21/08/2023
प्राकृतिक पत्तलों का प्रयोग कर करें ईश्वर की आराधना, पारंपरिक भोज, धार्मिक अनुष्ठान और तीज त्योहार 🙏...
पर्यावरण प्रदूषण को मिटाना है तो पहले दिमाग के प्रदूषण को हटाना जरूरी है। अक्सर देखने मे आता है कि परावर्ण पर बड़े बड़े लेक्चर पेलने वाले, बड़ी बड़ी बातें करने वाले लोग भी अपने आसपास प्लास्टिक का पहाड़ खड़ा किये नजर आते हैं।
स्वयं जब तक सिंगल यूज्ड प्लास्टिक का उपयोग बंद नही करेंगे किसी और को संदेश देने में कोई फायदा नही होगा। प्लास्टिक के नुकसान को मैं बताऊँ तो वह सही हो जाएगा ऐसी कोई बात नही है, यह कितना हानिकारक।है, कितना विषैला है सभी जानते हैं, लेकिन मानता फिर भी कोई नही है। हर कोई चाहता है कि भगतसिंह दूसरे के घर पैदा हो। मतलब समझ रहे हैं न आप, कि दूसरे के घर सभी चाहते हैं कि पत्तियों की पत्तल में भोज हो, लेकिन अपने घर प्लास्टिक की मजबूरी है। वजह उलब्धता की गिनायेंगे। अरे भाई जब डिमांड ही नही है तो कोई चीज उपलब्ध कैसे होगी। इससे हमारे वनवासी पत्तल बनाने वाले भाइयों को रोजगार भी मिलेगा।
पोस्ट की एक चित्र में ऐसे ही जंगली क्षेत्र पातालकोट से पत्तल निर्माता हमारे भाई हैं वही उस पत्तल को पूजन कार्यों में घर घर पहुँचाता मेरा एक विद्यार्थी है। आप इस पोस्ट को शेयर करके इसे पर्यावरण योद्धाओं की मदद करेंगे अपने आप के चारो ओर का पर्यावरण शुद्ध बनाने में प्लास्टिक मुक्त बनाने में मदद करेंगे। इससे कोई बड़ा परिवर्तन हो जाएगा एसा नही है, लेकिन परिवर्तन की राह में एक सीढ़ी जरूर तय हो जाएगी। किचलिए ये पर्यावरण के अलावा भी बात करते हैं कि इन साधारण सी पत्तियों में आपके लिए क्या खास है, तो अगली पंक्तियों को ध्यान से पढ़िये...
माहुल सहित अन्य पौधों से बनी पत्तलों में परोसा गया भोजन अमृत तुल्य होता है। मेरी थाली में है गर्मागर्म बाटी, आलू बैगन, पत्तागोभी की सब्जी, और रोटियाँ, वह भी जंगल मे सीमित संसाधनों द्वारा निर्मित 😊।
आइये मैं Vikas Sharma आपको बताता हूँ कि क्यों इन माहुल (Bauhinia vahlii) के पत्तों में परोसा गया भोजन अमृत तुल्य होता है। लेकिन पहले आपको बता दूँ कि अमृत तुल्य भोजन वही होगा, जिसका कण कण किसी को जीवन दे, व्यर्थ न जाये और थोड़ा बहुत अधिक हो जाने पर भी सुगमता से पच जाये अर्थात अहितकर न हो। अब आप ये सोच रहे होंगे कि मॉडर्न जमाने की स्टील, चीनी और क्रॉकरी की प्लेट से भी अधिक कोई साफ सुथरी और हाइजेनिक प्लेट हो सकती है क्या? तो मैं कहूंगा हाँ है...,। आपको हंसी आ रही होगी, कि मैं भी कैसी गँवारो (गाँव वालों, वो नही जो आप समझ रहे हैं 😜) वाली बात कर रहा हूँ।
