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29/12/2025
 #अभिनेता_बॉलीवुड_के
24/11/2025

#अभिनेता_बॉलीवुड_के

"ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः"
20/10/2025

"ॐ श्रीं ह्रीं क्लीं श्रीं क्लीं वित्तेश्वराय नमः"

अहमदाबाद विमान हादसा अत्यंत दुःखद और ह्रदय विदारक।भोलेनाथ मृतकों को मोक्ष प्रदान करें 🙏ॐ शांति🙏
12/06/2025

अहमदाबाद विमान हादसा अत्यंत दुःखद और ह्रदय विदारक।
भोलेनाथ मृतकों को मोक्ष प्रदान करें
🙏ॐ शांति🙏

यह कोई सामान्य पौधा नहीं है यह  #देवीय पौधा है...चमत्कारीक है !! इसके उपयोग इतने हैं की, इसके ऊपर किताब लिखी जा सकती हैं...
03/06/2025

यह कोई सामान्य पौधा नहीं है यह #देवीय पौधा है...चमत्कारीक है !! इसके उपयोग इतने हैं की, इसके ऊपर किताब लिखी जा सकती हैं !! देश भर के अलग अलग क्षेत्रों में इसका उपयोग भिन्न भिन्न रोगों में लिया जाता है...।

🌿सहदेवी🌿

सहदेई की बूटी होती है। उसकी पत्ती तुलसी की पत्ती अथवा पोदीना की पत्ती के समान पतली होती है। इसका वृक्ष छत्ता सा होता है और फूल सफेद होते हैं। स्वाद इसका तीखा होता है। यह सभी जगह पाया जाता है, पर ज्यादा तर बलुई मिटटी वाले भूमि पर ज्यादा पाया जाता है। सिर्फ इसकी पहचान होनी चाहिए इसकी कई जातीयां होती हैं। इसकी लुगदी में पारा फूँका जाता है। सहदेई के पत्ते काली मिर्च के साथ पीस कर पीने से बहुत दिन का ज्वर जाता रहता है। सहदेई की ठंडाई पिलाने से बालक का शीतला नहीं निकलती सहदेई के पत्ते उबाल कर बाँधने से मस्तक की भीतरी पीडा शाँत होती है। सफेद फूल वाली सहदेई के पत्ते का रस निकाल कर कडवी तोमडी की मिंगी और गुजराजी तम्बाकू मिलाकर घोटे सुख जावे तो सुंघने के दे तो सरसाम और मृगी रोग शाँत होता है। सफेद सहदेई के फूल और काली सहदेई का पत्ता उबाल कर शिर पर बाँधने से लकवा रोग दूर होता है। सहदेई के पत्तों का काजल लगाने से दुखती हुई आँख अच्छी हो जाती है। सहदेई के पत्ते घोट कर पीने से सब प्रकार के ज्वर और पथरी रोग जाता रहता है। अर्क पीने से वाय गोला दूर होता है। इसकी जड़ तेल में पीसकर घाव पर लगाने से घाव अच्छा हो जाता है। इसका अर्क कान में टपकाने से मृगी रोग दूर हो जाता है। इसकी जड़ सिर में बाँधने से ज्वर दूर होता है। सहदेई का पंचांग पीने से रक्त प्रदर रोग दूर होता है।

सहदेवी एक छोटा सा कोमल पौधा होता है, जो एक फुट से साढ़े तीन फुट तक की ऊँचाई का होता है। पौधा भले ही कोमल हो पर तंत्र शास्त्र और आयुर्वेद में ये किसी महारथी से कम नहीं है। अपने दिव्य गुणों के कारण आयुर्वेद के ग्रंथों में इसका उल्लेख्य कोई बड़ी बात नहीं है, परन्तु इसमें कई दिव्य गुण हैं। जिसके कारण इसे देवी पद मिला और इसका नाम सहदेवी पड़ा। सहदेवी की बूटी होती है। उसकी पत्ती तुलसी की पत्ती अथवा पोदीना की पत्ती के समान पतली होती है। इसका वृक्ष छत्ता सा होता है और फूल सफेद होते हैं। स्वाद इसका तीखा होता है। यह सभी जगह पाया जाता है पर ज्यादा तर बलुई मिटटी वाले भूमि पर ज्यादा पाया जाता है। सिर्फ इसकी पहचान होनी चाहिए इसकी कई जातीय होती है। इसकी लुगदी में पारा फूँका जाता है।

