Rasidpur our native villages

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14/08/2020

विज्ञान_वनाम_शास्त्र_विधि
🌻🌻🌻🌻

जब किसी की मृत्यु होती थी तब भी 13 दिन तक उस घर में कोई प्रवेश नहीं करता था यही Isolation period था क्योंकि मृत्यु या तो किसी बीमारी से होती है या वृद्धावस्था के कारण जिसमें शरीर तमाम रोगों का घर होता है यह रोग हर जगह न फैले इसलिए 14 दिन का quarantine period बनाया गया।

जो शव को अग्नि देता था उसको घर वाले तक नहीं छू सकते थे 13 दिन तक उसका खाना पीना, भोजन, बिस्तर, कपड़े सब अलग कर दिए जाते थे तेरहवें दिन शुद्धिकरण के पश्चात, सिर के बाल हटवाकर ही पूरा परिवार शुद्ध होता था।

तब भी आप बहुत हँसे थे bloody indians कहकर मजाक बनाया था।

जब किसी रजस्वला स्त्री को 4 दिन isolation में रखा जाता है ताकि वह भी बीमारियों से बची रहें और आप भी बचे रहें तब भी आपने पानी पी पी कर गालियाँ दी और नारीवादियों को कौन कहे वो तो दिमागी तौर से अलग होती हैं उन्होंने जो जहर बोया कि उसकी कीमत आज सभी स्त्रियाँ तमाम तरह की बीमारियों से ग्रसित होकर चुका रही हैं।

जब किसी के शव यात्रा से लोग आते हैं घर में प्रवेश नहीं मिलता है और बाहर ही हाथ पैर धोकर स्नान करके, कपड़े वहीं निकालकर घर में आया जाता है, इसका भी खूब मजाक उड़ाया आपने।

आज भी गांवों में एक परंपरा है कि बाहर से कोई भी आता है तो उसके पैर धुलवायें जाते हैं जब कोई भी बहू लड़की या कोई भी दूर से आता है तो वह तब तक प्रवेश नहीं पाता जब तक घर की बड़ी बूढ़ी लोटे में जल लेकर, हल्दी डालकर उस पर छिड़काव करके वही जल बहाती नहीं हों, तब तक। खूब मजाक बनाया था न।

इन्हीं सवर्णों को और ब्राह्मणों को अपमानित किया था जब ये गलत और गंदे कार्य करने वाले माँस और चमड़ों का कार्य करने वाले लोगों को तब तक नहीं छूते थे जब तक वह स्नान से शुद्ध न हो जाय ये वही लोग थे जो जानवर पालते थे जैसे सुअर, भेड़, बकरी, मुर्गा, इत्यादि जो अनगिनत बीमारियाँ अपने साथ लाते थे ये लोग जल्दी उनके हाथ का छुआ जल या भोजन नहीं ग्रहण करते थे तब बड़ा हो हल्ला आपने मचाया और इन लोगों को इतनी गालियाँ दी कि इन्हें अपने आप से घृणा होने लगी।

यही वह गंदे कार्य करने वाले लोग थे जो प्लेग, टी बी, चिकन पॉक्स, छोटी माता, बड़ी माता, जैसी जानलेवा बीमारियों के संवाहक थे और जब आपको बोला गया कि बीमारियों से बचने के लिए आप इनसे दूर रहें तो आपने गालियों का मटका इनके सिर पर फोड़ दिया और इनको इतना अपमानित किया कि इन्होंने बोलना छोड़ दिया और समझाना छोड़ दिया।

आज जब आपको किसी को छूने से मना किया जा रहा है तो आप इसे ही विज्ञान बोलकर अपना रहे हैं Quarantine किया जा रहा है तो आप खुश होकर इसको अपना रहे हैं पर शास्त्रों के उन्हीं वचनों को तो ब्राह्मणवाद, मनुवाद कहकर आपने गरियाया था और अपमानित किया था।
आज यह उसी का परिणति है कि आज पूरा विश्व इससे जूझ रहा है।

याद करिये पहले जब आप बाहर निकलते थे तो आप की माँ आपको जेब में कपूर या हल्दी की गाँठ इत्यादि देती थी रखने को यह सब कीटाणु रोधी होते हैं शरीर पर कपूर पानी का लेप करते थे ताकि सुगन्धित भी रहें और रोगाणुओं से भी बचे रहें लेकिन सब आपने भुला दिया।

आपको तो अपने शास्त्रों को गाली देने में और ब्राह्मणों को अपमानित करने में उनको भगाने में जो आनंद आता है शायद वह परमानंद आपको कहीं नहीं मिलता।

अरे समझो अपने शास्त्रों के level के जिस दिन तुम हो जाओगे न तो यह देश विश्व गुरु कहलायेगा।

तुम ऐसे अपने शास्त्रों पर ऊँगली उठाते हो जैसे कोई मूर्ख व्यक्ति के मूर्ख 7 वर्ष का बेटा ISRO के कार्यों पर प्रश्नचिन्ह लगाए।

अब भी कहता हूँ अपने शास्त्रों का सम्मान करना सीखो उनको मानो बुद्धि में शास्त्रों की अगर कोई बात नहीं घुस रही है तो समझ जाओ आपकी बुद्धि का स्तर उतना नहीं हुआ है उस व्यक्ति के पास जाओ जो तुम्हे शास्त्रों की बातों को सही ढंग से समझा सके किन्तु गाली मत दो उसको जलाने का दुष्कृत्य मत करो।

जिसने विज्ञान का गहन अध्ययन किया होगा वह शास्त्र वेद पुराण इत्यादि की बातों को बड़े ही आराम से समझ सकता है correlate कर सकता है और समझा भी सकता है।

Note it down Mark my words again

पता नहीं कि आप इसे पढ़ेंगे या नहीं लेकिन मेरा काम है आप लोगों को जगाना जिसको जगना है या लाभ लेना है वह पढ़ लेगा।
यह भी अनुरोध है कि आप भले ही किसी भी जाति, समाज से हों धर्म के नियमों का पालन कीजिये इससे इहलोक और परलोक दोनों सुधरेगा।

॥सर्वे भवन्तु सुखिनः सवेँसनतु निरामया:॥
🔱 जय सनातन 🙏🚩

‘मां’बहुत दिनों बाद अचानक माधुरी का आना मीना को सुखद लगा था. दोचार दिन तो यों ही गपशप में निकल गए थे. माधुरी दीदी यहां अ...
02/08/2020

