अधिकांश लोग लापरवाह होते हैं। इनमें भी उन महिलाओं की संख्या ही ज्यादा होती है जो इसे सामान्य विकार समझने की भूल करती हैं। महिलाओं में यह समस्या आम तौर पर प्रसव के बाद उत्पन्न होती है। वे डॉक्टर के पास तभी जाते हैं, जब उनकी पीड़ा बर्दाश्त से बाहर चली जाती है। कई लोग तो डॉक्टर के पास महज इसलिए नहीं जाते कि ऑपरेशन कराना पड़ेगा। वे ऑपरेशन के भय से अपनी बीमारी को बढ़ाते रहते हैं। पर अंतत: उन्हें ऑपरेशन कराना ही पड़ता है।

शल्य क्रिया, बढ़ती उम्र या अन्य कारणों से उतकों में कमजोरी आ जाती है। शरीर के अंदरूनी अंग एक झिल्ली में सुरक्षित रहते हैं।
उतकों के कमजोर पडऩे पर जब भी हम ज्यादा जोर लगाते हैं कोई न कोई अंदरूनी अंग इस झिल्ली को भेद कर शरीर से बाहर उभर आता है। इसका एकमात्र इलाज सर्जरी है तथा इसमें देर करने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

हर्निया होने के लक्षण :-

पेट की चर्बी या आंतों का बाहर की ओर निकलना
चमड़ी के नीचे एक उभार महसूस होना
उभार में दर्द और भारीपन
खड़े रहने, मल-मूत्र त्यागने में परेशानी
अक्सर खांसने से या बहुत बुरी तरह खाँसी होना भी एक वजह हैं।
ज़्यादा छींकने से।
बहुत ज़्यादा और लगातार उल्टी होने से।
दबाव
तनाव
इसका मुख्य कारण पेट का मोटापा हो सकता हैं।
ये गर्भवती स्त्रियो को डिलीवरी के समय अधिक ज़ोर लगाने के कारण भी हो सकता हैं।
हर्निया कितने प्रकार का होता है ?

नाभि का (अम्बिलिकल) हर्निया :- नाभि हर्निया अर्थात अम्बिलाइकल हर्निया, हर्निया का ही एक साधारण रूप होता है। इस में पेट की सबसे कमजोर मांसपेशी, हर्निया की थैली नाभि से बाहर निकल आती है। यह कमजोर मांसपेशियों वाले या मोटे व्यक्तियों को अधिक होता है। हालांकि यह हर्निया के कुल मामलों का 8 से 10 प्रतिशत ही होता है।

वंक्षण हर्निया (Inguinal hernia) (डाइरेक्ट, इन्डाइरेक्ट) :- यह जांघ के जोड़ में होता है। इस में अंडकोष जांघ की पचली नली से अंडकोष में खिसक जाते हैं। ऐसा होने पर अंडकोष का आकार बढ़ जाता है। अंडकोष में सूजन हो जाने के कारण हाइड्रोसिल और हर्निया में अंतर करना मुश्किल हो जाता है। हर्निया का यह प्रकार पुरुषों में पाया जाता है। हर्निया के लगभग 70 प्रतिशत रोगियों को ये हर्निया ही होता है।

फीमोरल हर्निया :- फीमोरल अर्थात जघनास्थिक हर्निया, हर्निया के कुल मामलों में से लगभग 20 प्रतिशत ही होता है। इस में पेट के अंग जांघ की पैर में जाने वाली धमनी में मौजूद मुंह से बाहर निकल आते हैं। इस धमनी का काम पैर में खून की आपूर्ति करना होता है। फीमोरल हर्नियापुरुषों की तुलना में महिलाओं को अधिक होता है।

इन्सिजनल हर्निया :- पुरानी सर्जरी वाले स्थान से अंगों के बाहर निकलने को इन्सिजनल हर्निया कहा जाता है।

हर्निया होने के कारण :- धूम्रपान, जन्म से, बढ़ती उम्र, चोट लगना, पुराना ऑपरेशन, भारी वजन उठाना, पुरानी खांसी, मोटापा, कब्ज, पेशाब में रुकावट, गर्भावस्था, पेट की मांसपेशियों की कमजोरी, पेट की मांसपेशियों में विकार।

हर्निया का उपचार :- इस का एकमात्र सफल और कारगर उपाय ऑपरेशन है, जिसकी अनेक विधियां मौजूद हैं। छोटे बच्चों के मामले में चीरा लगाकर या उभार वाले भाग को भीतर कर क्षतिग्रस्त हिस्से को रिपेयर कर देते हैं। मरीज के घाव भरने में 10 से 15 दिन का वक्त लगता है। मरीज को दो-तीन महीने तक भारी काम नहीं करने की सलाह दी जाती है।

दूरबीन पद्धति बेहतर विकल्प

दूरबीन पद्धति (लैप्रोस्कोपी) से हर्निया के आपरेशन के अच्छे परिणाम सामने आते हैं और मरीज को एक-दो दिन में छुट्टी दे दी जाती है। कुछ ही समय में वह अपनी सामान्य दिनचर्या शुरू कर सकता है। इसमें टांके के निशान भी प्राय: दिखाई नहीं देते। 90 प्रतिशत मामलों में दोबारा हर्निया होने की आशंका नहीं रहती है। दस प्रतिशत प्रकरणों में वह दोबारा हो सकता है। जिस जगह से शरीर को भेदकर भीतरी अंग बाहर आ जाते हैं, उस स्थान को मजबूती देने के लिए मैश का इस्तेमाल किया जाता है। प्रभावित स्थान को मैश लगाकर मजबूत कर देने के बाद मरीज को दोबारा हर्निया होने की संभावना बहुत कम हो जाती है।

