17/10/2024
ब्रज कुंजनि वीथिन्ह स्याम फिरैं,
अजहूं पद बाग लता उरझैं।
ब्रज माटी पद रज धूरि बसै,
बनि चन्दन माथ सदा उरझैं।।
ब्रज अवनी लोटत मन मेरो,
हरि चरनन प्रेम पगा उरझैं।
हरि के तन गन्ध रसाइ चलैं,
ब्रज वायू नेह बसा उरझैं।।
ब्रज खेलत लाल गुपाल दिखैं,
छवि जसुमति गाल लला उरझैं।
जल जमुना नीलम झारि बहैं,
जिमि छवि कान्हा संवरा उरझैं।।
जित देखौं नन्दन लाल दिखैं,
दृग टेढ़ो स्याम सखा उरझैं।
कर लकुटी लै छवि स्याम दिखै,
मझि धेनुन्हि़ं बाल सखा उरझैं।।
धुनि बंशी चारहु दिसि आवै,
मन नाचत मोर नचा उरझैं।
तरपत तरसत ब्रज घूमति हौं,
कहूं तो मिलि नन्द लला उरझैं।।
ब्रज माटी तारन हार बनै,
मम कोटिक जनम गंवा उरझैं।
पद स्याम,भवन मम नैन किये,
मन में वृषभानु सुता उरझैं।।
राधे कृष्ण राधे कृष्ण कृष्ण कृष्ण कृष्ण राधे राधे
राधे श्याम राधे श्याम श्याम श्याम राधे राधे