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15/07/2023
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क़ाज़ी ज़ुल्फ़ीक़ार अली बिहार के जहानाबाद ज़िला के क़ाज़ी दौलतपुर के रहने वाले थे। जो बाबू कुंवर सिंह के सबसे क़रीबी साथ...
23/04/2023

क़ाज़ी ज़ुल्फ़ीक़ार अली बिहार के जहानाबाद ज़िला के क़ाज़ी दौलतपुर के रहने वाले थे। जो बाबू कुंवर सिंह के सबसे क़रीबी साथियों में से एक थे। 1857 की क्रांति की पूरी तैयारी में क़ाज़ी ज़ुल्फ़ीक़ार अली ने बाबू कुंवर सिंह के साथ मिल कर काम किया। जिसका ज़िक्र उन ख़त में बख़ूबी मिलता है, जो बाबू कुंवर सिंह ने 1856 में लिखा था।

क़ाज़ी ज़ुल्फ़ीक़ार अली बिहार के जहानाबाद ज़िला के क़ाज़ी दौलतपुर के रहने वाले थे। जो बाबू कुंवर सिंह के

बिहार के दिल में भी एक कश्मीर बसता है. आजाद कश्मीर के अंतिम शासक युसुफ शाह अपने आखिरी दिनों में बिहार आये और यहीं के होक...
05/11/2022

बिहार के दिल में भी एक कश्मीर बसता है. आजाद कश्मीर के अंतिम शासक युसुफ शाह अपने आखिरी दिनों में बिहार आये और यहीं के होकर रह गए. युसुफ शाह ने नालंदा में कश्मीरी चक बसाया था. बिहार के नालंदा में आज भी कश्मीरी चक है जहां 400 साल पहले का इतिहास दफन है.

Yusuf Shah, who succeeded his father Ali Shah, was imprisoned by the Mughal emperor Akbar and later exiled to Bihar. He was given land in the Islampur block ...

बग़ावत के जुर्म में अंग्रेज़ हुकूमत ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को बंगाल से निष्काषित कर दिया था तब 1916 से 1919 तक वो रां...
04/10/2022

बग़ावत के जुर्म में अंग्रेज़ हुकूमत ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को बंगाल से निष्काषित कर दिया था तब 1916 से 1919 तक वो रांची में नज़रबंद रहे, इस दौरान उन्हें रांची की जामा मस्जिद में जुमा की नमाज़ की इजाज़त दी गई।

जब वो मस्जिद पहुँचे तो लोगों ने उन्हें पहचान लिया, और ने उनसे ही जुमा का ख़ुतबा देने को कहा।

उन्होंने अपने ख़ुत्बों में अरबी की जगह उर्दू में का इस्तेमाल शुरू किया। और ख़ुतबे में कहा के जंग ए आज़ादी में हिस्सा लेना मुसलमानों का दीनी फ़रीज़ा है, और हिंदू मुस्लिम इत्तिहाद पर ज़ोर दिया। उनके ख़ुत्बों के प्रभाव से रांची के मुसलमानों ने आज़ादी की लड़ाई में पुरे जोशो जज़्बे के साथ भाग लेना शुरू कर दिया।

इसके असर से रांची के हिन्दुओं ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद से कहा के वो भी उनका ख़िताब सुनेंगे, चूँकि अंग्रेज़ सरकार ने मौलाना आज़ाद के सार्वजनिक भाषण पर पाबंदी लगा रखी थी इसलिए मस्जिद में ही एक कमरा बनाया गया जहाँ शहर के हिन्दू जुमा का ख़ुतबा सुनने के लिए आने लगे।

शायद ये भारतीय इतिहास की पहली घटना रही होगी जब हिन्दू भी जुमा का ख़ुतबा सुनने मस्जिद में आते रहे हों। उन्ही दिनों 1919 में जब दिल्ली के मशहूर हिन्दू धर्मगुरु स्वामी श्रद्धानंद ने जामा मस्जिद में आ कर ख़िताब किया तो मुसलमानों में से कुछ लोगों ने ऐतराज़ किया। तब मौलाना अबुल कलाम आज़ाद ने एक किताब लिखी “जामीउस शवाहिद” (कलेक्शन ऑफ़ प्रूफ़) और फिर ये साबित किया के इस्लाम में गैरमुस्लिमों के मस्जिद में आने पर कोई पाबन्दी नहीं है।