हर्निया से बचने के उपाय :-

उन कार्यों से बचना चाहिए, जो हमारे पेट की मांसपेशियों पर अधिक दबाव डालते हों।
वजन भी संतुलित रखना चाहिए।
अगर कब्ज की समस्या है तो इसका तुरंत उपचार कीजिए।
रेशेदार पदार्थों का सेवन करें।

सावधानिया।

1. धूम्रापान, शराब का सेवन, मीट मांस, ये सब बंद कर दीजिये।

2. चाय कॉफ़ी का सेवन बंद कर दीजिये।

3. कभी भी पेट भर कर या भूख से ज़्यादा भोजन ना करे।

हर्निया के लिए सरल घरेलु उपचार।

1. रोगी को अधिक से अधिक पानी घूँट घूँट भर कर पीना चाहिए।

2. अगर रोगी का वजन बढ़ा हुआ हैं, तो सब से पहले उसको अपना वजन नियंत्रित करना चाहिए।

3. खाना खाने के तुरंत बाद रोगी को सोना नहीं चाहिए, थोड़ी वाकिंग ज़रूर करे।

4. 1 चम्मच सेब का सिरका भोजन के एक घंटे के बाद एक गिलास पानी में डाल कर धीरे धीरे घूँट घूँट कर के पिए।

5. सुबह दोपहर और शाम आधा आधा चम्मच कच्चा जीरा चबा चबा कर खाए, और ऊपर से गुनगुना पानी पी ले।

6. रात को सोने से पहले एक चम्मच अर्जुन की छाल और एक चौथाई दाल चीनी एक गिलास पानी में आधा रहने तक उबाले और फिर छान कर नित्य पिए।

7. सुबह खाली पेट एलो वेरा जूस ज़रूर पिए, एक गिलास पानी में कम से कम ३० मिली एलो वेरा डालिये और इसको घूँट घूँट कर पी लीजिये।

8. शाम के समय 2 केले रोज़ाना खाए।

9. अलसी एक सुपर फ़ूड हैं, गर्मियों में 1 चम्मच अलसी के बीज कच्चे या भूने हुए और सर्दियों में ३ चम्मच खाए। इसमें मौजूद ओमेगा-3 हायटल हर्निया के लिए बहुत फायदेमंद हैं।

10. रात को एक चम्मच मेथी दाना एक गिलास पानी में भिगो कर रख दीजिये और सुबह मेथी दाना चबा चबा कर खा लीजिये और इस पानी को घूँट घूँट कर के पी लीजिये।

11. भोजन में जौं (oat) के आटे को शामिल करे।

मेथी दाना और दाल चीनी दोनों ही गर्म हैं, इस लिए गर्मियों में इन दोनों में से सिर्फ एक ही चीज इस्तेमाल करे।

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05/09/2016

ओ३म्
पेट के कीड़ों का सत प्रतिशत इलाज.............. वायविडंग............................................................ हमारे पेट में कुछ परजीवी अपना आसरा बनाकर रहते हुए। कुछ शरीर से बाहर निवास करते हैं तो कुछ शरीर के अन्दर हमारे ही भोजन पर निर्भर रहते हैं।
ये जीव अपनी संख्या में वृद्धि कर हमारे शरीर को नुकसान पहुंचाते है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार ये परजीवी गोलकृमी,फीता कृमी,पिनकृमी आदि नामों से जाने जाते हैं। इनमें कुछ हेल्मिन्थवर्ग के जीव हैं। जो धीरे-धीरे अपनी संख्या को बढाते हैं। कुछ सूक्ष्म जीव अमीबा। जैसे होते हैं जो शरीर में सहजीवी के रूप में रहते हैं तथा शरीर में पाचन सहित मल निर्माण क़ी प्रक्रिया में भी भाग लेते है।
लेकिन कुछ जीव परजीवी के रूप में रहकर आतों क़ी श्लेष्मा झिल्ली को नुकसान पहुंचाते हैं। आयुर्वेद में भी इन कृमियों के इलाज के लिए कुछ नुस्खे बताये गए हैं। जो इन्हें खींच कर बाहर निकालते हैं तथा इनकी प्रकृति से उलट होने के कारण इन्हें जीने के विपरीत वातावरण बना देते हैं। इसके अलावा यदि इनके उत्पन्न होने वाले कारणों को छोड़ दिया जाए तो ये फिर कभी नहीं पनपते हैं। आयुर्वेद में बताये गए 20 प्रकार के इन कृमियों की चिकित्सा हेतु कुछ नायाब नुस्खे निम्न हैं , जिनका उचित प्रयोग इन्हें निर्मूल कर सकता है ।
औषधि और सेवन :-...........................अजवायन का चूर्ण बनाकर आधा ग्राम लेकर समभग गुड में गोली बनाकर दिन में तीन बार खिलाने से सभी प्रकार के पेट के कीडे नष्ट होते है।

सुबह उठते ही बच्चे दस ग्राम (और बडे २५ ग्राम) गुड खाकर दस - पन्द्रह मिनट आराम करें। इससे आंतों में चिपके सब कीडे निकलकर एक जगह जमा हो जायेंगे। फिर बच्चे आधा ग्राम (और बडे एक - दो ग्राम) अजवायन का चुर्ण बासी पानी के साथ खायें। इससे आंतों में मौजूद सब प्रकार के कीडे एकदम नष्ट होकर मल के साथ शीघ्र ही बाहर निकल जाते हैं।