‘मां’
बहुत दिनों बाद अचानक माधुरी का आना मीना को सुखद लगा था. दोचार दिन तो यों ही गपशप में निकल गए थे. माधुरी दीदी यहां अपने किसी संबंधी के यहां विवाह समारोह में शामिल होने आई थीं. जिद कर के वह मीना और उस के पति दीपक को भी अपने साथ ले गईं. फिर शादी के बाद मीना ने जिद कर के उन्हें 2 दिन और रोक लिया था. दीपक किसी काम से बाहर चले गए तो माधुरी रुक गई थीं.
‘‘और सुना…सब ठीक ठाक तो चल रहा है न,’’ माधुरी ने कहा, ‘‘अब तो दोनों बेटियों का ब्याह कर के तुम लोग भी फ्री हो गए हो. खूब घूमो फिरो…अब क्यों घर में बंधे हुए हो.’’
‘‘दीदी, अब आप से क्या छिपाना,’’ मीना कुछ गंभीर हो कर कहने लगी, ‘‘आप तो जानती ही हैं कि दोनों बेटियों की शादी में काफी खर्च हुआ है. अब दीपक रिटायर भी हो गए हैं. सीमित पेंशन मिलती है. किसी तरह खर्च चल रहा है, बस. कोई आकस्मिक खर्चा आ जाता है तो उस के लिए भी सोचना पड़ता है…’’
माधुरी बीच में ही टोक कर बोलीं, ‘‘देख…मीना, तू अपने आप को थोड़ा बदल, बेटियों के कमरे खाली पड़े हैं, उन्हें किराए पर दे. इस शहर में बच्चों की कोचिंग का अच्छा माहौल है. तुम्हारे घर के बिलकुल पास कोचिंग क्लासें चल रही हैं. बच्चे फौरन किराए पर कमरा ले लेंगे. उन से अच्छा किराया तो मिलेगा ही घर की सुरक्षा भी बनी रहेगी.’’
माधुरी की बात मीना को भी ठीक लगने लगी थी. उसे खुद आश्चर्य हुआ कि अब तक इस तरह उस ने सोचा क्यों नहीं. ठीक है, दीपक घर को किराए पर देने के पक्ष में नहीं हैं पर 2 कमरे बच्चों को देने में क्या हर्ज है. बाथरूम तो अलग है ही.
माधुरी दीदी के जाते ही पति से बात कर के मीना ने अखबार में विज्ञापन दे दिया. ‘‘देखो मीना, मैं तुम्हारे कार्यक्षेत्र में दखल नहीं दूंगा,’’ दीपक बोले, ‘‘पर निर्णय तुम्हारा ही है सो सोचसमझ कर लेना. क्या किराया होगा, किसे देना है, सारा सिरदर्द तुम्हारा ही होगा, समझीं.’’
‘‘हां बाबा, सब समझ गई हूं, किराए पर भी मेरा ही अधिकार होगा, जैसा चाहूं खर्च करूंगी.’’
दीपक तब हंस कर रह गए थे. विज्ञापन छपने के कुछ ही दिन बाद दोनों कमरे किराए पर उठ गए थे. निखिल और सुबोध दोनों बच्चे मीना को संभ्रांत परिवार के लगे थे. किराया भी ठीक ठाक मिल गया था.
मीना खुश थी. किराएदार के रूप में बच्चों के आने से उस का अकेलापन थोड़ा कम हो गया था. दीपक ने तो अपने मन लगाने के लिए एक संस्था ज्वाइन कर ली थी. पर वह घर में अकेली बोर हो जाती थी. दोनों बेटियों के जाने के बाद तो अकेलापन वैसे भी अधिक खलने लगा था.
शीना का उस दिन फोन आया तो कह रही थी, ‘‘मां, आप ने ठीक किया जो कमरे किराए पर दे दिए. अब आप और पापा कुछ दिनों के लिए चेन्नई घूमने आ जाएं, काफी सालों से आप लोग कहीं घूमने भी नहीं गए.’’
‘‘हां, अब घूमने का प्रोग्राम बनाएंगे उधर का. रीना भी जिद कर रही है बंगलोर आने की,’’ मीना का स्वर उत्साह से भरा था.
फोन सुनने के बाद मीना बाहर लौन में आ कर गमले ठीक करते हुए सोचने लगी कि दीपक से बात करेगी कि बेटियां इतनी जिद कर रही हैं तो चलो, उन के पास घूम आएं. तभी बाहर का फाटक खोल कर एक दुबला पतला, कुछ ठिगने कद का लड़का अंदर आया था.
‘‘कहो, क्या काम है? किस से मिलना है?’’
‘‘जी, आंटी, मैं राघव हूं. यहां जगदीश कोचिंग में एडमिशन लिया है. मुझे कमरा चाहिए था.’’
‘‘देखो बेटे, यहां तो कोई कमरा खाली नहीं है. 2 कमरे थे जो अब किराए पर चढ़ चुके हैं,’’ मीना ने गमलों में पानी डालते हुए वहीं से जवाब दे दिया.
वह लड़का थोड़ी देर खड़ा रहा था पर मीना अंदर चली गईं. दूसरे दिन दीपक के बाजार जाने के बाद यों ही मीना अखबार ले कर बाहर लौन में आई तो फिर वही लड़का दिखा था.
‘‘हां, कहो? अब क्या बात है?’’
‘‘आंटी, मैं इतने बड़े मकान में कहीं भी रह लूंगा. अभी तो मेरा सामान भी रेलवे स्टेशन पर ही पड़ा है…’’ उस के स्वर में अनुनय का भाव था.
‘‘कहा न, कोई कमरा खाली नहीं है.’’
‘‘पर यह,’’ कह कर उस ने छोटे से गैराज की तरफ इशारा किया था.
मीना का ध्यान भी अब उधर गया. मकान में यह हिस्सा कार के लिए रखा था. कार तो आ नहीं पाई. हां, पर शीना की शादी के समय इस में एक मामूली सा दरवाजा लगा कर कमरे का रूप दे दिया था. हलवाई और नौकरों के लिए पीछे एक कामचलाऊ टायलेट भी बना था. अब यह हिस्सा घर के फालतू सामान के लिए था.
‘‘इस में रह लोगे…पढ़ाई हो जाएगी?’’ मीना ने आश्चर्य से पूछा था.
‘‘हां, क्यों नहीं, लाइट तो होगी न…’’
वह लड़का अब अंदर आ गया था. गैराज देख कर वह उत्साहित था. कहने लगा, ‘‘यह मेज और कुरसी तो मेरे काम आ जाएगी और ये तख्त भी….’’
मीना समझ नहीं पा रही थी कि क्या कहे. लड़के ने जेब से कुछ नोट निकाले और कहने लगा, ‘‘आंटी, यह 500 रुपए तो आप रख लीजिए. मैं 800 रुपए से ज्यादा किराया आप को नहीं दे पाऊंगा. बाकी 300 रुपए मैं एकदो दिन में दे दूंगा. अब सामान ले आऊं?’’
500 रुपए हाथ में ले कर मीना अचंभित थी. चलो, एक किराएदार और सही. बाद में इस हिस्से को भी ठीक करा देगी तो इस का भी अच्छा किराया मिल जाएगा.