हिन्दू मुस्लिम के बीच की दूरियों को ख़त्म करने की उनकी कोशिशें भारतीय इतिहास का अभिन्न हिस्सा है। अपने पुराने कारनामों के बारे में मौलाना अबुल कलाम आज़ाद कहते हैं -

“ ये अम्र वाक़ेया है के “अलहिलाल” ने तीन साल के अंदर मुसलमानान ए हिन्द की मज़हबी और सियासी हालत में बिलकुल एक नई हरकत पैदा कर दी।

पहले वो अपने हिन्दू भाइयों की पॉलिटिकल सरगर्मीयों से न सिर्फ़ अलग थे बल्कि उसकी मुख़ालफ़त के लिए ब्युरोक्रेसी के हाथ में एक हथियार की तरह काम देते थे। गवर्नमेंट की तफ़रका अंदाज़ पालिसी ने उन्हें इस फ़रेब में मुबतला कर रखा था के मुल्क में हिन्दूओं की तादाद बहुत ज़्यादा है, अगर हिंदुस्तान आज़ाद हो गया तो हिंदुओं की गवर्नमेंट क़ायम हो जायेगी, मगर “अलहिलाल” ने मुसलमानों को तादाद की जगह ईमान पर ऐतमाद करने की तलक़ीन की और बेखौफ़ होकर हिंदुओं के साथ मिल जाने की दावत दी उसी से वो तब्दीलियां रु-नुमा हुईं जिसका नतीजा आज मुत्तहिदा तहरीके ख़िलाफ़त और स्वराज है।

ब्यूरोक्रेसी एक ऐसी तहरीक को ज़्यादा अरसा तक बर्दाश्त नहीं कर सकती थी इसलिए पहले “अलहिलाल” की ज़मानत ज़ब्त की गयी फिर जब “अलबिलाग” के नाम से दोबारा जारी किया गया तो 1916 में गवर्नमेंट ऑफ इंडिया ने मुझे चार साल के लिए नज़र बंद कर दिया।”

नज़रबंदी के दौरान ही मौलाना आज़ाद ने 15 अगस्त 1917 को राँची में अंजुमन इस्लामिया की स्थापना की और उस के कुछ दिनों बाद रांची में शिक्षा का दीप जलाने के लिए मदरसा इस्लामिया की बुनियाद डाली। और इस संस्थान को खड़ा करने में राँची के मुसलमान के साथ हिंदुओं का भी एक बड़ा योगदान था।

बग़ावत के जुर्म में अंग्रेज़ हुकूमत ने मौलाना अबुल कलाम आज़ाद को बंगाल से निष्काषित कर दिया था तब 1916 से 1919 तक वो रांच....

16 दिसंबर 1782 यानी 10   1197 हिजरी को सिलहट के पीरज़ादों को बग़ावत के जुर्म में क़त्ल किया गया, वहीं अक्तूबर 1884 को ट्...
09/08/2022

16 दिसंबर 1782 यानी 10 1197 हिजरी को सिलहट के पीरज़ादों को बग़ावत के जुर्म में क़त्ल किया गया, वहीं अक्तूबर 1884 को ट्रिनीडाड में की शहादत का सोग मना रहे हज़ारों भारतीयों पर अंग्रेज़ों ने गोली चला कर कई लोगों को शहीद कर दिया।

इस साल मुहर्रम और अगस्त का महीना एक साथ पड़ा है। एक तरफ़ जहां भारत की आज़ादी का जशन

1857 के स्वाधीनता संग्राम के नायकों में सिर्फ राजे, नवाब और सामंत नहीं थे जिनके सामने अपने छोटे-बड़े राज्यों और जमींदारिय...
07/07/2022