सहदेवी का छोटा सा पौधा हर जगह खरपतवार की तरह पाया जाता है। इसके नन्हें-नन्हें जामुनी रंग के फूल होते हैं। इसका पौधा अधिक से अधिक एक मीटर तक ऊंचा हो सकता है। सहदेवी का पौधा नींद न आने वाले मरीजों के लिए सबसे अच्छा है। इसे सुखाकर तकिये के नीचे रखने से अच्छी नींद आती है। इसके नन्हे पौधे गमले में लगाकर सोने के कमरे में रख दें। बहुत अच्छी नींद आएगी।

सामाजिक सम्मान हेतु-अगर आप चाहते है कि समाज में आपका मान-सम्मान बढ़े तो सहदेवी के पौधे को पीसकर नित्य माथे पर तिलक लगायें व गणेश स्त्रोत का पाठ करें।यदि किसी जातक का किसी कार्य में मन नहीं लगता हो तो सहदेवी की जड़ को पुष्य नक्षत्र में अभिमंत्रित करके अपने पास रखने से कार्य में मन लगने लगता है।

धनवृद्धि-सहदेवी की जड़ को अभिमंत्रित करके एक लाल वस्त्र में लपेटकर घर की तिजोरी या व्यापार के गल्ले में रख देने से धीरे-धीरे धन की वृद्धि होने लगती है।कण्ठमाला रोग-जो बच्चे कण्ठमाला के रोग से ग्रस्त है, वे सहदेवी की जड़ को अभिमंत्रित करके गले में धारण करने से रोग का शमन होता है।सहदेवी मूल से सिद्ध किए हुए जल से बालक को स्नान कराकर, गुग्गुलु, हींग, मोरपंख, वन तथा नीम पत्र से धूपन करने से रोगों तथा ग्रहादि दोषों से बालक की रक्षा होती है।वास्तुदोष निवारण हेतु-यदि आपके घर में किसी भी प्रकार का वास्तु दोष है, जिसके कारण आपके परिवार की प्रगति नहीं हो पा रही है तो घर के पूर्व या उत्तर दिशा में एक सहदेवी का पौधा लगायें और उसकी नियमित धूप-दीप देकर पूजा करने से घर के वास्तुदोष का शमन होकर समृद्धि व खुशहाली आती है।

सहदेवी पौधे के लाभकारी उपाय, सारी समस्याओं का रामबाण है ये चमत्कारिक प्रयोग ......

घासफूस की श्रेणी में माना जाने वाला सहज सुलभ यह पौधा ताॅत्रिक व आयुर्वेदिक गुणों की खान कहलाता है। यह पौधा गुणों की खाना है, इसलिए इसे देवी पद मिला है। वैसे तो यह पौधा लगभग हर जगह पाया जा सकता है, किन्तु बालू वाली मिट्टी के क्षेत्र में यह अधिक पाया जाता है। आईये जानते यह पौधा आप सभी के जीवन कैसे और कितना उपयोगी है।

#अतिसार - जो लोग अतिसार रोग ग्रस्त हैं, उन्हें सहदेवी पौधे की जड़ के सात टुकड़ों को एक लाल धागे के सहारे कमर में बाॅध लेने से अतिसार रोग ठीक हो जाता है।

#धनवृद्धि - सहदेवी की जड़ को अभिमंत्रित करके एक लाल वस्त्र में लपेटकर घर की तिजोरी या व्यापार के गल्ले में रख देने से धीरे-धीरे धन की वृद्धि होने लगती है।

#कार्य_अनिच्छा .....
यदि किसी जातक का किसी कार्य में मन नहीं लगता हो तो सहदेवी की जड़ को पुष्य नक्षत्र में अभिमंत्रित करके अपने पास रखने से कार्य में मन लगने लगता है।