कृमी नाशक ,,अच्युताय कोष्ठ शुद्धि कल्प ,, खाने से पेट के कीडों का नाश होता है।

अजवायन चूर्ण आधा ग्राम में चुटकी भर काला नमक मिलाकर रात्रि के समय रोजाना गर्म जल से देने से बालकों के कीडे नष्ट होते हैं। बडे अजवायन के चुर्ण चार भाग में काला नमक एक भाग मिलाकर दो ग्राम की मात्रा से गर्म पानी के साथ लें।

अजवायन का चूर्ण आधा ग्राम, साठ ग्राम मट्ठे या छाछ के साथ और बडो को दो ग्राम १२५ ग्राम मट्ठे के साथ देने से पेट के कीडे नष्ट होकर मल के साथ बाहर निकल जाते है।

कमीला और बायबिडंग दोनो को बराबर बराबर लेकर पीस लें, बच्चों को एक ग्राम और बडों को तीन ग्राम सोने से पूर्व रात को दूध से दें,कीडे मर कर पेट से बाहर निकल जायेंगे।

करंज क़ी गिरी ,पलाश के बीज,देशी अजवाइन और विडंग इन सबको मिलाकर चूर्ण बनाकर 4,6 ग्राम क़ी मात्रा में गुड के साथ गुनगुने पानी से देने पर पेट के कृमी नष्ट होते हैं।

पारसीक अजवायन ,नागरमोथा,पीपर,काकडासींगी,वायविडंग। एवं अतीश को समभाग लेकर 4,6 ग्राम क़ी मात्रा में गुड के साथ खिलाने से पेट के कृमी मर कर बाहर निकल जाते हैं।

भद्रमुस्तादीक्वाथ, कृमीमुद्गररस, कृमीकुठाररस,विडंगारिष्ट,मुस्तकारिष्ट आदि कुछ ऐसी आयुर्वेदिक औषधियां हैं जिनका चिकित्सक के निर्देशन में प्रयोग बच्चों से लेकर बड़ों तक के पेट में पाए जानेवाले कीड़ों को दूर कर सकता है आवश्यकता है तो सिर्फ अच्छी तरह से धोकर उबालकर और पकाकर भोजन करने की।

भात के मांड में बायविडंग और त्रिफ़ला का चूर्ण डालकर पीने से पेट के कीडों का नाश होता है।

पांच ग्राम ढाक के बीज लेकर मट्ठे के साथ रात को निगल जायें,सुबह मल में मरे हुये कीडे निकल जायेंगे।

सिर के कृमी :-

धतूरे के पत्तों का रस या पान के पत्तों का रस को कपूर मिलाकर एक कपडे के टूकडे में लेप करें,अब इस कपडे को सिर में बांधकर रात में आराम से सो जाएँ प्रात:काल बालों को अच्छी तरह धोइए इससे सिर के सारे कृमी मर जायेंगे ।

पलाश के बीज वायविडंग। चिरायता और नीम के सूखे पत्ते समान भाग में लेकर धतूरे के पत्ते के स्वरस के साथ पीसकर मालिश या लेप करें त्वचा या बालों के कृमी दूर हो जाते हैं।
\\ ओ३म् //
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06/07/2016

आयुर्वेदिक तेल एक ऐसी उपचार पद्धति जो आपको हर तरह के दर्द से राहत तो दिलाता ही है दूसरा इसका कोई साइड इफेक्ट भी नहीं होता। आयुर्वेद पूर्णतावादी उपचार विज्ञान है व सभी लोगों के लिये पूर्ण स्वास्थ्य प्राप्त करने की संपूर्ण योजना को शामिल करता है। बावजूद इस तथ्य के कि आयुर्वेद की उत्पत्ति हजारों सालों पहले हुई, आयुर्वेद वर्तमान वैज्ञानिक जगत में समान रूप से प्रासंगिक है। आयुर्वेदिक तेल मालिश कई तरह के शारीरिक कष्ट को दूर करती है।

शंखपुष्पी तेल :- शंखपुष्पी तेल की मालिश से बच्चों के समस्त रोग दूर हो जाते हैं व यह कांति, मेधा, धृति व पुष्ठि की वृद्धि करता है। ज्वर व दुर्बलता को मिटाता है। बच्चों के सूखा रोग में इस तेल के उपयोग से विशेष लाभ होता है।

महामाष तेल :- पक्षाघात, अर्दित, अपतन्त्रक, अपबाहुक, विश्वाची, खंज, पंगुता, सिर का जकड़ना, गर्दन का जकड़ना, वातिक अधिमांद्य, शुक्रक्षय, कर्णनाद आदि में लाभ प्रदान करता है।

काशीसादि तेल : व्रण शोधक तथा रोपण है। इसके लगाने से बवासीर के मस्से नष्ट हो जाते हैं। नाड़ी व्रण एवं दूषित व्रणों के उपचार हेतु लाभकारी। प्रयोग विधि :- बवासीर में दिन में तीन चार बार गुदा में लगाना अथवा रूई भिगोकर रखना।

लक्ष्मीविलास तेल :- लक्ष्मीविलास तेल की मालिश करने से मस्तिष्क रोग, स्नायु रोग, स्नायविक दुर्बलता, प्रमेह, वात-व्याधि, मूर्छा, उन्माद, अपस्मार, ग्रहणी, पांडु रोग, शोथ, नंपुसकता, वातरक्त, मूढ गर्भ, आर्तव व शुक्रगत दोषों में लाभ मिलता है।