1857 के स्वाधीनता संग्राम के नायकों में सिर्फ राजे, नवाब और सामंत नहीं थे जिनके सामने अपने छोटे-बड़े राज्यों और जमींदारियों को अंग्रेजों से बचाने की चुनौती थी। उस दौर में अनगिनत योद्धा ऐसे भी रहे थे जिनके पास न तो कोई रियासत थी, न कोई संपति। उनके संघर्ष और आत्म बलिदान के पीछे देश के लिए मर मिटने के जज्बे के सिवा कुछ नहीं था। पीर अली खान स्वतंत्रता संग्राम के ऐसे ही अनाम, विस्मृत योद्धाओं में एक थे।

1820 में आजमगढ़ के गांव मुहम्मदपुर में जन्मे पीर अली पारिवारिक वजहों से किशोरावस्था में घर से भागकर पटना आ गए थे। पटना के नवाब मीर अब्दुल्लाह ने उनकी परवरिश की। पढ़ाई के बाद आजीविका के लिए उन्होंने मीर साहब की मदद से किताबों की एक छोटी-सी दुकान खोल ली। कुछ ही अरसे में उनकी दुकान प्रदेश के क्रांतिकारियों के अड्डे में तब्दील होती चली गई। यहां देश भर से क्रांतिकारी साहित्य मंगाकर पढ़ी और बेचीं जाती थी। पीर अली ने देश की आज़ादी को अपने जीवन का मकसद बना लिया था। 1857 की क्रांति के वक़्त उन्होंने दिल्ली के क्रांतिकारियों की प्रेरणा से बिहार में घूमकर क्रांति का जज्बा रखने वाले सैकड़ों युवाओं को संगठित और प्रशिक्षित किया।

वह दिन भी आया जिसके लिए आजादी के सैकड़ों दीवाने एक अरसे से तैयारी कर रहे थे। पूर्व योजना के अनुसार 3 जुलाई, 1857 को पीर अली के घर पर दो सौ से ज्यादा हथियारबंद युवा छिप-छिपाकर एकत्र हुए। आजादी के लिए कुर्बानी की कसमें खाने के बाद पीर अली की अगुवाई में उन्होंने पटना के गुलज़ार बाग स्थित अंग्रेजों के प्रशासनिक भवन को घेर लिया। इस भवन से प्रदेश की क्रांतिकारी गतिविधियों पर नजर रखी जाती थी। वहां तैनात अंग्रेज अफसर डॉ. लॉयल ने क्रांतिकारियों की अनियंत्रित भीड़ पर गोली चलवा दी। अंग्रेजी सिपाहियों की फायरिंग का जवाब क्रांतिकारियों की टोली ने भी दिया। दोतरफा गोलीबारी में डॉ. लॉयल और सिपाहियों के अलावा कई क्रांतिकारी युवा मौके पर शहीद हुए और दर्जनों दूसरे घायल होकर अस्पताल पहुंच गए। पीर अली चौतरफा फायरिंग के बीच अपने कुछ साथियों के साथ बच निकलने में सफल रहे।

