Dr. Vikas Sharma Ethnobotanist

Dr. Vikas Sharma Ethnobotanist Fully devoted for environment, nature and biodiversity conservation.

प्राकृतिक पत्तलों का प्रयोग कर करें ईश्वर की आराधना, पारंपरिक भोज, धार्मिक अनुष्ठान  और तीज त्योहार 🙏...पर्यावरण प्रदूषण...
21/08/2023

प्राकृतिक पत्तलों का प्रयोग कर करें ईश्वर की आराधना, पारंपरिक भोज, धार्मिक अनुष्ठान और तीज त्योहार 🙏...
पर्यावरण प्रदूषण को मिटाना है तो पहले दिमाग के प्रदूषण को हटाना जरूरी है। अक्सर देखने मे आता है कि परावर्ण पर बड़े बड़े लेक्चर पेलने वाले, बड़ी बड़ी बातें करने वाले लोग भी अपने आसपास प्लास्टिक का पहाड़ खड़ा किये नजर आते हैं।
स्वयं जब तक सिंगल यूज्ड प्लास्टिक का उपयोग बंद नही करेंगे किसी और को संदेश देने में कोई फायदा नही होगा। प्लास्टिक के नुकसान को मैं बताऊँ तो वह सही हो जाएगा ऐसी कोई बात नही है, यह कितना हानिकारक।है, कितना विषैला है सभी जानते हैं, लेकिन मानता फिर भी कोई नही है। हर कोई चाहता है कि भगतसिंह दूसरे के घर पैदा हो। मतलब समझ रहे हैं न आप, कि दूसरे के घर सभी चाहते हैं कि पत्तियों की पत्तल में भोज हो, लेकिन अपने घर प्लास्टिक की मजबूरी है। वजह उलब्धता की गिनायेंगे। अरे भाई जब डिमांड ही नही है तो कोई चीज उपलब्ध कैसे होगी। इससे हमारे वनवासी पत्तल बनाने वाले भाइयों को रोजगार भी मिलेगा।
पोस्ट की एक चित्र में ऐसे ही जंगली क्षेत्र पातालकोट से पत्तल निर्माता हमारे भाई हैं वही उस पत्तल को पूजन कार्यों में घर घर पहुँचाता मेरा एक विद्यार्थी है। आप इस पोस्ट को शेयर करके इसे पर्यावरण योद्धाओं की मदद करेंगे अपने आप के चारो ओर का पर्यावरण शुद्ध बनाने में प्लास्टिक मुक्त बनाने में मदद करेंगे। इससे कोई बड़ा परिवर्तन हो जाएगा एसा नही है, लेकिन परिवर्तन की राह में एक सीढ़ी जरूर तय हो जाएगी। किचलिए ये पर्यावरण के अलावा भी बात करते हैं कि इन साधारण सी पत्तियों में आपके लिए क्या खास है, तो अगली पंक्तियों को ध्यान से पढ़िये...

माहुल सहित अन्य पौधों से बनी पत्तलों में परोसा गया भोजन अमृत तुल्य होता है। मेरी थाली में है गर्मागर्म बाटी, आलू बैगन, पत्तागोभी की सब्जी, और रोटियाँ, वह भी जंगल मे सीमित संसाधनों द्वारा निर्मित 😊।
आइये मैं Vikas Sharma आपको बताता हूँ कि क्यों इन माहुल (Bauhinia vahlii) के पत्तों में परोसा गया भोजन अमृत तुल्य होता है। लेकिन पहले आपको बता दूँ कि अमृत तुल्य भोजन वही होगा, जिसका कण कण किसी को जीवन दे, व्यर्थ न जाये और थोड़ा बहुत अधिक हो जाने पर भी सुगमता से पच जाये अर्थात अहितकर न हो। अब आप ये सोच रहे होंगे कि मॉडर्न जमाने की स्टील, चीनी और क्रॉकरी की प्लेट से भी अधिक कोई साफ सुथरी और हाइजेनिक प्लेट हो सकती है क्या? तो मैं कहूंगा हाँ है...,। आपको हंसी आ रही होगी, कि मैं भी कैसी गँवारो (गाँव वालों, वो नही जो आप समझ रहे हैं 😜) वाली बात कर रहा हूँ।