चंदनबला लाशादि तेल : इसके प्रयोग से सातों धातुएं बढ़ती हैं तथा वात विकार नष्ट होते हैं। कास, श्वास, क्षय, शारीरिक क्षीणता, दाह, रक्तपित्त, खुजली, शिररोग, नेत्रदाह, सूजन, पांडू व पुराने ज्वर में उपयोगी है। दुबले-पतले शरीर को पुष्ट करता है। बच्चों के लिए सूखा रोग में लाभकारी। सुबह व रात्रि को मालिश करना चाहिए।

जात्यादि तेल : नाड़ी व्रण (नासूर), जख्म व फोड़े के जख्म को भरता है। कटे या जलने से उत्पन्न घावों को व्रणोपचार के लिए उत्तम। प्रयोग विधि :- जख्म को साफ करके तेल लगावें या कपड़ा भिगोकर बांधें।

महानारायण तेल :- सब प्रकार के वात रोग, पक्षघात (लकवा), कब्ज, बहरापन, गतिभंग, कमर का दर्द, अंत्रवृद्धि, पार्श्व शूल, रीढ़ की हड्डी का दर्द, गात्र शोथ, इन्द्रिय ध्वंस, वीर्य क्षय, ज्वर क्षय, दन्त रोग, पंगुता आदि की प्रसिद्ध औषधि। सेवन में दो-तीन बार पूरे शरीर में मालिश करना चाहिए। मात्रा 1 से 3 ग्राम दूध के साथ पीना चाहिए।

महाभृंगराज तेल :- बालों का गिरना बंद करता है तथा गंज को मिटाकर बालों को बढ़ाता है। असमय सफेद हुए बालों को काला करता है। माथे को ठंडा करता है। प्रयोग विधि : सिर पर धीरे-धीरे मालिश करना चाहिए।

महामरिचादि तेल :- खाज, खुजली, कुष्ठ, दाद, विस्फोटक, बिवाई, फोड़े-फुंसी, मुंह के दाग व झाई आदि चर्म रोगों और रक्त रोगों के लिए प्रसिद्ध तेल से त्वचा के काले व नीले दाग नष्ट होकर त्वचा स्वच्छ होती है। सुबह व रात्रि को मालिश करना चाहिए।

महाविषगर्भ तेल :- सभी तरह के वात रोगों की प्रसिद्ध औषधि। जोड़ों की सूजन समस्त शरीर में दर्द, गठिया, हाथ-पांव का रह जाना, लकवा, कंपन्न, आधा सीसी, शरीर शून्य हो जाना, नजला, कर्णनाद, गण्डमाला आदि रोगों पर। सुबह व रात्रि मालिश करें।

महालाक्षादि तेल :- सब प्रकार के ज्वर, विषम ज्वर, जीर्ण ज्वर व तपेदिक नष्ट करता है। कास, श्वास, जुकाम, हाथ-पैरों की जलन, पसीने की दुर्गन्ध शरीर का टूटना, हड्डी के दर्द, पसली के दर्द, वात रोगों को नष्ट करता है। बल, वीर्य कांति बढ़ाता है तथा शरीर पुष्ट करता है। सुबह व रात्रि मालिश करना चाहिए।

षडबिंदु तेल :- इस तेल के व्यवहार से गले के ऊपर के रोग जैसे सिर दर्द, सर्दी, जुकाम, नजला, पीनस आदि में लाभ होता है। सेवन : दिन में दो-तीन बार 5-6 बूंद नाक में डालकर सूंघना चाहिए।

सैंधवादि तेल :- सभी प्रकार के वृद्धि रोगों में इस तेल के प्रयोग से अच्छा लाभ होता है। आमवात, कमर व घुटने के दर्द आदि में उपयोगी है।

जैतून तेल :- त्वचा को नरम करता है तथा चर्म रोगों में जलन आदि पर लाभप्रद है।

नीम तेल :- कृमि रोग, चर्म रोग, जख्म व बवासीर में लाभकारी।

बादाम तेल असली :- दिमाग को ताकत देता है, नींद लाता है, सिर दर्द व दिमाग की खुश्की दूर करता है। मस्तिष्क का कार्य करने वालों को लाभप्रद है। अर्श रोगियों तथा गर्भवती स्त्रियों को लाभकारी। सेवन : सिर पर मालिश करें तथा 3 से 6 ग्राम तक दूध में डालकर पीना चाहिए।

बावची तेल :- सफेद दाग (चकत्ते) तथा अन्य कुष्ट रोगों पर।

मालकंगनी तेल :- वात व्याधियों में उपयुक्त।

लौंग तेल :- सिर दर्द व दांत दर्द में अक्सीर है।

विल्व तेल :- कान दर्द, कान में आवाज तथा सनसनाहट होने पर बहरापन दूर करने में विशेष उपयोगी।

Appendicitis(अन्त्रपुच्छ) मेरा सैकड़ों बार अनुभूत नुस्खा जिसने हर बार आशा से अधिक परिणाम दिया है एक बार आप भी आजमाएं इसे...
28/05/2016

Appendicitis(अन्त्रपुच्छ)