इस हमले के बाद पटना में दो दिनों तक अंग्रेज पुलिस का दमन-चक्र चला। संदेह के आधार पर सैकड़ों निर्दोष लोगों, खासकर मुसलमानो की गिरफ्तारियां की गईं। उनके घर तोड़े गए। कुछ युवाओं को झूठा मुठभेड़ दिखाकर गोली मार दी गई। अंततः 5 जुलाई, 1857 को पीर अली और उनके चौदह साथियों को बग़ावत के जुर्म मे गिरफ्तार कर लिया गया। गिरफ्तारी के बाद यातनाओं के बीच पीर अली को पटना के कमिश्नर विलियम टेलर ने प्रलोभन दिया कि अगर वे देश भर के अपने क्रांतिकारी साथियों के नाम बता दें तो उनकी जान बख्शी भी जा सकती है। पीर अली ने यह प्रस्ताव ठुकराते हुए कहा–‘जिंदगी में कई ऐसे मौक़े आते हैं जब जान बचाना ज़रूरी होता है। कई ऐसे मौक़े भी आते हैं जब जान देना जरूरी हो जाता है। यह वक़्त जान देने का है।’ अंग्रेजी हुकूमत ने दिखावे के ट्रायल के बाद 7 जुलाई, 1857 को पीर अली को उनके साथियों के साथ बीच सड़क पर फांसी पर लटका दिया। फांसी के फंदे पर झूलने के पहले पीर अली के आखिरी शब्द थे – ‘तुम हमें फांसी पर लटका सकते हो, लेकिन हमारे आदर्श की हत्या नहीं कर सकते। मैं मरूंगा तो मेरे खून से लाखों वीर पैदा होंगे जो एक दिन तुम्हारे ज़ुल्म का खात्मा कर देंगे।’

देश की आजादी के लिए प्राण का उत्सर्ग करने वाले पीर अली खां कई दूसरे शहीदों की तरह इतिहास के पन्नों से आज अनुपस्थित हैं। इतिहास लिखने वालों के अपने पूर्वग्रह होते हैं। अभी उनके नाम पर पटना में एक मोहल्ला पीरबहोर आबाद है। कुछ साल पूर्व बिहार सरकार ने उनके नाम पर गांधी मैदान के पास एक छोटा-सा पार्क बनवाया और शहर को हवाई अड्डे से जोड़ने वाली एक महत्वपूर्ण सड़क को ‘पीर अली खां मार्ग’ नाम दिया। 7 जुलाई को उनके शहादत दिवस पर समारोहों के आयोजन का सिलसिला शुरू भी शुरू हुआ लेकिन आम लोगों की उसमें भागीदारी नहीं के बराबर होती है। दुख होता है कि देश और बिहार तो क्या,आज पटना के लोगों को भी इस महान बलिदानी के बारे में कम ही पता है!

Dhruv Gupt

अंग्रेज़ी पढ़ कर लोग धर्म के नाम पर अधिक लड़ते हैं।
15/06/2022

अंग्रेज़ी पढ़ कर लोग धर्म के नाम पर अधिक लड़ते हैं।

In the last few days, the controversy over the comments made by certain politicians, ‘religious leaders, and activists on religious figures in the television...

अहमदुल्लाह शाह फैज़ाबादी का भारत /हमारे स्वाधीनता संग्राम का इतिहास उतना ही नहीं है जितना आज तक लिखा और हमें पढ़ाया गया है...
15/06/2022

अहमदुल्लाह शाह फैज़ाबादी का भारत /

हमारे स्वाधीनता संग्राम का इतिहास उतना ही नहीं है जितना आज तक लिखा और हमें पढ़ाया गया है।उस संग्राम के कुछ ऐसे नायक भी रहे थे जिन्हें इतिहास और जनमानस ने विस्मृत कर दिया। उन्हें वह सम्मान नहीं मिला जिसके वे वास्तव में हकदार थे। इतिहास के हाशिए पर खड़े ऐसे ही एक नायक थे मौलाना अहमदुल्लाह शाह फैज़ाबादी। फ़ैजाबाद के एक ताल्लुकदार घर में पैदा हुए मौलाना अहमदुल्लाह शाह अंग्रेजी शासन के अत्याचारों को देखते हुए उसके प्रति गुस्से भरे हुए थे। कुछ क्रांतिकारियों के संपर्क में आने के बाद उनके इस गुस्से को दिशा मिली। अंग्रेजी गुलामी के खिलाफ़ वे क्रांतिकारी पर्चे लिखकर गांव-गांव में बांटने लगे। पहले जंग-ए-आजादी के दौर का एक बेशकीमती दस्तावेज 'फ़तहुल इस्लाम' भी है जिसे मौलाना साहब सिकंदर शाह, नक्कार शाह, डंका शाह आदि कई नामो से खुद लिखा करते थे। इस पत्रिका में अंग्रेजों के जुल्म की दास्तान लिखते हुए अवाम से उनके ख़िलाफ़ जिहाद की गुज़ारिश की गयी है, जंग के तौर-तरीके समझाए गए हैं और फुट डालने की अंग्रेजों की तमाम साज़िशों से बचते हुए देश में हर कीमत पर हिन्दू-मुस्लिम एकता को बनाए रखने की सिफारिश की गई है। उन्हें फैज़ाबाद और आसपास के इलाकों में हिन्दू-मुस्लिम एकता का प्रतीक माना जाता था। उनकी गोपनीय पत्रिका 'फतहुल इस्लाम' ने उस समूचे क्षेत्र के लोगों में आज़ादी की आग भरने में बड़ी भूमिका निभाई थी।