खैर गँवारो=गाँव वालों जैसी बातें तो करूँगा ही, आखिर हूँ तो गाँव वाला ही। हमे अपनी सो कॉल्ड मॉडर्न सोच को बदलने का वक्त आ गया है। क्योंकि जब हम इन पत्तियों से बनी प्लेट को नकारते हैं, तो हमारे सामने विकल्प आता है, प्लास्टिक और थर्माकोल से बने हुए घटिया डिस्पोजेबल आईटम्स का, जिन्हें हम चम्मच, प्लेट, थाली या कटोरी समझ लेते हैं। है न कमाल की बात इन्ही प्लास्टिक से बने कुर्सी टेबल को कोई अगर हमसे चाटने के लिये कहे तो हम 100 रुपये लेकर भी न चाटें, और ऐसा करवाने वाले को 100 ज्ञान अलग पेल दें। लेकिन जब वही प्लास्टिक चम्मच की शक्ल में आता है, तो किसी प्रियतमा के होंठ की भांति उसे चाटते- चाटते थकते नही हैं। फंस गए न इस आकार के चक्कर मे। प्लास्टिक प्लास्टिक है यार, खाने लायक चीज थोड़े ही है। और क्या क्या समझाऊँ आपको, क्योंकि किसी ने सच ही कहा है, चांद में भी दाग हैं, कही न कहीं अपन भी तो...😢। लेकिन मैं अपने कुछ मित्रों Rahul Tripathi ji और Richa Tripathi ji को जानता हूँ जो इस प्लास्टिक से पूरी तरह तौबा कर चुके हैं।

चलिये में अपने मूल विषय पर लौट आता हूँ, ये माहुल की बड़ी बड़ी पत्तियों से बनी थालियाँ और कटोरी (पत्तल और दोने) एक समय मे भारतीय भोजन परोसने का आधार रही हैं। न तो उस वक्त पत्ते तोड़ने से इनके आस्तित्व पर खतरा मंडराया और न ही ये महंगी थी। न ही इनसे कभी इस तरह प्रदूषण हुआ जैसा कि आजकल किसी भी भोज के बाद देखने को मिल जाता है, न ही इन्हें निगल जाने से किसी जानवर की मौत हुई और न ही इनमे भोजन खाने से कभी इंसान बीमार हुआ। तो आखिर ऐसा क्या था, जो रातों रात इन्हें मुख्य धारा से बाहर फेंक देने का कारण बन गया। असलियत बेहद खराब है, उसकी चर्चा किसी और दिन करूँगा।

लेकिन इतना बताये दिए देता हूँ, कि इसमे परोसा गया भोजन अमृत तुल्य होता है, जैसा कि मैंने पहली ही लाइन में स्पष्ट लिख दिया था। क्यों...? जरा ठहरिये बताता हूँ। पहले गुरुदेव Deepak Acharya सर इस पर क्या कहते हैं, वह जान लीजिये- वे कहते हैं कि जब इन पत्तलों पर गर्म भोजन परोसा जाता है तो एक निश्चित तापमान पर पत्तलों से निकलने वाले रसायन भोजन में मिलकर इसे औषध बना देते हैं। इसे आप बिलकुल गर्म चाय में अदरक या तुलसी का स्वाद और गुण आ जाने जैसा ही समझें। ये रसायन भोजन को पचाने के साथ साथ शरीर मे आवश्यक प्रोटीन निर्माण को प्रेरित करते हैं। (वीडियो लिंक- https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=6451644234876615&id=100000933084753)

