Kurukshetra-The HOLI City

Kurukshetra-The HOLI City महाभारत क़ालीन नगरी और सम्राट हर्षवर्धन की राजधानी कुरुक्षेत्र में आपका हार्दिक स्वागत है

कुरुक्षेत्र यहाँ जन्म लेना स्वर्ग से कम तो नहीं ❤️
22/08/2024

कुरुक्षेत्र यहाँ जन्म लेना स्वर्ग से कम तो नहीं ❤️

05/05/2023

मैक्स म्यूलर जिसने वेदों और मनुस्मृति को अपने हिसाब से परिभाषित किया। डॉ बाबा साहेब अंबेडकर ने भी ख़ुद से रिसर्च करने की बजाय मैक्स म्यूलर को पढ़कर वेदों और मनुसमृति पर अपने विचार रखें।

08/03/2022

विधायक महोदय का धन्यवाद जिसने इस सड़क को राष्ट्रीय पहचान दिलायी।

04/09/2020

KURUKSHETRA- THE HOLI CITY
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पृथूदक तीर्थ, पिहोवापृथूदक नामक यह तीर्थ कुरुक्षेत्र से लगभग 28 कि.मी. की दूरी पर पिहोवा में सरस्वती नदी के किनारे स्थित...
08/04/2019

पृथूदक तीर्थ, पिहोवा

पृथूदक नामक यह तीर्थ कुरुक्षेत्र से लगभग 28 कि.मी. की दूरी पर पिहोवा में सरस्वती नदी के किनारे स्थित है। महाभारत में इस तीर्थ को कुरुक्षेत्र के तीर्थों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण तीर्थ कहा गया है।
पुण्यमाहुः कुरुक्षेत्रं कुरुक्षेत्रात्सरस्वतीम्।
सरस्वत्याश्च तीर्थानि तीर्थेभ्यश्च पृथूदकम्।
(महाभारत, वन पर्व 8/1,.25)
इस तीर्थ के महात्म्य का वर्णन महाभारत के अतिरिक्त भागवत पुराण, भविष्य पुराण, वामन पुराण, वायु पुराण आदि में भी मिलता है। इस तीर्थ का नामकरण महाराज पृथु के नाम पर हुआ है जिन्होंने इस स्थान पर अपने पितरों हेतु उदक (जल) द्वारा तर्पण किया था। वामन पुराण के अनुसार भगवान शंकर ने भी प्राचीन काल में पृथूदक में विधिपूर्वक स्नान किया था:
शंकरोऽपि महातेजा विसृज्य गिरिकन्यकां।
पृथूदकं जगामाथ स्नानं चक्रे विधानतः।।
(वामन पुराण)
वामन पुराण की ही एक कथा के अनुसार गंगाद्वार पर रुषंगु का निवास स्थान था। अपने अन्तकाल को समीप आया देख उसने अपने पुत्रों से स्वयं को पृथूदक ले जाने का आग्रह किया। उसके इस आशय को जान उसके पुत्र उसे पृथूदक तीर्थ में ले गए। रुषंगु ने यहां स्नान किया तथा इस तीर्थ के महत्त्व को बताते हुए कहा कि सरस्वती के उत्तरी तट पर स्थित पृथूदक तीर्थ में जो व्यक्ति जप करता हुआ अपने शरीर का त्याग करता है वह निःसन्देह शाश्वत पद का अधिकारी होता है।
सरस्वती नदी के तट पर स्थित इस तीर्थ के साहित्यगत विवरण को इस क्षेत्र से मिलने वाले पुरातात्त्विक अवशेष पुष्ट करते हैं तथा पृथुदक क्षेत्र से मिली विभिन्न ऐतिहासिक कालों की मूर्तियों से भी इस तथ्य की अपरोक्ष पुष्टि होती है।

 #ब्रह्मसरोवर, कुरुक्षेत्रब्रह्म सरोवर की गणना कुरुक्षेत्र के प्रमुख तीर्थों में होती है। यह तीर्थ ब्रह्मा से सम्बधित हो...
22/03/2019