खैर गँवारो=गाँव वालों जैसी बातें तो करूँगा ही, आखिर हूँ तो गाँव वाला ही। हमे अपनी सो कॉल्ड मॉडर्न सोच को बदलने का वक्त आ गया है। क्योंकि जब हम इन पत्तियों से बनी प्लेट को नकारते हैं, तो हमारे सामने विकल्प आता है, प्लास्टिक और थर्माकोल से बने हुए घटिया डिस्पोजेबल आईटम्स का, जिन्हें हम चम्मच, प्लेट, थाली या कटोरी समझ लेते हैं। है न कमाल की बात इन्ही प्लास्टिक से बने कुर्सी टेबल को कोई अगर हमसे चाटने के लिये कहे तो हम 100 रुपये लेकर भी न चाटें, और ऐसा करवाने वाले को 100 ज्ञान अलग पेल दें। लेकिन जब वही प्लास्टिक चम्मच की शक्ल में आता है, तो किसी प्रियतमा के होंठ की भांति उसे चाटते- चाटते थकते नही हैं। फंस गए न इस आकार के चक्कर मे। प्लास्टिक प्लास्टिक है यार, खाने लायक चीज थोड़े ही है। और क्या क्या समझाऊँ आपको, क्योंकि किसी ने सच ही कहा है, चांद में भी दाग हैं, कही न कहीं अपन भी तो...😢। लेकिन मैं अपने कुछ मित्रों Rahul Tripathi ji और Richa Tripathi ji को जानता हूँ जो इस प्लास्टिक से पूरी तरह तौबा कर चुके हैं।
चलिये में अपने मूल विषय पर लौट आता हूँ, ये माहुल की बड़ी बड़ी पत्तियों से बनी थालियाँ और कटोरी (पत्तल और दोने) एक समय मे भारतीय भोजन परोसने का आधार रही हैं। न तो उस वक्त पत्ते तोड़ने से इनके आस्तित्व पर खतरा मंडराया और न ही ये महंगी थी। न ही इनसे कभी इस तरह प्रदूषण हुआ जैसा कि आजकल किसी भी भोज के बाद देखने को मिल जाता है, न ही इन्हें निगल जाने से किसी जानवर की मौत हुई और न ही इनमे भोजन खाने से कभी इंसान बीमार हुआ। तो आखिर ऐसा क्या था, जो रातों रात इन्हें मुख्य धारा से बाहर फेंक देने का कारण बन गया। असलियत बेहद खराब है, उसकी चर्चा किसी और दिन करूँगा।
लेकिन इतना बताये दिए देता हूँ, कि इसमे परोसा गया भोजन अमृत तुल्य होता है, जैसा कि मैंने पहली ही लाइन में स्पष्ट लिख दिया था। क्यों...? जरा ठहरिये बताता हूँ। पहले गुरुदेव Deepak Acharya सर इस पर क्या कहते हैं, वह जान लीजिये- वे कहते हैं कि जब इन पत्तलों पर गर्म भोजन परोसा जाता है तो एक निश्चित तापमान पर पत्तलों से निकलने वाले रसायन भोजन में मिलकर इसे औषध बना देते हैं। इसे आप बिलकुल गर्म चाय में अदरक या तुलसी का स्वाद और गुण आ जाने जैसा ही समझें। ये रसायन भोजन को पचाने के साथ साथ शरीर मे आवश्यक प्रोटीन निर्माण को प्रेरित करते हैं। (वीडियो लिंक- https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=6451644234876615&id=100000933084753)