मेरा सैकड़ों बार अनुभूत नुस्खा जिसने हर बार आशा से अधिक परिणाम दिया है एक बार आप भी आजमाएं इसे ज्यादा से ज्यादा शेयर करें ताकि लोग लाभ उठा सकें एलोपैथी में इसका इलाज केवल ऑपरेशन ही बताते हैं पोस्ट बाय :श्रीकान्त लवानिया।
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Appendicitis का दर्द जिसे होता है वो ईश्वर से प्रार्थना करता है या तो उसे उठा ले या इस दर्द से मुक्ति दिलादे, इस दर्द से सदैव के लिए मुक्ति हेतु अगर आप एपेंङीसाईटिस का आपरेशन कराने की सोच रहे हैं तो एक बार इसे जरूर अजमाए जंगल की एक बूटी है
जिसका नाम होता है " बनतुलसा " उसको पीसकर लुगदी बना लें और किसी साफ लोहे की कड़ाही या तबे आदि पर सिर्फ गर्म करें (भुने नहीं ) उसपर थोडा सा नमक छिड़क दें और दर्द वाले स्थान पर उस लुगदी की टिकिया को रख कर बांध दें और 16 घंटे बाद पहले वाली को हटाकर फिर से दूसरी बांध दें इस तरह 48 घंटे में इसे 3 बार बाँधना है बिना बिलम्ब किये 48 घंटे के बाद रोग सदैव के लिए जाता रहेगा.

कद लंबा करे -अश्वगंधा,चंद्रसूर दोनो को ही आयुर्वेद में शारीरिक विकास केलिए महत्वपूर्ण जडीबूटी माना गया है।सामान 1- 20 ग्...
06/01/2016

कद लंबा करे -
अश्वगंधा,चंद्रसूर दोनो को ही आयुर्वेद में शारीरिक विकास के
लिए महत्वपूर्ण जडीबूटी माना गया है।
सामान 1- 20 ग्राम सूखी नागौरी अश्वगंध, हालों या चंद्रसूर
2-30 ग्राम हलंग,हालों या चंद्रसूर जो एक ही चीज के नाम है 3-
20 ग्राम देशी चीनी।
खीर बनाने की विधि- सूखी नागौरी अश्वगंधा को बारीक
कूट-पीस लें। चंद्रसूर को साफ़ करके गाय के 250 ग्राम दूध मे
हलकी आंच पर पका ले जब प्रैशर कूकर की एक सीटी बज जाए तब
उतार कर बारीक किया हुआ अश्वगंधा व चीनी डाल कर ढक कर
थोडा सेक लग्वा दें। यह खीर हर रोज रात को सोते समय खाएं व
लगातार 120/se 150 दिन इसतेमाल करके नतीजा खुद देख ल

उफ़्फ़ ये खांसी के ठसकेआजकल खांसी के ठसके एक आम समस्या है, जो ख़ास तौर परसुबह शाम नहाने और भोजन के बाद चलते हैं। कभी कभी धु...
27/12/2015