#ब्रह्मसरोवर, कुरुक्षेत्र

ब्रह्म सरोवर की गणना कुरुक्षेत्र के प्रमुख तीर्थों में होती है। यह तीर्थ ब्रह्मा से सम्बधित होने के कारण ब्रह्म सरोवर नाम से प्रसिद्ध हुआ जिसे सृष्टि का आदि तीर्थ माना जाता है। महर्षि लोमहर्षण ने बह्मा, विष्णु व शिव सबको साक्षी मानकर इसका उल्लेख किया है:-
ब्रह्माणमीशं कमलासनस्थं विष्णुं च लक्ष्मी सहितं तथैव।
रुद्रं च देवं प्रणिपत्य मूध्र्ना तीर्थं वरं ब्रह्मसरः प्रवक्ष्ये।
(वामन पुराण 22/50)
आद्यं ब्रह्मसरः पुण्यं ततो रामह्रद स्मृतः।
इस श्लोक से ब्रह्म सरोवर का महत्त्व स्वमेव सिद्ध हो जाता है। इसका नाम पूर्व में ब्रह्मसर तथा बाद में रामह्रद हुआ।
वामन पुराण के अनुसार सृष्टि रचना का ध्यान करते हुए ब्रह्मा ने चारों वर्णों की रचना इसी स्थान पर की थी। इसी पुराण के अनुसार चतुर्दशी तथा चैत्रमास के कृष्णपक्ष की अष्टमी को इस तीर्थ में स्नान व उपवास करने वाला व्यक्ति जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है। महाभारत के अनुसार इस तीर्थ में स्नान करने वाला व्यक्ति ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है और अपने कुल को पवित्र करता है। कहा जाता है कि वेदों में वर्णित राजा पुरुरवा तथा उर्वशी का विख्यात संवाद इसी सरोवर के तट पर हुआ था।
लौकिक आख्यानों के अनुसार इस सरोवर का सर्वप्रथम जीर्णोंद्धार राजा कुरु ने करवाया था। प्राचीन काल में इसे ब्रह्मा की उत्तरवेदि, ब्रह्मवेदि तथा समन्तपंचक भी कहा जाता था। सूर्यग्रहण के अवसर पर इस सरोवर में किया गया स्नान हजारों अश्वमेध यज्ञों के फल के समान माना जाता है।
यह सरोवर दो भागों में विभक्त है। कहा जाता है कि महाभारत युद्ध के उपरान्त युधिष्ठिर ने दोनो भागों के मध्य स्थित भूमि में एक विजय स्तम्भ का निर्माण करवाया था जोकि कालान्तर में नष्ट हो गया। मध्यकाल में मुस्लिम शासकों द्वारा इस भूमि में सैनिक छावनी का निर्माण करवाया गया था जो सरोवर में स्नान करने वाले तीर्थयात्रियों से जजिया कर वसूल करते थे। सन् 1567 के सूर्यग्रहण के अवसर पर मुगल सम्राट अकबर ने अपनी कुरुक्षेत्र यात्रा के समय यह कर समाप्त कर दिया था। पुनः औरंगजेब ने इस कर को जारी किया। अंततः 18वीं सदी के मध्य में मराठों द्वारा इस कर को समाप्त किया गया था। इसी स्थल पर प्राचीन द्रौपदी कूप निर्मित है जिसे चन्द्र कूप भी कहा जाता है। यह सरोवर एशिया का सबसे विशाल मानव निर्मित सरोवर है। इस सरोवर की विशालता को देखते हुए ही अकबर के दरबारी कवि अबुल फजल ने इसे लघु समुद्र की संज्ञा दी थी।
सरोवर के मध्य में सर्वेश्वर महादेव का मन्दिर शोभायमान है। जनश्रुति के अनुसार ब्रह्मा ने सर्वप्रथम इसी स्थान पर शिवलिंग की स्थापना की थी। सरोवर के पश्चिमी तट पर एक प्राचीन बौद्ध स्तूप के अवशेष तथा आद्य ऐतिहासिक काल की संरचनाएं तथा पुरावशेष मिले हैं जोकि इस सरोवर की प्राचीनता सिद्ध करने के लिए पर्याप्त हैं।

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