जो बच्चे कण्ठमाला के रोग से ग्रस्त है...
#कण्ठमाला_रोग - जो बच्चे कण्ठमाला के रोग से ग्रस्त है, वे सहदेवी की जड़ को अभिमंत्रित करके गले में धारण करने से रोग का शमन होता है।

#सामाजिक_सम्मान_हेतु - अगर आप चाहते है कि समाज में आपका मान-सम्मान बढ़े तो सहदेवी के पौधे को पीसकर नित्य माथे पर तिलक लगायें व गणेश स्त्रोत का पाठ करें।

यदि आपके घर में किसी भी प्रकार का वास्तु दोष है तो ...
#वास्तुदोष_निवारण हेतु - यदि आपके घर में किसी भी प्रकार का वास्तु दोष है, जिसके कारण आपके परिवार की प्रगति नहीं हो पा रही है तो घर के पूर्व या उत्तर दिशा में एक सहदेवी का पौधा लगायें और उसकी नियमित धूप-दीप देकर पूजा करने से घर के वास्तुदोष का शमन होकर समृद्धि व खुशहाली आती है।

#प्रसव_वेदना - यदि कोई स्त्री प्रसव वेदना से व्याकुल है हो तो सहदेवी की जड़ को लाल धागे के सहारे उसकी कमर में बाॅध देने से स्त्री शीघ्र ही पीड़ा से मुक्त हो जाती है।

महिला को सन्तान की प्राप्ति होती है........
#सन्तान_लाभ - सहदेवी का समूचा पौधा सुखाकर फिर उसका चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को गाय के घी के साथ मासिकधर्म के पाॅच दिन पूर्व से और पाॅच दिन बाद तक स्त्री को नियमित रूप से सेंवन करना से महिला को सन्तान की प्राप्ति होती है।

#शत्रु_समपर्ण - सहदेवी और अपामार्ग के रस को लोहे के पात्र में रखकर अच्छी तरह घोंटकर फिर उसका तिलक लगाकर शत्रु के सामने जाने पर शत्रु आपके समक्ष आत्म समर्पित हो जाता है।

यह बड़ी कोमल प्रकृति का होता है। बुखार होने पर यह बच्चों को भी दिया जा सकता है। इसका 1-3 ग्राम पंचांग और 3-7 काली मिर्च मिलाकर काढ़ा बना कर सवेरे शाम लें। यह लीवर के लिए भी बहुत अच्छा है।

अगर रक्तदोष है, खाज खुजली है, त्वचा की सुन्दरता चाहिए तो 2 ग्राम सहदेवी का पावडर खाली पेट लें। अगर आँतों में संक्रमण है, अल्सर है या फ़ूड poisoning हो गई है, तो 2 ग्राम सहदेवी और 2 ग्राम मुलेटी/मुलैठी को मिलाकर लें। केवल मुलेटी भी पेट के अल्सर ठीक करती है। अगर मूत्र संबंधी कोई समस्या है तो एक ग्राम सहदेवी का काढ़ा लिया जा सकता है।

यह पाचन-संस्थान को सुदृढ़ करता है... हम सभी जानते हैं कि ज्वर और त्वचा रोग सीधे हमारे लीवर से, पाचन संस्थान से सम्बंधित है... ऐसे में सहदेईया लीवर को ठीक करके पाचन संस्थान को मजबूत करके, लम्बे समय से हो रहे ज्वर को ठीक करती है...इसका परम्परागत लोक-चिकित्सा में अब भी प्रयोग होता है... त्वचा विकारों में भी सहदेईया की जड़ को गाय के कच्चे दूध में पीसकर प्रातः काल खाली पेट एक माह तक पीने से एक्जिमा जैसे गम्भीर त्वचा विकार भी दूर हो जाते हैं....।
सहदेवी के बारे में कहा जाता हैं कि इसकी जड़ को शिखा पर बांधने से बुखार उतर जाता हैं....।