घंटे भर बाद ही वह एक रिकशे पर अपना सामान ले आया था. मीना ने देखा एक टिन का बक्सा, एक बड़ा सा पुराना बैग और एक पुरानी चादर की गठरी में कुछ सामान बंधा हुआ दिख रहा था.
‘‘ठीक है, सामान रख दो. अभी नौकरानी आती होगी तो मैं सफाई करवा दूंगी.’’
‘‘आंटी, झाड़ू दे दीजिए. मैं खुद ही साफ कर लूंगा.’’
खैर, नौकरानी के आने के बाद थोड़ा फालतू सामान मीना ने बाहर निकलवा लिया और ढंग की मेज कुरसी उसे पढ़ाई के लिए दे दी. राघव ने भी अपना सामान जमा लिया था.
शाम को जब मीना ने दीपक से जिक्र किया तो उन्होंने हंस कर कहा था, ‘‘देखो, अधिक लालच मत करना. वैसे यह तुम्हारा क्षेत्र है तो मैं कुछ नहीं बोलूंगा.’’ मीना को यह लड़का निखिल और सुबोध से काफी अलग लगा था. रहता भी दोनों से अलग थलग ही था जबकि तीनों एक ही क्लास में पढ़ते थे.
उस दिन शाम को बिजली चली गई तो मीना बाहर बरामदे में आ गई थी. निखिल और सुबोध बैडमिंटन खेल रहे थे. अंधेरे की वजह से राघव भी बाहर आ गया था पर दोनों ने उसे अनदेखा कर दिया. वह दूर कोने में चुपचाप खड़ा था. फिर मीना ने ही आवाज दे कर उसे पास बुलाया.
‘‘तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है? मन तो लग गया न?’’
‘‘मन तो आंटी लगाना ही है. मां ने इतनी जिद कर के पढ़ने भेजा है, खर्चा किया है…’’
‘‘अच्छा, और कौन कौन हैं घर में?’’
‘‘बस, मां ही हैं. पिताजी तो बचपन में ही नहीं रहे. मां ने ही सिलाई बुनाई कर के पढ़ाया. मैं तो चाह रहा था कि वहीं आगे की पढ़ाई कर लूं पर मां को पता नहीं किस ने इस शहर की आई आई टी क्लास की जानकारी दे दी थी और कह दिया कि तुम्हारा बेटा पढ़ने में होशियार है, उसे भेज दो. बस, मां को जिद सवार हो गई,’’ मां की याद में उस का स्वर भर्रा गया था.
‘‘अच्छा, चलो, अब मां का सपना पूरा करो,’’ मीना के मुंह से भी निकल ही गया था. सुबोध और निखिल भी थोड़े अचंभित थे कि वह राघव से क्या बात कर रही है.
एक दिन नौकरानी ने आ कर कहा, ‘‘दीदी, देखो न गैराज से धुआं सा निकल रहा है.’’
‘‘धुआं…’’ मीना घबरा गई और रसोई में गैस बंद कर के वह बाहर आई. हां, धुआं तो है पर राघव क्या अंदर नहीं है.
मीना ने जा कर देखा तो वह एक स्टोव पर कुछ बना रहा था. कैरोसिन का बत्ती वाला स्टोव धुआं कर रहा था.
‘‘यह क्या कर रहे हो?’’
चौंक कर मीना को देखते हुए राघव बोला, ‘‘आंटी, खाना बना रहा हूं.’’
‘‘यहां तो सभी बच्चे टिफिन मंगाते हैं. तुम खाना बना रहे हो तो फिर पढ़ाई कब करोगे.’’
‘‘आंटी, अभी मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं. टिफिन महंगा पड़ता है तो सोचा कि एक समय खाना बना लूंगा. शाम को भी वही खा लूंगा. यह स्टोव भी अभी ले कर आया हूं,’’ राघव धीमे स्वर में बोला.
राघव की यह मजबूरी मीना को झकझोर गई. ‘‘देखो, तुम्हारी मां जब रुपए भेज दे तब किराया दे देना. अभी ये रुपए रखो और कल से टिफिन सिस्टम शुरू कर दो. समझे…’’
मीना ने राघव के रुपए ला कर उसे वापस कर दिए. राघव डबडबाई आंखों से मीना को देखता रह गया.बाद में मीना ने सोचा कि पता नहीं क्यों मांबाप पढ़ाई की होड़ में बच्चों को इतनी दूर भेज देते हैं. इस शहर में इतने बच्चे आईआईटी की पढ़ाई के लिए आ कर रह रहे हैं. गरीब मातापिता भी अपना पेट काट कर उन्हें पैसा भेजते हैं. अब राघव पता नहीं पढ़ने में कैसा हो पर गरीब मां खर्च तो कर ही रही है.
महीने भर बाद मीना की मुलाकात गीता से हो गई. गीता उस की बड़ी बेटी शीना की सहेली थी और आजकल जगदीश कोचिंग में पढ़ा रही थी. कभी- कभार शीना का हाल चाल जानने घर आ जाती थी.
‘‘तेरी क्लास में राघव नाम का भी कोई लड़का है क्या? कैसा है पढ़ाई में? टेस्ट में क्या रैंक आ रही है?’’ मीना ने पूछ ही लिया.
‘‘कौन? राघव प्रकाश… वह जो बिहार से आया है. हां, आंटी, पढ़ाई में तो तेज लगता है. वैसे तो केमेस्ट्री की कक्षा ले रही हूं पर जगदीशजी उस की तारीफ कर रहे थे कि अंकगणित में बहुत तेज है. गरीब सा बच्चा है…’’
मीना चुप हो गई थी. ठीक है, पढ़ने में अच्छा ही होगा.
कुछ दिनों बाद राघव किराए के रुपए ले कर आया तो मीना ने पूछा, ‘‘तुम्हारे टिफिन का इंतजाम तो है न?’’
‘‘हां, आंटी, पास वाले ढाबे से मंगा लेता हूं.’’
‘‘चलो, सस्ता ही सही. खाना तो ठीक मिल जाता होगा?’’ फिर मीना ने निखिल और सुबोध को बुला कर कहा था, ‘‘यह राघव भी यहां पढ़ने आया है. तुम लोग इस से भी दोस्ती करो. पढ़ाई में भी अच्छा है. शाम को खेलो तो इसे भी अपनी कंपनी दो.’’
‘‘ठीक है, आंटी…’’ सुबोध ने कुछ अनमने मन से कहा था.
इस के 2 दिन बाद ही निखिल हंसता हुआ आया और कहने लगा, ‘‘आंटी, आप तो रघु की तारीफ कर रही थीं…पता है इस बार उस के टेस्ट में बहुत कम नंबर आए हैं. जगदीश सर ने उसे सब के सामने डांटा है.’’
‘‘अच्छा,’’ कह कर मीना खामोश हो गई तो निखिल चला गया. उस के बाद वह उठ कर राघव के कमरे की ओर चल दी. जा कर देखा तो राघव की अांखें लाल थीं. वह काफी देर से रो रहा था.