उफ़्फ़ ये खांसी के ठसके
आजकल खांसी के ठसके एक आम समस्या है, जो ख़ास तौर पर
सुबह शाम नहाने और भोजन के बाद चलते हैं। कभी कभी धुल धुएँ
और तेज गंध से भी ये शुरू हो जाते हैं और काफी समय तक गले के
भीतर गुदगुदाते रहते हैं।
आमतौर पर खांसी होने का मतलब है कि हमारा श्वासन तंत्र
ठीक से काम नहीं कर रहा है। साथ ही खांसी गले में कुछ
तकलीफ होने की और भी इशारा करती है।
हालांकि यह साबित हो चुका है कि तीन हफ्ते से ज्यादा
खांसी होने पर टीबी की जांच करवा लेनी चाहिए क्योंकि
लापरवाही बरतने से खांसी बढ़कर टीबी का रूप ले सकती है।
खांसी होने पर पानी पीना चाहिए या फिर पीठ को सहलाने
से आराम मिलता है।
खाना खाते या बोलते समय खांसी आए तो खाने को धीरे-धीरे
छोटी-छोटी बाइट में खाना चाहिए।
खांसी होने पर खांसी को रोकने के लिए आमतौर पर
मूंगफली,चटपटी व खट्टी चीजें, ठंडा पानी, दही, अचार, खट्टे
फल, केला, कोल्ड ड्रिंक, इमली, तली-भुनी चीजों को खाने से
मना किया जाता है।
श्वसन तंत्र के रोगों में फेफड़ों के रोग, श्वासनली के रोग सहित
इस तंत्र के अन्य रोग शामिल हैं। श्वसन तंत्र के रोगों में
स्वयंसीमित सर्दी-जुकाम से लेकर जीवाणुजन्य न्यूमोनिया जैसे
घातक रोग हैं।
सूखी खांसी
यह खांसी आवाज करती हुई विस्फोटक नि:श्वसन होती है।
इसका उद्देश्य श्वांस-प्रणाली या सांस की नली से नि:स्राव
या फंसा हुआ कोई बाहरी पदार्थ को निकाल फेंकना होती है।
यह स्वत: होनेवाली एक परावर्तक क्रिया के रूप में होती है या
स्वेच्छा से की जाती है। खांसी श्वसन व्याधियों का सबसे
सामान्य लक्षण है। खांसी होने के निम्नलिखित कारण है-
(क) शोथज या सूजन की स्थितियां 1.
वायु मार्ग की शोथज स्थितियां- फेरिन्जाइटिस,
टांसिलाइटिस श्वसन-यंत्र शोथ, श्वसन-प्रणाली शोथ, श्वसनी
शोथ एवं श्वसनिका शोथ,
2. फुफ्फुसों की शोथज या सूजन की स्थितियां-न्यूमोनिया
एवं ब्रोंकोन्यूमोनिया, फुफ्फुस-विद्रधि, यक्ष्मा, फुफ्फुसों के
फंगस रोग।
(ख) यान्त्रिक कारण
1. धूम्रपान करने के कारण, धुंआ, धूल या क्षोभकारी गैसों के
सूंघने के कारण,
2. वायु-मार्ग पर किसी अबुर्द (ट्यूमर), ग्रेन्यूलोमा, महाधमनी
एन्यूरिज्म या मीडियास्टिनम में स्थित किसी पिण्ड द्वारा
पड़ रहे दबाव के कारण,
3. श्वसन नलिका के अन्दर कोई बाहरी वस्तु फंस जाने के कारण,
4. श्वसनी-नलिकाओं की संकीर्णता, श्वसनी दमा, तीव्र या
पुराना श्वसनी शोथ तथा
5. पुराना इंफेक्शन।
(ग) ताप उत्तेजना ठंडी या गर्म हवा का झोंका लगना या
मौसम में अचानक परिवर्तन होने के कारण भी खांसी या तो
सूखी होती है या गीली अर्थात् बलगम के साथ होती है।
साधारणत: ऐसी खाँसी ऊपरी वायु मार्ग फेरिंग्स, स्वर यंत्र,
श्वास प्रणाली या श्वसनी में हुए क्षोभ के कारण होती है।
इसके कई विशिष्ठ प्रकार हैं:
1. धातु ध्वनि खांसी: ऐसी खांसी फैरिंग्स में धूम्रपान से उत्पन्न
प्रणाली शोथ या बड़े श्वसनियों में ब्रोंकाइटिस के प्रथम स्टेज
में क्षोथ होने के कारण होती है।
2. कर्कश खांसी: ऐसी खांसी गले में कोई विक्षति होने के
कारण होती है।
3. घर्घर के साथ खांसी: ऐसी खांसी श्वसन के दौरान आवाज
करती हुई प्रश्वसनी कष्ठ-श्वास अर्थात् घर्घर के साथ होती है।
ऐसी खांसी स्वरयंत्र में डिफ्थीरिया होने के कारण भी होती
है।
4. कूकर-खांसी: ऐसी खांसी छोटी-छोटी तीखी व सांस
छोड़ते समय के बाद एक लम्बी, आवाज करती हुई तथा सांस लेने में
‘हूप’ के साथ होती है। ऐसी खांसी कूकर खांसी में होती है।
5. गो-खांसी: इसमें कोई विस्फोटक आवाज नहीं होती। इस
खांसी की आवाज कुत्ते के रोने या गाय की डकार जैसी होती
है। ऐसी खांसी स्वर-यंत्र रोगग्रस्त में होती है।
6. हल्की, आधी दबी हुई कष्टदायी खांसी: ऐसी खांसी शुष्क
प्लूरिसी में होती है।
गीली खांसी
गीली खांसी ऐसी खांसी है जिसके होने से बलगम निकलता है
जो श्लेष्माभ, सपूय या श्लेष्म-पूयी होती है। श्लेष्माभ बलगम
श्लेष्मा का बना होता है जो श्वसनी ग्रंथियों द्वारा सृजित
होता है। यह गाढ़ा, लस्सेदार, उजले रंग का होता है। ऐसा बलगम
तीव्र श्वसनीय शोथ में, न्यूमोनिया के प्रथम चरण में अथवा
यक्ष्मा की प्रारम्भिक अवस्था में निकलता है।
बलगम गाढ़ा या पतला पूय का बना होता है तथा पीला या
हरा-पीला रंग का होता है। इस प्रकार का बलगम पुराना
श्वसनी शोथ में, पुराना संक्रमी दमा में, श्वसनी-विस्फार,
न्यूमोनिया की देर वाले अवस्था में फुफ्फुस विद्रधि (फेफड़े के