आयुर्वेद में सहदेवी को बहुत ही गुणकारी ओषधि माना गया हैं... इसका सम्पूर्ण भाग उपयोगी माना हैं...इसके बारे में कहा जाता हैं कि यह बुखार में रामबाण औषधि हैं
ज्वर नाशक जड़ियों में सहदेवी का महत्वपूर्ण स्थान है । इसके मूल या फिर सम्पूर्ण पौधे को उखाड़कर सिर पर रखकर पगड़ी बांध लेने मात्र से ही ज्वर कम होने लगता है । वैसे इस जड़ी के विभिन्न प्रयोग हैं लेकिन अधिकांशतया यह यकृत ( Liver ) के लिए खासतौर पर उपयोग में लाया जाता है । ज्वर की शिकायत होने पर इसकी पत्तियों को मसल कर हथेली से थोड़ा ऊपर कलाई में नब्ज के स्थान पर बांधने से ज्वर की निवृत्ति होती है।

#सहदेवी से आयुर्वेदिक उपचार -

1. ज्वर में पसीना लाने के लिये इसका काढ़ा या स्वरस पिलाते हैं।

2. बिस्फोटक में सहदेई के पंचांग का कल्क बना कर लेप करने से सर्व प्रकार के विस्फोटकों का नाश होता है।

3. मूत्रदाह रोग में इसका स्वरस पिलाते हैं।

4. उद्वेष्टन रोग में इसका स्वरस पिलाते हैं।

5. शोथयुक्त भाग पर इसका स्वरस लेप करने से लाभ होता है।

6. कृमि रोग में इसके बीज शहद में साथ देने से कृमियों का नाश होता है।

7. अर्श (बवासीर) में इसके पंचांग से लाभ होता है।

8. सहदेई का मूल (जड़ या डाली) सर के पास रख कर सोने से निद्रा आ जाती है।

9. अश्मरी (पथरी) में इसके पत्तों का स्वरस और 3-4 तुलसी के पत्तों का स्वरस दिन में तीन बार सेवन करने से एक सप्ताह में अश्मरी टूट कर बाहर आ जाती है।

10. मुख रोग में इसके मूल का क्वाथ (काढ़ा) बना कर कुल्ला करने से लाभ होता है।

11. ज्वर में इसके मूल का क्वाथ बना कर पिलाने से पसीना आता है और ज्वर उतर जाता है।

12. कुष्ट रोग में पीत पुष्प वाली सहदेई का स्वरस पीने से लाभ होता है।

13. सहदेवी पौधे की जड़ के सात टुकड़े करके कमर में बांधने से अतिसार रोग मिट जाता है।

14. इसके नन्हें पौधे गमले में लगाकर सोने के कमरे में रख दें। बहुत अच्छी नींद आएगी।

15. यह बड़ी कोमल प्रकृति का होता है। बुखार होने पर यह बच्चों को भी दिया जा सकता है।

16. इसका 1-3 ग्राम पंचांग और 3-7 काली मिर्च मिलाकर काढ़ा बना कर सवेरे शाम लें। यह लीवर के लिए भी बहुत अच्छा है।

17. अगर रक्तदोष है, खाज खुजली है, त्वचा की सुन्दरता चाहिए तो 2 ग्राम सहदेवी का पावडर खाली पेट लें।

18. कंठमाला रोग में इसकी जड़ गले में बांधने से शीघ्र रोग मुक्ति होती है।

19. यदि कोई स्त्री मासिक-धर्म से पांच दिन पूर्व तथा पांच दिन बाद तक गाय के घी में सहदेवी का पंचाग सेवन करे तो अवश्य गर्भ स्थिर होता है।

20. इसको दूध में पीस कर नस्य लेने/सूंघने से स्वस्थ संतान पैदा होती है।

21. प्रसव-वेदना निवारक इसकी जड़ तेल मे घिसकर जन्नेद्रिये पर लेप कर दें अथवा स्त्री की कमर मे बांध दें, तो वह प्रसव-पीढा से मुक्त हो जाती हैं।

22. सहदेई के पत्ते काली मिर्च के साथ पीस कर पीने से बहुत दिन का ज्वर जाता रहता है।

23. सहदेई की ठंडाई पिलाने से बालक को शीतला नहीं निकलती है।

24. सहदेई के पत्ते उबाल कर बाँधने से मस्तक की भीतरी पीड़ा शाँत होती है।

25. सफेद फूल वाली सहदेई के पत्ते का रस निकाल कर कड़वी तोमड़ी की मिंगी और गुजराजी तम्बाकू मिलाकर घोंटे सूख जावे तो सूंघने को दें तो सरसाम और मृगी रोग शाँत होता है।