‘‘क्या हुआ…क्या बात हुई?’’
‘‘आंटी, मैं अब पढ़ नहीं पाऊंगा. मैं ने गलती की जो यहां आ गया. आज सर ने मुझे बुरी तरह से डांटा है.’’
‘‘पर तुम्हारे तो नंबर अच्छे आ रहे थे?’’
‘‘आंटी, पहले मैं आगे बैठता था तो सब समझ में आ जाता था. अब कुछ लड़कों ने शिकायत कर दी तो सर ने मुझे पीछे बिठा दिया. वहां से मुझे कुछ दिखता ही नहीं है, न कुछ समझ में आ पाता है. मैं क्या करूं?’’
‘‘दिखता नहीं है, क्या आंखें कमजोर हैं?’’
‘‘पता नहीं, आंटी.’’
‘‘पता नहीं है तो डाक्टर को दिखाओ.’’
‘‘आंटी, पैसे कहां हैं…मां जो पैसे भेजती हैं उन से मुश्किल से खाने व पढ़ाई का काम चल पाता है. मैं तो अब लौट जाऊंगा…’’ कह कर वह फिर रो पड़ा था.
‘‘चलो, मेरे साथ,’’ मीना उठ खड़ी हुई थी. रिकशे में उसे ले कर पास के आंखों के एक डाक्टर के यहां पहुंच गई और आंखें चैक करवाईं तो पता चला कि उसे तो मायोपिया है.
‘‘चश्मा तो इसे बहुत पहले ही लेना था. इतना नंबर तो नहीं बढ़ता.’’
‘‘ठीक है डाक्टर साहब, अब आप इस का चश्मा बनवा दें….’’
घर आ कर मीना ने राघव से कहा था, ‘‘कल ही जा कर अपना चश्मा ले आना, समझे. और ये रुपए रखो. दूसरी बात यह कि इतना दबदब कर मत रहो कि दूसरे बच्चे तुम्हारी झूठी शिकायत करें, समझे…’’
राघव कुछ बोल नहीं पा रहा था. झुक कर उस ने मीना के पैर छूने चाहे तो वह पीछे हट गई थी.
‘‘जाओ, मन लगा कर पढ़ो. अब नंबर कम नहीं आने चाहिए…’’
अब कोचिंग क्लासेस भी खत्म होने को थीं. बच्चे अपने अपने शहर जा कर परीक्षा देंगे. यही तय था. राघव भी अब अपने घर जाने की तैयारी में था. निखिल और सुबोध से भी उस की दोस्ती हो गई थी.
सुबोध ने ही आ कर कहा कि आंटी, राघव की तबीयत खराब हो रही है.
‘क्यों, क्या हुआ?’’
‘‘पता नहीं, हम ने 2-2 रजाइयां ओढ़ा दीं फिर भी थरथर कांप रहा है.’’
मीना ने आ कर देखा.
‘‘अरे, लगता है तुम्हें मलेरिया हो गया है. दवाई ली थी?’’
‘‘जी, आंटी, डिस्पेंसरी से लाया तो था और कल तक तो तबीयत ठीक हो गई थी, पर अचानक फिर खराब हो गई. पता नहीं घर भी जा पाऊंगा या नहीं. परीक्षा भी अगले हफ्ते है. दे भी पाऊंगा या नहीं…’’
कंपकंपाते स्वर में राघव बड़बड़ा रहा था. मीना ने फोन कर के डाक्टर को वहीं बुला लिया फिर निखिल को भेज कर बाजार से दवा मंगवाई.
दूध और खिचड़ी देने के बाद दवा दी और बोली, ‘‘तुम अब आराम करो. बिलकुल ठीक हो जाओगे. परीक्षा भी दोगे, समझे.’’
काफी देर राघव के पास बैठ कर वह उसे समझाती रही थी. मीना खुद समझ नहीं पाई थी कि इस लड़के के साथ ऐसी ममता सी क्यों हो गई है उसे.
दूसरे दिन राघव का बुखार उतर गया था. 2 दिन मीना ने उसे और रोक लिया था कि कमजोरी पूरी दूर हो जाए.
जाते समय जब राघव पैर छूने आया तब भी मीना ने यही कहा था कि खूब मन लगा कर पढ़ना.
बच्चों के जाने के बाद कमरे सूने तो हो गए थे पर मीना अब संतुष्ट थी कि 2 महीने बाद फिर दूसरे बच्चे आ जाएंगे. घर फिर आबाद हो जाएगा. गैराज वाले कमरे को भी अब और ठीक करवा लेगी.
आईआईटी का परिणाम आया तो पता चला कि राघव की फर्स्ट डिवीजन आई है. निखिल और सुबोध रह गए थे.
राघव का पत्र भी आया था. उसे कानपुर आईआईटी में प्रवेश मिल गया था. स्कालरशिप भी मिल गई थी.
‘ऐसे ही मन लगा कर पढ़ते रहना,’ मीना ने भी दो लाइन का उत्तर भेज दिया था. दीवाली पर कभी कभार राघव के कार्ड आ जाते. अब तो दूसरे बच्चे कमरों में आ गए थे. मीना भी पुरानी बातों को भूल सी गई थी. बस, गैराज को देख कर कभीकभार उन्हें राघव की याद आ जाती. समय गुजरता रहा था.
दरवाजे पर उस दिन सुबह सुबह ही घंटी बजी थी.
‘‘आंटी, मैं हूं राघव. पहचाना नहीं आप ने?’’
‘‘राघव…’’ आश्चर्य भरे स्वर के साथ मीना ने उसे ऊपर से नीचे तक देखा था. दुबलापतला शरीर थोड़ा भर गया था. आंखों पर चश्मा तो था पर चेहरे पर दमक बढ़ गई थी.
‘‘आओ, बेटा, कैसे हो… आज कैसे अचानक याद आ गई हम लोगों की.’’
‘‘आंटी, आप की याद तो हरदम आती रहती है. आप नहीं होतीं तो शायद मैं यहां तक पहुंच ही नहीं पाता. मेरा कोर्स पूरा हो गया है और आप ने कहा कि मन लगा कर पढ़ना तो फाइनल में भी अच्छी डिवीजन आई है. कैंपस इंटरव्यू में चयन हो कर नौकरी भी मिल गई है.’’
‘‘अच्छा, इतनी सारी खुशखबरी एकसाथ,’’ कह कर मीना हंसी थी.
‘‘हां, आंटी, पर मेरी एक इच्छा है कि जब मुझे डिगरी मिले तो आप और अंकल भी वहां हों, आप लोगों से यही प्रार्थना करने के लिए मैं यहां खुद आया हूं.’’
‘‘पर, बेटा…’’ मीना इतना बोलते- बोलते अचकचा गई थी.
‘‘नहीं, आंटी, ना मत कहिए. मैं तो आप के लिए टिकट भी बुक करा रहा हूं. आज आप लोगों की वजह से ही तो इस लायक हो पाया हूं. मैं जानता हूं कि जबजब मैं लड़खड़ाया आप ने ही मुझे संभाला. एक मां थीं जिन्होंने जिद कर के मुझे इस शहर में भेजा और फिर आप हैं. मां तो आज यह दिन देखने को रही नहीं पर आप तो हैं…आप मेरी मां…’’
राघव का भावुक स्वर सुन कर मीना भी पिघल गई थी. शब्द भी कंठ में आ कर फंस गए थे.
शायद‘मां’ शब्द की सार्थकता का बोध यह बेटा उन्हें करा रहा था.