मेरा अपना भी यही मानना है, तभी तो पुराने समय मे खाना परोसने से पहले पत्तलों को पानी छिड़कर या पानी मे धोकर गीला कर दिया जाता था, जिससे ये सूखी हुई होने के बावजूद भी ताजी हो जाती थी, टूटती नही थी, और पानी में फूलकर विशिष्ट रसायन भोजन के साथ मिलने को तैयार हो जाते रहे होंगे। इन सबके अलावा और भी कमाल की बात यह है कि इन्ही पत्तलों का प्रयोग उस भोजन को गर्म रखने के लिए इंसुलेटर (आजकल के थर्मस) की तरह किया जाता था। इंसान के भोजन ग्रहण करने के बाद बारी आती थी, गली या गांव के कुत्तों की, जो उन पत्तलों में छिपी जूठन का दाना दाना चाट लेते थे, कहीं कहीं से नजर बचाकर कौए और अन्य पक्षी भी अपना हिस्सा लूट ले जाते थे। परंतु जब सब कुछ समाप्त हो जाता था, तब गाय, बैल, बाकरियाँ आदि इसे भोजन की तरह ग्रहण कर लेते थे। दरसल जिसे हम समाप्त मान रहे थे, वह समाप्त नही बल्कि सब्जियों, दाल और कढ़ी के स्वाद में डूबी हुई पत्तियाँ हैं। जैसे इन्होंने भोजन को अपना अर्क दिया वैसे ही भोजन ने इन्हें अपना अर्क दे दिया। बस यहीं पर चांदी हो गयी इन शाकाहारी जीव जंतुओं की। उनके हिसाब से तो यह दाल रोटी, या सब्जी रोटी या कढ़ी रोटी की तरह ही होता होगा।

अब उत्सव के दूसरे दिन देखने पर पता भी नही चलता था, कि सैकड़ो इंसानों का भोज निपट गया और एक तिनका भी जाया नही गया। धन्य थी वो हमारी महान परंपरा जिसमे सभी मेहमानों को आदर के साथ बैठकर परिवार जनो द्वारा स्वयं अपने हाथ से भोजन परोसा जाता था, और सबका पेट भर जाने के बाद भी बड़े बुजुर्ग के हाथ का परोसा एक अतिरिक्त निवाला ग्रहण करना हमारी मजबूरी भी होती थी और चाहत भी। 😍

अब क्या करें, जबकि हमने पत्ते तोड़ना ही बंद कर दिया है, और उसे झूटा मूटा संरक्षण का नाम भी दे दिया है तो, कम से कम इनके पेड़ तो बच जाने चाहिए थे, लेकिन हुआ इसका उलट, अब ये पेड़ चंद सपेसीमेन के रूप में अपनी अंतिम सांसे गिन रहे हैं। किसी विद्वान ने सही कहा है, किसी बुजुर्ग को जल्दी मारना है, तो उसे बच्चों और परिवार से दूर सुरक्षित बंद कमरे में दवाइयाँ और खाना देते रहो, डिस्टर्ब बिल्कुल भी मत करो। चंद दिनों में वह बीमार होकर मर जायेगा। ठीक इन पेड़ों के साथ भी यही हुआ। अब ये संरक्षित हैं, बिना उपयोग के, अब इनकी न तो कोई पूछ परख करता है और न कोई इन्हें डिस्टर्ब करता है। फिर ये जीकर क्या करेंगे। 😥

सोचने वाली बात है, आप भी अपने सुंदर टाइल्स से सजे, प्लास्टिक की बनी लताओं से सजे डायनिंग हॉल में बैठकर जरूर सोचिएगा इस विषय मे। फिलहाल मेरे खाने का समय हो गया है।



#माहुलबेल
https://m.facebook.com/story.php?story_fbid=4455618327812559&id=100000933084753

निवेदन:
इतने सारे विषयो को एक साथ मिलाने के पीछे मेरा उद्देश्य यही है कि प्राकृतिक पत्तियों से बनी पत्तलों के प्रयोग को बढ़ावा दे। चौरई में इसकी आवश्यकता हो तो मेरे विद्यार्थी से संपर्क कर सकते हैं। उनका नम्बर मैं आपको व्यक्तिगत मैसेंजर में दे सकता हूँ।
धन्यवाद
पर्यावरण मित्र डॉ. विकास शर्मा
वनस्पति शास्त्र विभाग
शासकीय महाविद्यालय चौरई
जिला छिंदवाड़ा (म.प्र.)

एक साथ 6 तरह के गुंजा/ रत्ती/ चिरमी/ घुँघची बीजों के दर्शन:Corel seeds, Rosary peaAbrus precatorius Fabaceaeचौरई, छिंदवा...
26/07/2023

एक साथ 6 तरह के गुंजा/ रत्ती/ चिरमी/ घुँघची बीजों के दर्शन:
Corel seeds, Rosary pea
Abrus precatorius
Fabaceae
चौरई, छिंदवाडा (म.प्र.)