26. सफेद सहदेई के फूल और काली सहदेई का पत्ता उबाल कर सिर पर बाँधने से लकवा रोग दूर होता है।

27. सहदेई के पत्तों का काजल लगाने से दुखती हुई आँख अच्छी हो जाती है।

28. सहदेई के पत्ते घोट कर पीने से सब प्रकार के ज्वर और पथरी रोग जाता रहता है।

29. अर्क पीने से वाय गोला दूर होता है।

30. इसकी जड़ तेले में पीस कर घाव पर लगाने से घाव अच्छा हो जाता है।

31. इसका अर्क कान में टपकाने से मृगी रोग दूर हो जाता है।

32. इसकी जड़ सिर में बाँधने से ज्वर दूर होता है।

33. सहदेई का पंचांग पीने से रक्त प्रदर रोग दूर होता है।

34. इसकी लुगदी में पारा फूँका जाता है।

35. सहदेई का पंचांग पीने से श्वेत प्रदर रोग दूर होता है।

36. हरिताल के साथ इसकी जड़ के लेप करने से श्लीपद (हाथीपांव) रोग में लाभ होता है।

सहदेई के पत्ते काली मिर्च के साथ पीस कर पीने से बहुत दिन का ज्वर जाता रहता है।

सहदेई की ठंडाई पिलाने से बालक का शीतला नहीं निकलती।

सहदेई के पत्ते उबाल कर बाँधने से मस्तक की भीतरी पीडा शाँत होती है।

सफेद फूल वाली सहदेई के पत्ते का रस निकाल कर कड़वी तोमड़ी की मिंगी और गुजराजी तम्बाकू मिलाकर घोटें। सूख जावे तो सूंघने को दें तो सरसाम और मृगी रोग शाँत होता है।

सफेद सहदेई के फूल और काली सहदेई का पत्ता उबाल कर शिर पर बाँधने से लकवा रोग दूर होता है।

सहदेई के पत्तों का काजल लगाने से दुखती हुई आँख अच्छी हो जाती है।

सहदेई के पत्ते घोट कर पीने से सब प्रकार के ज्वर और पथरी रोग जाता रहता है।

अर्क पीने से वाय गोला दूर होता है।

इसकी जड तेले में पीस कर घाव पर लगाने से घाव अच्छा हो जाता है।

इसका अर्क कान में टपकाने से मृगी रोग दूर हो जाता है।

इसकी जड़ शिर में बाँधने से ज्वर दूर होता है।

सहदेई का पंचांग पीने से रक्त प्रदर रोग दूर होता है।

सहदेवी का पौधा स्वेदजनक होता है इसलिए मलेरिया बुखार में पौधे का आसव दिया जाता है।

पौधे के अर्क का उपयोग ज्वर की स्थिति में मूत्राशय और गले के ऐंठन के उपाय के रूप में किया जाता है।

पौधे का रस शिशुओं को अनियमित मूत्र के साथ दर्द में दिया जाता है।

इसके फूलों का आंखों, बुखार और गठिया में उपयोग किया जाता है।

जड़ों का उपयोग कृमिनाशक के रूप में किया जाता है।

जड़ के रस को पेट दर्द और दस्त में दिया जाता है।

पौधे के बीज कृमिनाशक और जहर के काट का भी काम करते हैं ।

बीजों का उपयोग खांसी, पेट फूलना, पेचिश, ल्यूकोडर्मा, सोरायसिस तथा अन्य पुरानी त्वचा की समस्याओं में किया जाता है।

प्रदर-1 ग्राम सहदेवी मूल कल्क को बकरी के दूध के साथ सेवन करने से प्रदर रोग का शमन होता है।

श्लीपद-सहदेवी मूल कल्क में हरताल मिलाकर लेप करने से चिरकालीन तथा दुर्निवार्य श्लीपद रोग का शमन हो जाता है।
रक्तचंदन तथा सहदेवी को पीसकर लेप करने से श्लीपद में लाभ होता है।