मेरा अपना भी यही मानना है, तभी तो पुराने समय मे खाना परोसने से पहले पत्तलों को पानी छिड़कर या पानी मे धोकर गीला कर दिया जाता था, जिससे ये सूखी हुई होने के बावजूद भी ताजी हो जाती थी, टूटती नही थी, और पानी में फूलकर विशिष्ट रसायन भोजन के साथ मिलने को तैयार हो जाते रहे होंगे। इन सबके अलावा और भी कमाल की बात यह है कि इन्ही पत्तलों का प्रयोग उस भोजन को गर्म रखने के लिए इंसुलेटर (आजकल के थर्मस) की तरह किया जाता था। इंसान के भोजन ग्रहण करने के बाद बारी आती थी, गली या गांव के कुत्तों की, जो उन पत्तलों में छिपी जूठन का दाना दाना चाट लेते थे, कहीं कहीं से नजर बचाकर कौए और अन्य पक्षी भी अपना हिस्सा लूट ले जाते थे। परंतु जब सब कुछ समाप्त हो जाता था, तब गाय, बैल, बाकरियाँ आदि इसे भोजन की तरह ग्रहण कर लेते थे। दरसल जिसे हम समाप्त मान रहे थे, वह समाप्त नही बल्कि सब्जियों, दाल और कढ़ी के स्वाद में डूबी हुई पत्तियाँ हैं। जैसे इन्होंने भोजन को अपना अर्क दिया वैसे ही भोजन ने इन्हें अपना अर्क दे दिया। बस यहीं पर चांदी हो गयी इन शाकाहारी जीव जंतुओं की। उनके हिसाब से तो यह दाल रोटी, या सब्जी रोटी या कढ़ी रोटी की तरह ही होता होगा।
अब उत्सव के दूसरे दिन देखने पर पता भी नही चलता था, कि सैकड़ो इंसानों का भोज निपट गया और एक तिनका भी जाया नही गया। धन्य थी वो हमारी महान परंपरा जिसमे सभी मेहमानों को आदर के साथ बैठकर परिवार जनो द्वारा स्वयं अपने हाथ से भोजन परोसा जाता था, और सबका पेट भर जाने के बाद भी बड़े बुजुर्ग के हाथ का परोसा एक अतिरिक्त निवाला ग्रहण करना हमारी मजबूरी भी होती थी और चाहत भी। 😍
अब क्या करें, जबकि हमने पत्ते तोड़ना ही बंद कर दिया है, और उसे झूटा मूटा संरक्षण का नाम भी दे दिया है तो, कम से कम इनके पेड़ तो बच जाने चाहिए थे, लेकिन हुआ इसका उलट, अब ये पेड़ चंद सपेसीमेन के रूप में अपनी अंतिम सांसे गिन रहे हैं। किसी विद्वान ने सही कहा है, किसी बुजुर्ग को जल्दी मारना है, तो उसे बच्चों और परिवार से दूर सुरक्षित बंद कमरे में दवाइयाँ और खाना देते रहो, डिस्टर्ब बिल्कुल भी मत करो। चंद दिनों में वह बीमार होकर मर जायेगा। ठीक इन पेड़ों के साथ भी यही हुआ। अब ये संरक्षित हैं, बिना उपयोग के, अब इनकी न तो कोई पूछ परख करता है और न कोई इन्हें डिस्टर्ब करता है। फिर ये जीकर क्या करेंगे। 😥
सोचने वाली बात है, आप भी अपने सुंदर टाइल्स से सजे, प्लास्टिक की बनी लताओं से सजे डायनिंग हॉल में बैठकर जरूर सोचिएगा इस विषय मे। फिलहाल मेरे खाने का समय हो गया है।
#माहुलबेल
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निवेदन:
इतने सारे विषयो को एक साथ मिलाने के पीछे मेरा उद्देश्य यही है कि प्राकृतिक पत्तियों से बनी पत्तलों के प्रयोग को बढ़ावा दे। चौरई में इसकी आवश्यकता हो तो मेरे विद्यार्थी से संपर्क कर सकते हैं। उनका नम्बर मैं आपको व्यक्तिगत मैसेंजर में दे सकता हूँ।
धन्यवाद
पर्यावरण मित्र डॉ. विकास शर्मा
वनस्पति शास्त्र विभाग
शासकीय महाविद्यालय चौरई
जिला छिंदवाड़ा (म.प्र.)