विवरण:
अलग अलग रंग की गुंजा के बीजों में इतना धोखा खाने में बाद यकीन करना मुश्किल हो गया था कि ये सफेद, काले और लाल-काले के अलावा अन्य किसी रंग के होते होंगे। लेकिन विगत वर्ष फेसबुक मित्र के Kiran Chaudhari जी से ये बीज प्राप्त हुए और इनसे उगे पौधों में इस वर्ष गुलाबी बीज भी लगे। ये बीज लाल- काली प्रजाति की तुलना में छोटे आकार के हैं। इनकी फलियों में केवल 4 बीज होते हैं जबकि लाल-काली प्रजाति में 6 बीज होते हैं। यह गुंजा या रत्ती कई मायनो में उपयोगी है।
रत्ती का पौधा एक मौसमी लता है, जो जंगलो में बारिस से लेकर ठंड के मौसम तक मिलती है। ठंड के जाते जाते इसके बीज परिपक्व हो जाते हैं। हालांकि पुरानी बेल वाले स्थान पर प्रतिवर्ष नयी बेल उग आती है, किन्तु बीजो से भी कई नए पौधे तैयार होते रहते हैं। इसकी पत्तियां खाने में मीठे स्वाद वाली होती हैं, जो natural sweetening agents का एक अच्छा उदाहरण हैं। इसी तरह इसकी जड़ भी मुलैठी की लकड़ियों के समान मीठी लकड़ी के रूप में जाने जाते हैं। बीजों का अपना औषधीय और तांत्रिक महत्व है। यह छः प्रकार की हो सकती है। एक तो पूरी लाल, दूसरी पूरी सफेद, तीसरी पूरी काली, चौथी आधी लाल- आधी काली, पाँचवी आधी गुलाबी-आधी नीली या काली और छटवे यह क्रीम या गोल्डन कलर की। गुलाबी गुंजा किरण चौधरी जी से और क्रीम रंग की सुरेश देशमुख जी से प्राप्त हुई थी।
इनमे से यह लाल- काली भयंकर ज़हरीली है, जिसे खाने से मौत भी हो सकती है, जिसका कारण इसमे पाया जाने वाला भयंकर टोक्सिन abrin एवम अन्य कई उत्पाद है। किन्तु तांत्रिक प्रयोगों के लिये सबसे अनुकूल है। जिसमे वशीकरण, नौकरी की बाधाएं दूर करने, संतान, शादी आदि सबसे महत्वपूर्ण विषय हैं। हालाकि अनुभवी वैद्य/ चिकित्सक इनसे आंखों के रोगों की अचूक औषधि बनाते हैं। सभी प्रकार की रत्ती औषधि महत्व रखती हैं। लेकिन सफेद गुंजा का सबसे अधिक औषधीय महत्व है, लेकिन यह बहुत कम उपलब्ध है। यह आंखों की रोशनी लौटाने के अलावा, चर्म रोग, कुष्ठ रोग, सफेद दाग, बालो को लंबा और काला करना, आदि कई रोगों में काम आता है। जबकि काली गुंजा सफेद से भी दुर्लभ है, जो अकाट्य तंत्र साधना के लिये जाने जाते हैं। गुलाबी गुंजा सबसे दुर्लभ है। कई बार लोग रंग चढ़ाकर सुनहरी, हरी और अलग अलग तरह की रत्ती बेचते नजर आते हैं लेकिन यब सिर्फ छलावा साबित होता है।
इन सब उपयोगों के अलावा यह भगवान कृष्ण को बहुत प्रिय है। ऐसा माना जाता है, कि भगवान श्रीकृष्ण रत्ती की बनी हुई मालायें धारण किया करते थे। संभवतः इनकी मनमोहक छबि से इसका कोई संबंध हो।
पुराने समय मे सोना चांदी की दुकानों में इसके बीज शायद (120 मिलीग्राम) सोने को तोलने के लिए इसके बीजों का प्रयोग किया करते थे, क्योंकि इसके बीज सदैव एक सामान आकार के ही होते हैं।जो हमे भी हर परिस्थिति में एक जैसा बने रहने की प्रेरणा देता है।