सहदेवी के पत्र-स्वरस को तेल में उबालकर लेप करने से श्लीपद रोग में लाभ होता है।

विस्फोटक-सहदेवी के कल्क को घी में सेंककर विस्फोट पर बाँधने से विस्फोटकों का शमन होता है।

पिडका-चावल के धोवन में सहदेवी जड़ को घिसकर पिडका पर लेप करने से लाभ होता है।

शत्रक्षत-शत्रजन्य क्षत में सहदेवी स्वरस भरकर ऊपर से शरपुंखा स्वरस डालकर वत्र की पट्टी बाँध देने से शीघ्र व्रण का रोपण होता है।

अपची-सहदेवी मूल को पुष्य-नक्षत्र में उखाड़कर बांधने से अपची रोग में लाभ होता है।

विसर्प-सहदेवी पत्र-स्वरस का लेप करने से विसर्प एवं पामा में लाभ होता है।

ज्वर-सहदेवीस्वरस से सिद्ध किया गया तैल ज्वरनाशक है।
सहदेवी की मूल को सिर में बांधने से विषम ज्वर का शमन होता है तथा नींद अच्छी आती है।

अतिसार-जो लोग अतिसार रोग ग्रस्त हैं, उन्हें सहदेवी पौधे की जड़ के सात टुकड़ों को एक लाल धागे के सहारे कमर में बाॅध लेने से अतिसार रोग ठीक हो जाता है।

प्रसव वेदना-यदि कोई स्त्री प्रसव वेदना से व्याकुल है हो तो सहदेवी की जड़ को लाल धागे के सहारे उसकी कमर में बाॅध देने से स्त्री शीघ्र ही पीड़ा से मुक्त हो जाती है।

इसकी पत्तियों के रस को लेप के रूप में उपयोग किया जाता है।

पत्तियों को दाद संक्रमण और एक्जिमा में भी लगाया जाता है।

पत्तियों को तिल के तेल में उबाल कर एलिफेंटियासिस (हाथी पाँव) में उपयोग किया जाता है।

ल्यूकोरिया के इलाज में पौधे के 10 ग्राम पेस्ट को थोड़े घी के साथ 30 से 40 दिनों तक रोजाना लिया जाता है।

आजकल खर पतवार नाशक रसायन के उपयोग से न जाने कितने उपयोगी पौधे नष्ट हो जाते हैं।
कोशिश करे कि इन्हे जाने पहचाने और संरक्षित करे।

सहदेई के बारे में आपके पास जो भी जानकारी हो कॉमेंट के माध्यम से साझा करें।
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#नोट - सहदेई के पौधे को औषधि के रूप में प्रयोग करने से पहले आप किसी आयुर्वेदिक चिकित्सक से परामर्श अवश्य करें।

क्या आप इस  #फल को पहचानते है...?  #लभेर_का_फल।  #लसोढ़ा उर्फ  #गुंदे - मुंह मे जाने के बाद बेहद ही स्वादिष्ट मीठा पर इत...
29/05/2025

क्या आप इस #फल को पहचानते है...? #लभेर_का_फल।
#लसोढ़ा उर्फ #गुंदे - मुंह मे जाने के बाद बेहद ही स्वादिष्ट मीठा पर इतना चिपचीपा होता कि पुरा फेवीकोल ही मान लें मतलब मुंह मे जबडे चिपकने को हो जाते है इसे खाने के बाद पानी पी लें तो डिहाईड्रेसन और लू नही लगती,हम लोग इस फल से बचपन में हम लोग कापी - किताबें चिपकाया करते थे।
इसे हमारे इधर इस फल को लसोढ़ा भी कहा जाता है, यह इस माह (जून)के अंत तक खूब पक चुका होगा,क्योंकि कुछ फल इस प्रकार के होते है की उसके पकने के एक सप्ताह के अंदर मानसूनी वर्षा हो जाए तभी उसकी गुठली में अंकुरण होता है,जिनमें नीम,जामुन,महुआ,प्रमुख है पर लगता है कि लभेर भी संभवतः इसी प्रकार का होगा क्योंकि इनके फल जून अंत तक पकते है,लभेर का फल पकने पर पीला आकर्षक होता है जिसे दूर से देख चिड़िया खींची चली आती है,वह इसे गुठली गुदा समेत पूरा फल निगल जाती है तथा फिर कहीं दूर जाकर बीट कर इसके बीज को फ़ैलाने का काम करती है,वैसे फलों से आकर्षित दो चार फल मनुष्य भी खा लेते है पर गूदा लिरबिरा ,स्वाद रहित होने के कारण यह मनुष्य के भोजन में शामिल नहीं है हां अचार जरूर बनाया जा सकता है किन्तु इन दिनों फलों के राजा आम की बाहुलता के कारण इसे भला कौन पूछे ? यू भी गांव के आस पास मेड़ों बगीचों में विरल ही कहीं जमने के कारण यह पौधा रेयर ही पाया जाता है।