अंदर फोड़ा) या यक्ष्मा के बढ़े हुए स्वरूप में मिलता है।
श्लेष्म पूयी बलगम हल्के पीले रंग का होता है। ऐसा बलगम सपूय
बलगम वाली व्याधियों (जैसा ऊपर बताया गया है) की
प्राथमिक अवस्थाओं में निकलता है।
दुर्गंध करता हुआ बलगम फुफ्फुस विद्रधि, फुफ्फुसी गैंग्रीन तथा
श्वसनी विस्फार की स्थितियों में निकलता है।
रक्त में सना बलगम रक्तनिष्ठीवन का परिचायक होता है।
झाग वाला, गुलाबी रंग का बलगम फुफ्फुसी शोथ से निकलता
है।
हरा रंग का बलगम फुफ्फुसी गैंग्रीन में निकलता है।
काला बलगम कोयला-खदानी फुफ्फुस धूलिमयता में निकलता
है।
लोहे पर लगे जंग के रंग का बलगम बिगड़े हुए न्यूमोनिया में,
कत्थे के रंग का या बादामी रंग की चटनी जैसा बलगम फुफ्फुसी
अमीबिक रुग्णता में अथवा ऐसे यकृत अमीबी विद्रधि में जो
फटकर किसी श्वसनी से सम्पर्क स्थापित कर लिया हो,
मिलता है।
सुनहला बलगम ऐस्बेटॉस रुग्णता से निकलता है।
आयुर्वेद में खांसी का उपचार
खांसी का उपचार जितनी जल्दी हो जाएं उतना बेहतर है।
आयुर्वेद में खांसी का स्थायी इलाज भी मौजूद हैं। आयुर्वेद के
अनुसार, जब कफ सूखकर फेफड़ों और श्वसन अंगों पर जम जाता है
तो खांसी होती है। आयुर्वेद की औषधिंयां खांसी में इतनी
प्रभावशाली होती हैं कि इन्हें कोई भी आसानी से ले सकता
है।
कुछ गोलियों को चूसने से भी खांसी में आराम मिलता है। जैसे
व्योषादि वटी, लवंगादि वटी, खदिरादि वटी आदि।
चंदामृत रस भी खांसी में अच्छा रहता है।
हींग, त्रिफला, मुलहठी और मिश्री को नीबू के रस में मिलाकर
लेने से खांसी कम करने में मदद मिलती है।
त्रिफला और शहद बराबर मात्रा में मिलाकर लेने से भी फायदा
होता है।
गले में खराश होने पर कंटकारी अवलेह आधा-आधा चम्मच दो
बार पानी से या ऐसे ही लें।
कनकासव 3 3 चम्मच गर्म जल से भोजन के बाद सेवन तथा
वासकासव का भी इसी प्रकार प्रयोग करें।
पीपली, काली मिर्च, सौंठ और मुलहठी का चूर्ण बनाकर
चौथाई चम्मच शहद के साथ लेना अच्छा रहता है।
पान का पत्ता और थोड़ी-सी अजवायन पानी में चुटकी भर
काला नमक व शहद मिलाकर लेना भी खांसी में लाभदायक
होता है। खासकर बच्चों के लिए।
बताशे में काली मिर्च डालकर चबाने से भी खांसी में कमी
आती है।
खांसी से बचने के सावधानी बरतते हुए फ्रिज में रखी ठंडी
चीजों को न खाएं। धुएं और धूल से बचें। खांसी के आयुर्वेदिक
इलाज के लिए जरूरी है कि किसी अनुभवी चिकित्सक से संपर्क
किया जाएं। अपने आप आयुर्वेदिक चीजों का सेवन विपरीत
प्रभाव भी डाल सकता है।
खाँसी के घरेलू उपचार
सर्दी, खांसी, सिरदर्द, जुकाम जैसी कुछ बीमारियां होती हैं
जो किसी को भी किसी भी समय हो सकती है। खांसी की
समस्या होने पर आप सुकून से कोई काम नहीं कर सकते हैं। खांसी
बदलता मौसम, ठंडा-गर्म खाना पीना या फिर धूल या किसी
अन्य चीज से एलर्जी के कारण सकती है । खांसी होने पर
तकलीफ भी ज्यादा होती है। आइए हम आपको खांसी से बचने
के कुछ आसान से उपायों के बारे में बताते हैं।
*सौंठ को पीस कर पानी में खूब देर तक उबालें। जब एक चौथाई
रह जाए तो इसका सेवन गुनगुना होने पर दिन में तीन चार बार
करें। तुरंत फायदा होगा।
*गुनगुने पानी से गरारे करने से गले को भी आराम मिलता है और
खांसी भी कम होती है।
*तुलसी पत्ते, 5 काली मिर्च, 5 नग काला मनुक्का, 6 ग्राम गेहूँ
के आटे का चोकर , 6 ग्राम मुलहठी, 3 ग्राम बनफशा के फूल लेकर
200 ग्राम पानी में उबालें। 1 /2 रहने पर ठंडा कर छान लें। फिर
गर्म करके बताशे डालकर रात सोते समय गरम-गरम पी जाएँ और
चादर ओढ़कर सो जाएँ तथा हवा से बचें। कैसी भी खुश्क खाँसी
हो, ठीक हो जाएगी।
*काली मिर्च, हरड़े का चूर्ण, तथा पिप्पली का काढ़ा बना
कर दिन में दो बार लेने से खाँसी जल्दी दूर होती है।
*1 चम्मच शहद में पिसी हुई कालीमिर्च मिलाकर पीने से भी
खांसी जल्दी ही दूर हो जाती है|
*1 चम्मच अदरक का रस में एक चोथाई शहद एवं चुटकी भर हल्दी
मिलाकर लेने से खांसी जल्दी ही दूर हो जाती है।
*मूली का रस और दूध को बराबर मिलाकर 1 -1 चम्मच दिन में छह
बार लेने से भी शीघ्र लाभ मिलता है ।
*हींग, काली मिर्च और नागरमोथा को पीसकर गुड़ के साथ
मिलाकर गोलियाँ बना लें। प्रतिदिन भोजन के बाद दो
गोलियों का सेवन करने से खाँसी और कफ में लाभ मिलता है ।
*1 चम्मच अजवाइन एवं हल्दी मिलाकर गरम कर ले,फिर उसे ठंडा
होने के बाद शहद मिलाकर पीने से खांसी जल्दी ही दूर हो