उनकी इस पत्रिका के असर से अंग्रेजी हुकूमत इस क़दर ख़ौफ़ खाती थी कि1856 में उसने पत्रिका और मौलाना साहब की तमाम गतिविधियों पर रोक लगा दी थी। उनपर कड़ी निगरानी रखी जाने लगी। पुलिस की चौतरफा निगरानी के बावजूद उनकी सक्रियता कम नहीं हुई तो 1857 में गिरफ्तार कर उन्हें जेल में डाल दिया गया। कुछ महीनों में जेल से छूटने के बाद उन्होंने लखनऊ और शाहजहांपुर जनपदों को अपना कार्यक्षेत्र बनाया और घूम-घूमकर लोगो को अंग्रेजों के खिलाफ गोलबंद करना शुरू कर दिया। वे एक बेहतरीन वक्ता भी थे। उनकी प्रेरणा से बहुत सारे लोग उनके नेतृत्व में अंग्रेजों के ख़िलाफ़ हथियार उठाने को तैयार हो गए। उनके कार्यों और हौसलों को देखते हुए जंग-ए-आज़ादी के दौरान उन्हें विद्रोही स्वतंत्रता सेनानियो की बाईसवीं इन्फेंट्री का प्रमुख बनाया गया था। यह क्रांतिकारियों का वह दस्ता था जिसने चिनहट की प्रसिद्ध लड़ाई में हेनरी लारेंस के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना को बुरी तरह पराजित किया था।यह विजय पहले स्वाधीनता संग्राम की कुछ सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण उपलब्धियों में एक थी। इस विजय ने मौलाना साहब को अपार जनप्रियता दिलाई।

चिनहट की ऐतिहासिक जंग के बाद भूमिगत मौलाना साहब की गिरफ्तारी के लिए अंग्रेज सरकार ने हर मुमकिन कोशिश की लेकिन ब्रिटिश इंटेलिजेंस और पुलिस उनके जीते जी उन्हें नही पकड़ पाई। जनरल कैनिंग ने उन्हें गिरफ्तार करने के लिए पचास हज़ार चांदी के सिक्कों का ईनाम घोषित किया था। अवाम में वे इतने लोकप्रिय थे कि इस प्रलोभन के बावजूद लोग उन्हें गिरफ्तार कराने की सोच भी नहीं सकते थे। उस दौर में लोगों का मानना था कि मौलाना साहब को ईश्वरीय शक्ति हासिल है जिसके चलते अंग्रेज उन्हें पकड़ नहीं सकते थे।

फ़रारी के दिनों में मौलाना साहब के एक मित्र और पुवायां के अंग्रेजपरस्त राजा जगन्नाथ सिंह ने 5 जून 1858 को उन्हें खाने पर आमंत्रित किया। जब वे महल में पहुंचे तो जगन्नाथ ने इनाम और अंग्रेजों की कृपा पाने के लोभ में धोखे से गोली मारकर उनकी हत्या कर दी। हत्या के बाद उनका सिर काटकर उसने अंग्रेज़ जिला कलेक्टर के हवाले कर दिया। जंग-ए- आज़ादी का वह दुर्भाग्यपूर्ण दिन फिरंगियों के लिए जश्न का दिन था। अंग्रेज अफसरों और पुलिस ने अवाम में दहशत फैलाने की नीयत से मौलवी साहब का कटा सिर शहर भर में घुमाने के बाद शाहजहांपुर की कोतवाली में नीम के एक पेड़ पर लटका दिया।