लसोड़े के पेड़ बहुत बड़े होते हैं इसके पत्ते चिकने होते हैं। दक्षिण, गुजरात और राजपूताना में लोग पान की जगह लसोड़े का उपयोग कर लेते हैं। लसोड़ा में पान की तरह ही स्वाद होता है।
इसके पेड़ की तीन से चार जातियां होती है पर मुख्य दो हैं जिन्हें लमेड़ा और लसोड़ा कहते हैं। छोटे और बड़े लसोडे़ के नाम से भी यह काफी प्रसिद्ध है। लसोड़ा की लकड़ी बड़ी चिकनी और मजबूत होती है। इमारती काम के लिए इसके तख्ते बनाये जाते हैं और बन्दूक के कुन्दे में भी इसका प्रयोग होता है। इसके साथ ही अन्य कई उपयोगी वस्तुएं बनायी जाती हैं।
कोई भी पुरुष अपनी खूबसूरती को चेहरे से नहीं अपनी आकर्षक शरीर से दर्शाता है. लेकिन आज कल के खानपान के कारण ही कई लोग बहुत ही ज्यादा दुबले और कमजोर होते है। कई लोग शरीर को ताकतवर और मजबूत बनाने के लिए रोजाना मीट का सेवन करते है. लेकिन उसमे मौजूद ज्यादा मात्रा में तेल मसाले सेहत के लिए हानिकारक होते हैं।
आज हम आपको एक ऐसे फल के बारे में बताने रहें हैं जो बहुत ही शक्तिवर्धक माना जाता है, यह मांस से भी 10 गुना ज्यादा ताकतवर होता हैं। इसका सेवन करते है शरीर में ताकत आ जाती है,इस फल का नाम लसोड़ा है, इसे आम भाषा में भारतीय चेरी भी कहा जाता है, इसका सेवन शरीर के लिए बहुत ही उत्तम और ताकत से भरपूर होता है,आयुर्वेद में लसोड़ा ताकतवर फल माना गया है,आप महीने भर में ही इसको लगातार खाकर शरीर में पहलवानों जैसी ताकत का अनुभव करेंगे।
लसोड़ा में भरपूर मात्रा में कैल्शियम और फास्फोरस होता हैं जो हड्डियों को मजबूत बनता है और शरीर को ताकत प्रदान करता हैं. इस फल को खाने से शरीर में ताकत आती है और शरीर को कई अन्य बीमारियों से राहत मिलती है. इस फल को खाने से आपके शरीर में नई ऊर्जा पैदा होती है जो आपके मस्तिष्क को भी तेज करती है. लसोड़ा का सेवन करने से शरीर में खून की कमी दूर होती हैं।
दाद के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोड़ा के बीजों की मज्जा को पीसकर दाद पर लगाने से दाद मिट जाता है.
फोड़े-फुंसियां के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोड़े के पत्तों की पोटली बनाकर फुंसियों पर बांधने से फुंसिया जल्दी ही ठीक हो जाती हैं।
गले के रोग उपचार में लसोड़ा के फायदे : लिसोड़े की छाल के काढ़े से कुल्ला करने से गले के सारे रोग ठीक हो जाते हैं.
हैजा के उपचार में लसोड़ा के फायदे : लसोडे़ की छाल को चने की छाल में पीसकर हैजा के रोगी को पिलाने से हैजा रोग में लाभ होता है।
दांतों का दर्द दूर करने में लसोड़ा के फायदे : लसोड़े की छाल का काढ़ा बनाकर उस काढ़े से कुल्ला करने से दांतों का दर्द दूर होता है।
लसोड़े का अचार
यह दाद, खाज, खुजली जैसी स्किन समस्याओं से काफी हद तक राहत दिला सकता है. लसोड़े के अचार के सेवन से ब्लड प्रेशर को भी कंट्रोल किया जा सकता है. इसमें एंटी-कैंसर और एंटी-एलर्जिक प्रॉपर्टी भी पाई जाती हैं।
अचार, इन लोगों को नहीं खाना चाहिए--
जिन लोगों को पाचन से जुड़ी समस्याएं हैं, जैसे गैस, अपच, पेट दर्द, और सीने में जलन दिल की समस्या है,हाई ब्लड प्रेशर
,अर्थराइटिस या जोड़ों से जुड़ी समस्याएं हैं ,ऑस्टियोपोरोसिस है।
लसोड़े के अचार में सोडियम की मात्रा ज़्यादा होती है, जिससे कई तरह की समस्याएं हो सकती हैं. अचार में मौजूद सोडियम, शरीर में कैल्शियम के अवशोषण को रोकता है. इससे हड्डियां कमज़ोर होती हैं और दर्द होने लगता है।