पारम्परिक भारतीय वज़न में रत्ती का एक खास स्थान है, जो इस प्रकार हैं -

८ धान की एक रत्ती' बनती है
८ रत्ती का एक माशा बनता है
१२ माशों का एक तोला बनता है
५ तोलों की एक छटाक बनती है
१६ छटाक का एक सेर बनता है
५ सेर की एक पनसेरी बनती है
८ पनसेरियों का एक मन बनता है|
रत्ती (वज़न का माप)

👉🏽रत्ती
प्राचीन भारत में रत्ती द्रव्यमान (भार) मापने के काम आती थी, तथा द्रव्यमान की ईकाइ भी थी।
रत्ती भारतीय पारंपरिक भार मापन इकाई है, जिसे अब 0.12125 ग्राम पर मानकीकृत किया गया है। यह रत्ती के बीज के भार के बराबर होता था। कुछ अन्य माप इस प्रकार हैं।

1 तोला = 12 माशा = 11.67 ग्राम
(यह तोला के बीज के भार के बराबर्होता था, जो कि कुछ स्थानों पर जरा बदल जाता था)
1 माशा = 8 रत्ती = 0.97 ग्राम
1 धरनी = 2.3325 किलोग्राम (लगभग 5.142 पाउण्ड) = 12 पाव (यह नेपाल में प्रयोग होती थी)।
१ सेर = १ लीटर = 1.06 क्वार्ट (इसे सन १८७१ में यथार्थ १ लीटर मानकीकृत किया गया था, जो कि बाद में अप्रचलित हो गयी थी)
सेर भारतीय उपमहाद्वीप का एक पारम्परिक वज़न का माप है। आधुनिक वज़न के हिसाब से ऐक सेर लगभग ९३३ ग्राम के बराबर है, यानि एक किलोग्राम से ज़रा कम।

१ पंसेरी = पांच सेर = 4.677 kg (10.3 पाउण्ड)
१ सेर = ८० तोला चावल का भार

डॉ विकास शर्मा
वनस्पतिशास्त्र विभाग शासकीय महाविद्यालय चौरई
जिला छिंदवाड़ा (म.प्र.)
जय श्री कृष्ण, राधे राधे.... 🙏

Gomphocarpus physocarpusBaloon plantApocynaceaeछिंदवाडा (म.प्र.)
15/07/2023

Gomphocarpus physocarpus
Baloon plant
Apocynaceae
छिंदवाडा (म.प्र.)

ये रहा बीज वाला जंगली केला...Ensete superbumMusaceaeछिंदवाडा (म.प्र.)
15/07/2023

ये रहा बीज वाला जंगली केला...
Ensete superbum
Musaceae
छिंदवाडा (म.प्र.)

पातालकोट घाटी का सुंदर दृश्य
15/07/2023

पातालकोट घाटी का सुंदर दृश्य

श्योनाक, सोनापाठा, सोनपत्ता, टंट्याOroxylum indicum syn. Bignonia indicaBignoniaceae Broken bone tree, Indian Trumpet Tr...
15/07/2023

श्योनाक, सोनापाठा, सोनपत्ता, टंट्या
Oroxylum indicum syn. Bignonia indica
Bignoniaceae
Broken bone tree, Indian Trumpet Tree, Midnight Horror