29/07/2020
28/07/2020

प्रायश्‍चित
शादी के पश्‍चात बेटी की बिदाई परिवार में किस कदर एकाकीपन, सूनापन व उदासी ला देती है, इसे सुधीर बाबू शिद्दत से महसूस कर रहे थे. उनकी एकमात्र संतान सुहानी को बिदा हुए सात दिन ही हुए हैं, लेकिन उन्हें लग रहा है पता नहीं कितना लंबा अरसा हो गया सुहानी से मिले हुए. दो-तीन दिन तो घर में मेहमान थे, इसलिए अकेलापन महसूस नहीं हुआ. अब जब सब जा चुके हैं तो सुधीर नितांत अकेले रह गए हैं. पिछले वर्ष ही दिल का दौरा पड़ने पर उनकी पत्नी मौत के मुंह में समा गई थीं. अचानक हुए हादसे से पिता-पुत्री को सहज होने में का़फ़ी व़क़्त लगा था. जब सुहानी की शादी तय हुई तो उसने कहा, “पापा, इतनी जल्दी क्या है? मेरे जाने के बाद आप एकदम अकेले पड़ जाएंगे.” सुधीर बोले, “जीवन इसी का नाम है. यहां सुख-दुख का मेला लगा ही रहता है. कोई न कोई रास्ता निकल ही आएगा.” दोपहर का खाना खाकर सुधीर अपनी पसंद की क़िताब पढ़ने लगे. पढ़ने का शौक़ उन्हें शुरू से ही रहा. कई बार पत्नी कहती भी थी, “ये तुम्हारी क़िताबें तो मेरी सौतन की तरह हैं. उनमें डूब जाते हो, तो मुझसे बात करने की फुर्सत ही नहीं मिलती.” वे मुस्कुरा देते. फिर क़िताब बंद कर एक ओर रखते हुए कहते, “लो छोड़ दिया तुम्हारी सौतन को, अब तो ख़ुश हो.” फिर स्वयं ही कह उठते, “जब रिटायरमेंट के बाद कुछ काम नहीं होगा, व़क़्त नहीं कटेगा, तब यही पढ़ने का शौक़ बहुत काम आएगा, समझी...?” पत्नी भी मुस्कुरा देती. अभी मुश्क़िल से दो पृष्ठ ही पढ़ पाए थे, तभी दरवाज़े की घंटी बजी. देखा तो पोस्टमैन रजिस्ट्री लाया था. हस्ताक्षर करके चिट्ठी ली. भेजनेवाले के नाम की जगह ‘सपना’ पढ़ा तो चौंक गए. क्या सचमुच यह वही सपना है? लेकिन पच्चीस वर्षों के बाद इसे अचानक कैसे और क्यों मेरी याद आई? पच्चीस साल पहले उसने स्वयं ही सारे संबंध तोड़ लिए थे. फिर आज अचानक चिट्ठी भेजने का क्या कारण हो सकता है? वे वापस अपने कमरे में आए. कुर्सी पर बैठे और कौतूहल से चिट्ठी खोलने लगे. काफ़ी लंबी चिट्ठी लिखी हुई थी. सुधीर ने चश्मा लगाया और पढ़ने लगे. प्रिय सुधीर, समझ नहीं आ रहा शुरुआत किस तरह करूं? हालांकि पी.एच.डी. करके डॉक्टर की उपाधि पा चुकी हूं, लेकिन कई बार ऐसे पदवीधारी भी अपनी छोटी-सी बात को प्रभावी ढंग से पेश नहीं कर पाते. खैर, जीवन की सांध्य-बेला में पीछे मुड़कर देखती हूं, तो महसूस होता है कि पाने से अधिक खोया ही है. इस खोने के पीछे शायद मेरा अहम्, ज़िद्दीपन, अहंकार ही है, यह अब समझ आ रहा है. जब तुम बार-बार इस ओर इंगित करके मुझे संभलने के लिए कहते थे, तब मुझे बहुत बुरा लगता था. एकदम बिदक उठती थी मैं. ग़ुस्सा नाक पर धरा होता था. तुम्हारे कुछ कहने-समझाने में मुझे अपना अपमान महसूस होता था, क्योंकि मैं स्वयं को तुम्हारे खानदान से बहुत श्रेष्ठ, बल्कि श्रेष्ठतम मानती थी. जब हमारी शादी हुई, उस व़क़्त मैं एम.एड. कर रही थी. तुम पी.डब्ल्यू.डी. में जूनियर इंजीनियर के पद पर नौकरी कर रहे थे. तुमसे बड़ी दोनों बहनें अधिक पढ़ी-लिखी नहीं थीं और छोटी भी अभी दसवीं में थी. घर में, बल्कि ख़ानदान में तुम एकमात्र डिग्रीधारी व्यक्ति थे और परिवार में अकेले पुत्र. इस कारण तुम्हें बहुत महत्व दिया जाता था. शुरू में मुझे भी अच्छा लगता था, जब पूरा परिवार तुम्हें हाथों हाथ लेता था, तुम्हारे आगे-पीछे दौड़ता था. लेकिन कुछ समय बाद मुझे महसूस होने लगा कि इतनी पढ़ी-लिखी, सुंदर व स्मार्ट होने के बावजूद मुझे वह इ़ज़्ज़त और मान नहीं मिल रहा है, जिसकी मुझे अपेक्षा थी. मैं मन ही मन इस बात को लेकर कुढ़ने लगी. फिर बहुत सोच-विचार के बाद मैंने निर्णय लिया कि अपनी शिक्षा, क़ाबिलियत के बल पर अपनी अलग पहचान बनाऊंगी. ज़िद्दी तो मैं बचपन से ही थी. अकेली संतान होने के कारण मेरी हर मांग, हर ज़िद पूरी कर दी जाती थी. मैंने निश्‍चय किया और कॉलेज में प्राध्यापिका के पद के लिए आवेदन कर दिया. मेरा चयन हो गया. जब घर में यह बात पता लगी, तो सभी ने इसका विरोध किया. सबसे पहले तुमने ही पूछा था, “मुझसे पूछे ब़ग़ैर तुमने आवेदन कैसे कर दिया? इतना बड़ा निर्णय घर के, परिवार के सदस्यों की अनुमति के ब़ग़ैर लेकर तुम क्या सिद्ध करना चाहती हो?” मैं भी आवेश में आ गई थी, “मैंने इतनी पढ़ाई इसलिए तो नहीं की कि घर बैठकर चूल्हा-चौका करूं और बच्चे पैदा करके उन्हें पालती रहूं! आख़िर मेरी भी कोई पहचान होनी चाहिए.” बात आगे न बढ़ जाए, इसलिए उस व़क़्त तुम चुप लगा गए थे, फिर एकांत में मुझे समझाने लगे थे, ‘सास-ससुर चाहते हैं कि मैं इकलौती बहू होने के कारण पारिवारिक ज़िम्मेदारियों को निभाऊं, उनकी सेवा करूं, घर-गृहस्थी की बागडोर संभालूं. अब जीवन की सांध्य-बेला में वे भी कुछ आराम चाहते हैं.’ मैं ताव खा गई थी, “अपना करियर चौपट करके घर-गृहस्थी में पिसने में मुझे कोई रुचि नहीं है. मैं तो नौकरी करूंगी ही. हां, जितना बन सकेगा, उतना घर के कामों में सहयोग दे दूंगी. बस, इससे अधिक मुझे कुछ नहीं कहना.” तुमने फिर भी अपनी ओर से समझाने का प्रयास किया था, “अभी कुछ समय रुक जाओ. सब कुछ व्यवस्थित हो जाएगा, तो अगले साल इस विषय पर सोचेंगे. शायद तब तक मम्मी-डैडी भी इसके लिए तैयार हो जाएं.” लेकिन मैं अपनी ज़िद पर अड़ी रही. अगले महीने से ही मैंने कॉलेज जाना शुरू कर दिया था. हमारी शादी हुए छह महीने बीत चुके थे. अगले छह महीने बीतने के बाद मैंने महसूस किया कि जिस शिक्षा, क़ाबिलियत, नौकरी के दम पर मैं सबको प्रभावित करके मान-सम्मान पाना चाहती थी, लोकप्रिय होना चाहती थी, वैसा कुछ भी नहीं हुआ. विपरीत इसके सास-ससुर के चेहरे पर कभी तृप्ति नहीं दिखी. एक-दो बार तो उन्होंने कह भी दिया, “सबेरे नौ बजे से शाम पांच बजे तक तो बाहर रहती है. वापस लौटती है, तो थकी-हारी अपने कमरे में बंद हो जाती है. हमारे साथ न ढंग से बातचीत करती है, न घर के कामों की ज़िम्मेदारी उठाती है. बहू लाकर क्या सुख मिल रहा है हमें?” तुम भी चुप लगा गए थे, लेकिन मुझे काफ़ी क्रोध आया था. मैं बोल पड़ी थी, “आख़िर मुझे भी अपनी ज़िंदगी अपने ढंग से जीने का अधिकार है. आप लोग बेकार ही छोटी-छोटी बातों पर आपत्ति करते हैं.” तुमने उस व़क़्त तो कुछ नहीं कहा, लेकिन रात को अपने कमरे में आते ही आवेश से भर उठे थे, “सपना, मम्मी-डैडी से इस तरह बोलने से पहले सोच तो लिया होता. शादी का दूसरा नाम ही समझौता है. हर वह लड़की, जो माहौल के अनुरूप स्वयं को ढाल लेती है, जीवन में स्वयं भी सुखी रहती है और परिवार को भी ख़ुशियां देती है. आख़िर तुम स्वयं को समझती क्या हो और चाहती क्या हो?” मैं भी पलटकर बोल उठी थी, “मुझे स्वयं को बदलने में कोई रुचि नहीं है. मैं जैसी भी हूं, अच्छी हूं. मैं ऐसी ही रहूंगी. अगर आपको पसंद नहीं, तो मैं अपने घर चली जाती हूं.” तुमने क्रोध से कहा था, “अपने मायके का रौब झाड़ना बंद करो. अब यही तुम्हारा घर है और सबसे मिल-जुलकर रहना सीखो.” लेकिन मैं तो अड़ियल, हठी थी ही. तुम्हारी ओर उपेक्षाभरी दृष्टि डालकर मुंह फेरकर सो गई थी. ऐसी घटना हर महीने में एक-दो बार हो जाती थी. डेढ़ वर्ष बीत चुका था. तुम्हारे माता-पिता चाहते थे घर में एक बच्चा आ जाए, तो माहौल ख़ुशनुमा हो जाएगा, लेकिन मैं इसके लिए तैयार नहीं थी. मुझे बच्चे से अधिक अपना करियर बनाने में रुचि थी. अपनी अलग पहचान, छवि बनाना चाहती थी मैं. इस बात पर भी तकरार, मनमुटाव होने लगे थे. मेरा दम घुटने लगा था. एक दिन किसी मुद्दे पर तुम्हारे साथ गरमा-गरम बहस हो गयी थी. कुछ दिन हमारी बातचीत बंद रही. उन्हीं परिस्थितियों के बीच मैंने अलग होने का फैसला ले लिया. दूसरे दिन अपना सारा सामान इकट्ठा कर जब मैंने तुम्हें अपने फैसले के बारे में बताया, तो तुमने आख़िरी कोशिश करते हुए कहा था, “मैंने अच्छी तरह से सोच-समझकर ही फैसला लिया है. जब दिल ही नहीं मिल रहे, तो रिश्तों को जबरन ढोने का नाटक क्यों करें? मैं जा रही हूं.” मैं तैश में बोली. तुम्हारे माता-पिता को भी मैंने अनदेखा कर दिया और घर से बाहर निकल गई. मायके आने पर मम्मी-डैडी ने शुरू में तो हाथों हाथ लिया, लेकिन जब उन्हें वास्तविकता पता लगी, तो वे भी ज़माने की ऊंच-नीच समझाते रहे, मुझे वापस लौटने के लिए मनाते रहे. मगर मैंने तो तुम्हारे साथ न रहने का निर्णय कर लिया था. मामूली-सी औपचारिकताओं के बाद हमारा तलाक़ हो गया. अब मैं एकदम स्वतंत्र होकर कॉलेज में अध्यापन की नौकरी करने लगी थी. जिस प्रकार आज़ाद, स्वच्छंद, मनमर्ज़ी से जीवन जीना चाहती थी, अब उसी प्रकार जी रही थी. मम्मी-डैडी ने न पहले कभी मुझ पर प्रतिबंध लगाए थे, न वे अब लगा रहे थे. सहजता से जीवन की गाड़ी चल रही थी. दो वर्ष बीत गए. इस बीच किसी संबंधी से पता लगा कि तुम्हारी दूसरी शादी हो गई है और एक बेटी भी पैदा हो गई है. क्षणभर के लिए मन में कुछ चुभन, कुछ खोने जैसा एहसास हुआ था, लेकिन मैंने फौरन उसे निकाल फेंका था. इधर मम्मी-डैडी मेरी शादी के लिए चिंतित होने लगे थे. उन्होंने इस दिशा में प्रयास तेज़ कर दिए, लेकिन मुझ पर लगे ‘तलाक़शुदा’ के लेबल के कारण कई अच्छे रिश्तों के मुझ तक पहुंचने के द्वार बंद हो जाते थे. पांच वर्ष इसी तरह बीत गए. मम्मी-डैडी मेरे कारण बेहद तनाव में रहने लगे थे. कॉलेज में जब मेरी कोई सहकर्मी अपने पति-बच्चों के बारे में बात करती, तो मेरे मन में कसक उठने लगती. लगता शायद मैंने तुमसे अलग होकर ग़लत क़दम उठा लिया. फिर पता नहीं कैसे कॉलेज के वरिष्ठ प्राध्यापक कमलाकांत से हुई मुलाक़ात धीरे-धीरे आत्मीयता में बदलने लगी. सालभर हमने एक-दूसरे को अच्छी तरह परखने के पश्‍चात शादी करने का निर्णय ले लिया. अब की बार मैंने मन बना लिया था कि थोड़े-बहुत समझौते करने पड़े, तो कर लूंगी. अपनी ज़िद व अहम के चलते एक बार तो बसा-बसाया घर तोड़ दिया था, दोबारा ऐसा नहीं करूंगी. शादी में एक सप्ताह रह गया था. कमलाकांत किसी सेमीनार के सिलसिले में दो दिन के लिए शहर से बाहर गए थे. वापस लौटते व़क़्त उनकी कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई और घटनास्थल पर ही उनकी मौत हो गई. समाचार सुनकर मेरी हालत पागलों की तरह हो गई. अब सब कुछ ख़त्म हो चुका था. इस सदमे से उबरने में लंबा व़क़्त लगा था. मैंने निर्णय कर लिया कि अब ज़िंदगी अकेली ही काटूंगी. पहले शादी करके मैने स्वयं अपनी ज़िंदगी को उजड़ने के रास्ते पर डाला, दूसरी बार नियति ने ख़ुशियां देने से पहले ही छीन लीं. मेरी स्थिति से मम्मी-डैडी को बेहद मानसिक तनाव रहने लगा था. पांच वर्ष के भीतर ही पहले डैडी, फिर मम्मी दोनों का निधन हो गया. अब मैं नितांत अकेली रह गई थी और भीतर से टूट चुकी थी. अपने व्यवहार पर अब पछतावा होता था, लेकिन उससे क्या होना था? कहते हैं न समय ही ज़ख़्मों को भरने की दवा है. धीरे-धीरे मैंने भी जीवन के साथ समझौता कर लिया. फिर समय काटने, व्यस्त रहने के लिए दो-तीन सामाजिक संस्थाओं से जुड़ गई. साथ ही पीएचडी की तैयारी भी शुरू कर दी. जीवन फिर से सहज होने लगा था. दस वर्ष बीतने के बाद कॉलेज में मुझे प्रिंसिपल के पद पर नियुक्ति मिल गई. इस बीच दो-चार बार लोगों से तुम्हारे बारे में ख़बरें मिलती रहीं कि तुम्हारी पत्नी को दिल का दौरा पड़ा, कुछ दिन अस्पताल में रही थी. तुम्हारी बेटी भी काफ़ी बड़ी हो गई है. कॉलेज में पढ़ती है आदि. मन के कोने से आवाज़ आई थी एक बार अस्पताल जाकर तुम्हारी पत्नी की तबियत पूछ आऊं, मगर तुरंत ही दिमाग़ ने चेताया. इतने वर्षों तक कोई संबंध न होने पर और पहले किए दुर्व्यवहार के कारण पता नहीं तुम्हारी क्या प्रतिक्रिया हो? तुमने अपनी पत्नी को मेरे बारे में न जाने कैसी जानकारी दी होगी. कहीं अपमानित होकर वापस न लौटना पड़े. इसलिए मन की आवाज़ को वहीं दबा दिया. अगले वर्ष ही मुझे पता चला कि तुम्हारी पत्नी का देहांत हो गया है. उस समय भी मन ने बहुत उकसाया था. इंसानियत के नाते दुख-संवेदना प्रकट करने मुझे जाना चाहिए, लेकिन दिमाग़ की चेतावनी के कारण फिर ख़ामोशी से विचारों को झटक दिया. सालभर और बीत गया. इस बीच अभी पता लगा कि तुम्हारी बेटी की शादी तय हो गई है. अगले पंद्रह दिनों में शादी हो जाएगी और वह ससुराल चली जाएगी. उसके बाद तुम नितांत अकेले रह जाओगे और इस अकेलेपन की पीड़ा मुझसे बेहतर कौन जानेगा? बरसों से अकेलेपन का बोझ उठाए जीवन जी रही हूं. तुम सोच रहे होगे जिसे पत्नी बनाकर दो वर्ष साथ रहकर भी अपनेपन का एहसास नहीं हुआ, सुख-दुख से लेना-देना नहीं रहा, उसमें अब बीस वर्षों के बाद कैसे आत्मीयता, सहानुभूति पैदा हो रही है? मैं मानती हूं अपने अहं तथा नादानी के कारण मैंने तुमसे रिश्ता तोड़ लिया, लेकिन कुछ वर्षों बाद पछतावा भी होने लगा था, पर तब कुछ नहीं हो सकता था. अब जब तुम भी अकेले रह गए हो, तो अपनी ग़लती का प्रायश्‍चित करने का मौक़ा समझकर तुमसे कुछ कहना चाहती हूं. मैं मानती हूं कि तुम पर मेरा कोई अधिकार नहीं, लेकिन इंसानियत के नाते, प्रायश्‍चित के नाते तुम्हारे सामने प्रस्ताव रख रही हूं, ‘क्या हम दोनों जीवन की सांध्य-बेला में दुबारा मिलकर नहीं रह सकते? मैं अपनी ग़लतियों की माफ़ी तो मांग ही चुकी हूं. परिपक्वता आने पर, जीवन के उतार-चढ़ावों के बीच काफ़ी अनुभव हुए हैं, जिन्होंने मुझे सीख दी है. अब तुम्हें शिकायत का मौक़ा नहीं दूंगी. तुम्हारी बेटी को शायद इससे ऐतराज़ हो सकता है, मगर वह भी तुम्हारे अकेलेपन के बंटने पर राज़ी हो जाएगी. तुम गहराई से इस विषय पर विचार कर लो, फिर मुझे सूचित करना. तुम्हारी स्वीकृति का इंतज़ार रहेगा.”