 #मधुमक्खियों_की_घटती_संख्या_मानव_जीवन_पर_संकट'यदि पृथवी पर सभी मधुमक्खीयां गायब हो जाये, तो मनुष्य सिर्फ पांच वर्ष तक ह...
29/05/2025

#मधुमक्खियों_की_घटती_संख्या_मानव_जीवन_पर_संकट
'यदि पृथवी पर सभी मधुमक्खीयां गायब हो जाये, तो मनुष्य सिर्फ पांच वर्ष तक ही जीवित बचेगा" ऐसा क्यों ?

प्रश्न में तो पांच वर्ष कहा गया है लेकिन मधुमक्खियों के बिना जीवन समाप्त होने में चार साल ही काफी है। सुनने में अजीब लगता है परंतु यह एक वैज्ञानिक तथ्य है।

सिर्फ मधुमक्खियां ही नहीं, सभी प्रकार की छोटी-बड़ी मक्खियां इसमें शामिल है।

पृथ्वी पर जीवन, परागण की प्रक्रिया पर बहुत हद तक निर्भर करता है। यही वह सार्वभौमिक प्रक्रिया है जिससे पृथ्वी पर वनस्पतियों का वजूद है। परागण में मक्खियां अहम भूमिका अदा करती है बड़े स्तर पर भी, सूक्ष्म स्तर पर भी और भी जीवजंतु, पक्षी, चमगादड़ की प्रजातियां इसमे महत्त्वपूर्ण है पर मधुमक्खियां का योगदान असीमित है।

मधुमक्खियां नही होंगी, परागण नही होगा, पौधे नहीं होंगे, जानवर नहीं होंगे, फिर इंसान भी नही होंगे। भोजन लड़ी अवरुद्ध हो जाएगी। प्रकृति का संतुलन बिगड़ जायेगा। परिणाम और भी भयावह हो सकते है। हजारों पौधों की प्रजातियां अचानक से लुप्त हो जाएंगी।

आधुनिक समय में विभिन्न उन्नत वैज्ञानिक उपायों की वजह से जीवन समाप्त होने की प्रक्रिया थोड़ी मद्धम जरूर हो सकती है, पर मनुष्य प्रजाति पर संकट जरूर आएगा। इसी तथ्य के मद्देनजर मधुमक्खियों के संरक्षण पर विशेष ध्यान देने की अधिक आवश्यकता है।

मधुमक्खियों की आबादी घटने का प्रमुख कारण फसलों के बीजों की आनुवंशिकता में बदलाव मतलब #हाइब्रिड_बीज ही है

ये #नन्हे_सैनिक_प्रकृति_के_प्रहरी है। इनके योगदान को पहचान की आवश्यकता है।

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