यह आश्चर्य है कि मौलाना साहब की कुर्बानियों को देश और हमारे इतिहासकारों ने भुला दिया। उनके क्षेत्र के लोगों को भी अब उनकी याद कम ही आती है। शाहजहांपुर में उनकी कब्र के सिवा उनकी कोई निशानी अब बाकी नहीं है। भारत के पहले स्वाधीनता संग्राम में उनकी भूमिका और कुर्बानियों का पता अंग्रेज लेखकों द्वारा दिए विवरणों से ज्यादा चलता है। एक अंग्रेज इतिहासकार होम्स ने उत्तर भारत में अंग्रेजी शासन का सबसे ख़तरनाक दुश्मन मौलवी अहमदुल्लाह शाह को बताया है। थॉमस सीटन ने उन्हें महान क्षमताओं, निर्विवाद साहस और कठोर दृढ़ संकल्प वाला अनोखा विद्रोही कहा। ब्रिटिश अधिकारी थॉमस सीटन ने उन्हें सर्वश्रेष्ठ विद्रोही की संज्ञा दी थी। अंग्रेज इतिहासकार मालीसन ने लिखा है -‘मौलवी असाधारण आदमी थे। विद्रोह के दौरान उनकी सैन्य क्षमता और रणकौशल का सबूत बार-बार मिलता है। उनके सिवाय कोई और दावा नहीं कर सकता कि उसने युद्धक्षेत्र में कैम्पबेल जैसे जंग के माहिर उस्ताद को दो-दो बार हराया था। वह देश के लिए जंग लड़ने वाला सच्चा राष्ट्रभक्त था। न तो उसने किसी की धोखे से हत्या करायी और न निर्दोषों और निहत्थों की हत्या कर अपनी तलवार को कलंकित किया। वह बहादुरी और आन-बान-शान से उन अंग्रेजों से लड़ा, जिन्होंने उसका मुल्क छीन लिया था।’

Dhruv Gupt

इसके बाद हरिकिशन सरहदी पर दरोग़ा चानन सिंह के क़त्ल का मुक़दमा चला और अदालत की करवाई में हरिकिशन ने बहादुरी का मुज़ाहरा किया...
09/06/2022

इसके बाद हरिकिशन सरहदी पर दरोग़ा चानन सिंह के क़त्ल का मुक़दमा चला और अदालत की करवाई में हरिकिशन ने बहादुरी का मुज़ाहरा किया, और अंग्रेज़ी ज़ुल्म की दास्तां बयां की, उन्होंने अपनी करवाई को क़िस्साख़ानी बाज़ार क़त्लएआम, मरदान के मिरवास डेहरी क़त्लएआम और हबीब नूर नाम के क्रन्तिकारी के मौत का बदला बताया. अपने तरफ़ से कोई सफ़ाई पेश नहीं की, ये कह कर 'इंक़लाब ज़िंदाबाद' कहा के अगर अंग्रेज़ी ज़ुल्म नहीं बंद हुवे तो मेरे जैसे हज़ारों हरिकिशन पैदा होंगे, जो अंग्रेज़ों से अपने मुल्क हिंदुस्तान को आज़ाद करवा लेंगे. आख़िर लाहौर के सेशन जज ने 26 जनवरी 1931 को उन्हें सज़ाये मौत सुना दी. बाद में हाई कोर्ट ने भी सज़ा पर मोहर लगा दी. आख़िर 9 जून, 1931 को मात्र 22 साल की उम्र में लाहौर के मियां वाली जेल मे हरी किशन सरहदी को फांसी के फंदे पर लटका दिया गया.

हरीकिशन तलवार का जन्म सन 1909 में मरदान के सरहदी इलाक़े गल्ला ढेर में हुआ था, इस वजह कर

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