28/07/2020

मदद

रात दस बजे लगभग अचानक मुझे एलर्जी हो गई।घर पर दवाई नहीं, न ही इस समय मेरे अलावा घर में कोई और। श्रीमती जी बच्चों के पास गोवा और हम रह गए अकेले। ड्राईवर भी अपने घर जा चुका था बाहर हल्की बारिश की बूंदे सावन महीने के कारण बरस रही थी।

दवा की दुकान ज्यादा दूर नहीं थी पैदल भी जा सकता था लेकिन बारिश की वज़ह से मैंने रिक्शा लेना उचित समझा।

बगल में राम मन्दिर बन रहा था।

एक रिक्शा वाला भगवान की प्रार्थना कर रहा था।

मैंने उससे पूछा चलोगे, तो उसने सहमति में सर हिलाया और बैठ गए हम रिक्शा में!
रिक्शा वाला काफी़ बीमार लग रहा था और उसकी आँखों में आँसू भी थे।

मैंने पूछा,"क्या हुआ भैया! रो क्यूँ रहे हो और तुम्हारी तबियत भी ठीक नहीं लग रही।"
उसने बताया:-

बारिश की वजह से तीन दिन से सवारी नहीं मिली और वह भूखा है बदन दर्द भी कर रहा है,अभी भगवान से प्रार्थना कर रहा था क़ि आज मुझे भोजन दे दो, मेरे रिक्शे के लिए सवारी भेज दो
मैं बिना कुछ बोले रिक्शा रुकवाकर दवा की दुकान पर चला गया।
वहां खड़े खड़े सोच रहा था.......
"कहीं भगवान ने तो मुझे इसकी मदद के लिए नहीं भेजा।

क्योंकि यदि यही एलर्जी आधे घण्टे पहले उठती तो मैं ड्राइवर से दवा मंगाता,रात को बाहर निकलने की मुझे कोई ज़रूरत भी नहीं थी,और पानी न बरसता तो रिक्शे में भी न बैठता।"
मन ही मन भगवांन को याद किया और पूछ ही लिया भगवान से,!
मुझे बताइये क्या आपने रिक्शे वाले की मदद के लिए भेजा है?"
मन में जवाब मिला... "हाँ"...।

मैंने भगवान को धन्यवाद् दिया,अपनी दवाई के साथ रिक्शेवाले के लिए भी दवा ली।

बगल के रेस्तरां से छोले भटूरे पैक करवाए और रिक्शे पर आकर बैठ गया।
जिस मन्दिर के पास से रिक्शा लिया था वहीँ पहुंचने पर मैंने रिक्शा रोकने को कहा।
उसके हाथ में रिक्शे के 30 रुपये दिए,
गर्म छोले भटूरे का पैकेट और दवा देकर बोला:-

"खाना खा कर यह दवा खा लेना, एक एक गोली ये दोनों अभीऔर एक एक कल सुबह नाश्ते के बाद,उसके बाद मुझे आकर फिर दिखा जाना।

रोते हुए रिक्शेवाला बोला:-

"मैंने तो भगवान से दो रोटी मांगी थी मग़र भगवान ने तो मुझे छोले भटूरे दे दिए।कई महीनों से इसे खाने की इच्छा थी। आज भगवान ने मेरी प्रार्थना सुन ली।
और
जो मन्दिर के पास उसका बन्दा रहता था उसको मेरी मदद के लिए भेज दिया।"

कई बातें वह बोलता रहा और मैं स्तब्ध हो सुनता रहा।

घर आकर सोचा क़ि उस रेस्तरां में बहुत सारी चीज़े थीं, मैं कुछ और भी ले सकता था,
समोसा या खाने की थाली ..
पर मैंने छोले भटूरे ही क्यों लिए?
क्या सच् में भगवान ने मुझे रात को अपने भक्त की मदद के लिए ही भेजा था..?

हम जब किसी की मदद करने सही वक्त पर पहुँचते हैं तो इसका मतलब उस व्यक्ति की प्रार्थना भगवान ने सुन ली,

और
हमें अपना प्रतिनिधि बना, देवदूत बना उसकी मदद के लिए भेज दिया।

इसलिए कहते हैं , अचानक आए परोपकार, दान और मदद के मौके को ना गवाएं ....क्या पता.... ईश्वर ने आपको मौका दिया है उनके प्रतिनिधि के रूप में....

26/07/2020

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