जाती है।*खांसी होने पर सेंधा नमक की डली को आग पर अच्छे
से गरम कर लीजिए। जब नमक की डली गर्म होकर लाल हो जाए
तो तुरंत आधा कप पानी में डालकर निकाल लीजिए। उसके बाद
इस नमकीन पानी को पी लीजिए। ऐसा पानी 2-3 दिन सोते
वक्त पीने पर खांसी समाप्त हो जाती है।
*शहद, किशमिश और मुनक्के को मिलाकर लेने से खांसी जल्दी
ही ठीक हो जाती है।
मेरे अनुभव से कुछ कारगर अद्भुत प्रयोग
तुलसी के पत्ते, 5 काली मिर्च, 5 नग काला मनुक्का, 6 ग्राम
चोकर (गेहूँ के आटे का छान), 6 ग्राम मुलहठी, 3 ग्राम बनफशा के
फूल लेकर 200 ग्राम पानी में उबालें। 100 ग्राम रहने पर ठंडा कर
छान लें। फिर गर्म करें और बताशे डालकर रात सोते समय गरम-गरम
पी जाएँ। पीने के बाद ओढ़कर सो जाएँ तथा हवा से बचें।
आवश्यकतानुसार 3-4 दिन लें, कैसी भी खुश्क खाँसी हो, ठीक
हो जाएगी।
उपाय 2- सेंधा नमक (लाहौरी, पाकिस्तानी नमक) की एक सौ
ग्राम जितनी डली खरीदकर घर में रख लें। जब भी किसी को
खाँसी हो, इस सेंधा नमक की डली को चिमटे से पकड़कर आग
पर, गैस पर या तवे पर अच्छी तरह गर्म कर लें। जब लाल होने लगे तब
गर्म डली को तुरंत आधा कप पानी में डुबोकर निकाल लें और
नमकीन गर्म पानी को एक ही बार में पी जाएँ। ऐसा नमकीन
पानी सोते समय लगातार दो-तीन दिन पीने से खाँसी,
विशेषकर बलगमी खाँसी को पूर्ण आराम आ जाता है।
विशेष- (1) एक बार काम लेने के बाद नमक की डली को सुखाकर
रख दें। इस प्रकार इसे बार-बार काम में लिया जा सकता है।
उपाय 3- इसी से मिलता-जुलता एक अन्य प्रयोग इस प्रकार है-
एक ग्राम सेंधा नमक और पानी में 125 ग्राम को गर्म तवे पर छमक
दें। आधा रहे तब पी लें। सुबह-शाम पीने से खाँसी कुछ ही दिन में
मिट जाएगी।
खाँसी कोई रोग नहीं होता। यह गले में हो रही खराश और
उत्तेजना की सहज प्रतिक्रिया होती है। असल में खाँसी गले
और सांस की नलियों को खुला रखने के लिए काफी महत्वपूर्ण
होती है, पर हद से ज़्यादा होनेवाली खाँसी किसी न किसी
बीमारी या रोग से जुड़ी होती है। कुछ खाँसीयां सूखी होती
हैं, और कुछ बलगम वाली।
खाँसी तीव्र या पुरानी होती है:
*. तीव्र खाँसी अचानक शुरू हो जाती हैं, और सर्दी-ज़ुकाम, फ्लू
या सायनस के संक्रमण के कारण होती है। यह आम तौर से दो या
तीन हफ़्तों में ठीक हो जाती है।
*. पुरानी या दीर्घकालीन खाँसी दो तीन हफ़्तों से ज़्यादा
जारी रहती है।
योगिक क्रिया खांसी के लिए
मुद्रा- बाएं हाथ का अंगूठा सीधा खडा कर दाहिने हाथ से
बाएं हाथ कि अंगुलियों में परस्पर फँसाते हुए दोनों पंजों को ऐसे
जोडें कि दाहिना अंगूठा बाएं अंगूठे को बहार से कवर कर ले ,इस
प्रकार जो मुद्रा बनेगी उसे अंगुष्ठ मुद्रा कहेंगे।
लाभ - अंगूठे में अग्नि तत्व होता है.इस मुद्रा के अभ्यास से शरीर
में गर्मी बढऩे लगती है. शरीर में जमा कफ तत्व सूखकर नष्ट हो
जाता है।सर्दी जुकाम,खांसी इत्यादि रोगों में यह बड़ा
लाभदायी होता है, कभी यदि शीत प्रकोप में आ जाए और
शरीर में ठण्ड से कपकपाहट होने लगे तो इस मुद्रा का प्रयोग
लाभदायक होता है। रोज दस मिनट इस मुद्रा को करने से बहुत
कफ होने पर भी राहत मिलती है। कफ शीघ्र ही सुख जाता है।
साथ ही जरा सा सेंधा नमक धीरे धीरे चूसने से लाभ होता है।
सुबह कोमल सूर्यकिरणों में बैठके दायें नाक से श्वास लेकर सवा
मिनट रोकें और बायें से छोड़ें। ऐसा 3-4 बार करें। इससे कफ की
शिकायतें दूर होंगी।
सर्दी-खांसी का रोग अक्सर कब्जियत, तापमान में परिवर्तन,
आवश्यकता से अधिक भोजन लेने और कच्ची शक्कर खाने से हो
सकता है। अगर यह रोग किसी व्यक्ति को हो जाता है तो उसे
इलाज के साथ-साथ गुनगुना पानी पिलाना चाहिए तथा कब्ज
को दूर करने का उपचार करना चाहिए। सर्दी-खांसी का
उपचार एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा करने से रोगी को बहुत
आराम मिलता है।
एक्यूप्रेशर चिकित्सा के द्वारा सर्दी-खांसी रोग का उपचार-
दक्षिण नासा रंध्र के पास तथा कपाल के ऊपर के भाग के वाम
में दो बिंदु निर्देशित हैं
(प्रतिबिम्ब बिन्दु पर दबाव डालकर एक्यूप्रेशर चिकित्सा
द्वारा इलाज करने का चित्र)
सर्दी तथा खांसी से पीड़ित व्यक्ति को एक्यूप्रेशर
चिकित्सा के द्वारा प्रेशर देने से व्यक्ति को बहुत आराम
मिलता है। इस चिकित्सा के द्वारा यह प्रेशर दिन में 2-3 बार
देना चाहिए।

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Agra
283122

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