विवरण:
विवरण सम्पूर्ण भारत मे लेकिन बहुत कम संख्या में पाया जाने वाला दुर्लभ औषधीय पेड़ है। इसकी अधिक उपलब्धता हिमालय के आसपास ही है, किन्तु अत्यंत कम मात्रा में इसके वेद दूर दराज के क्षेत्रों में देखने को मिल जाते हैं। छिंदवाड़ा जिले के औषधीय खजाने का यह भी एक बहुमूल्य रत्न है। और लगभग सभी दिशाओं में नालों के किनारे या खेत की मेडो पर इसकी झाड़ियां देखने को मिल जाते हैं।
इसके पेड़ छोटे वृक्षो के रूप में दिखाई देते हैं, जिंन्हे दूर से ही लटकती हुयी तलवार के समान बड़ी बड़ी फलियों के कारण पहचाना जा सकता है। इसकी जड़ की छाल, पत्तियाँ तथा बीज सभी औषधीय महत्व के माने गए है लेकिन इस पर अधिक शोध की आवश्यकता है। पुराने वैद्य एवं जानकर इसे बहुमूल्य जीवन दायिनी औषधियों की श्रेणी में रखते हैं, जिसके लिए अक्सर रामवाण दवा नाम का जिक्र सुनने को मिलता है। इसमें Oroxylin-A सहित कई अन्य महत्वपूर्ण रसायन पाये जाते हैं, जिनका प्रभाव दिमाग की याददाश्त बढ़ाने के लिये उपयोगी होता है। उष्ण स्वभाव के कारण पेट तथा स्वांस संबंधी रोगों के लिये यह उत्तम औषधि मानी गयी है। बीजा के समान ही श्योनाक के बर्तन/ ग्लास में पानी पीने से बहुत सी बीमारियो में आराम मिलता है। लेकिन जहाँ बीजा से मधुमेह, रक्त चाप आदि में फायदा मिलता है तो वहीं इसमें मलेरिया बुखार से लेकर वात रोग और खांसी में फायदा होता है।
इसकी जड़ो की छाल का पाउडर सौंठ और शहद के साथ मिलाकर चाटने से खाँसी तुरंत बैठ जाती है। इसके अलावा बबासीर में भी यह उपयोगी है। स्वभाव से यह गर्म होता है अतः पित्त, कफ और वात रोग में उपयोगी है। एक वृद्ध ग्रामीण महिला ने बताया कि इसके पत्ते का रस कान का दर्द और मुँह के छाले ठीक करता है, जबकि बंद फोड़े पर इसके पत्ते को नमक और सरसों तेल में कुनकुना गर्म करके रखने पर मुँह खुल जाता है। आपके पास इस दुर्लभ औषधि से संबंधित जानकारी हो तो कृप्या साझा करें।
धन्यवाद🙏

डॉ. विकास शर्मा
वनस्पति शास्त्र विभाग,
शासकीय महाविद्यालय चौरई
जिला छिंदवाड़ा (म.प्र.)

तेलिया कन्द/ भस्मकन्दTyphonium venosumAraceaeचौरई, जिला छिन्दवाड़ा (म.प्र.)सोना बनाने वाला पौधाविवरण:             भस्म कं...
19/06/2023

तेलिया कन्द/ भस्मकन्द
Typhonium venosum
Araceae
चौरई, जिला छिन्दवाड़ा (म.प्र.)
सोना बनाने वाला पौधा

विवरण:
भस्म कंद भारत के जंगलो और ग्रामीण क्षेत्र में पायी जाने वाली एक आम औषधि है। किन्तु जैसा कि नाम से ही स्पष्ट है, इसमें ऐसे खतरनाक रसायन पाये जाते है, जिनके कारण तीव्र खुजली के साथ शारीर की त्वचा फट जाती है, इसी कारन इसे भस्म कन्द कहा जाता है।
हालाकि किसी किसी स्थान पर इसे भोजन की तरह खाने की बातें भी सामने आती है, लेकिन अनुभवहीनता में ऐसा करना घातक हो सकता है।
इसके बारे में सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है की कई प्राचीन ग्रंथो में इसके प्रयोग से पारस पत्थर/ मणि के निर्माण की बात लिखी हुयी है।
(प्राचीन ग्रंथो के अनुसार- पारस पत्थर/ मणि वह पत्थर है, जिसके स्पर्श से लोग भी सोने में बदल जाता है)
इसमें मौजूद रसायनों के इस्तेमाल से सोने के निर्माण की विधि का भी वर्णन मिलता है। इस कारन इस पौधे को रहस्यमयी और अनोखा पौधा माना जाता है।
धन्यवाद 🙏
डॉ. विकास शर्मा

(नोट: तेलिया कन्द से सोना निर्माण से सम्बंधित जानकारी नेट पर उपलब्ध है, यह पोस्ट केवल वानस्पतिक पहचान एवम जानकारी के लिए उपयुक्त है। )

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